पत्थलगड़ी: विद्रोह की सुगबुगाहट के पीछे की कहानी

पत्थलगड़ी: विद्रोह की सुगबुगाहट के पीछे की कहानी

झारखंड के कुछ गांवों में पिछले करीब एक साल से हालात असामान्य रहे हैं। आदिवासी आबादी वाले इलाकों में सरकार के खिलाफ गुस्सा और आंदोलन चला। बाहरी लोगों के गांवों में न घुसने के फरमान जारी कर दिये गए। जहां कुछ लोग इसे आदिवासियों का जायज़ गुस्सा बताते हैं वहीं सरकार इसे राजनीति से प्रेरित और उपद्रवियों का अतिवादी प्रचार कह रही है। जुलाई में हुई बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद गांव कनेक्शन की टीम इन गांवों में पहुंची। यह है इन गांवों के मौजूदा हालात पर गांव कनेक्शन की रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा।

गांव की ओर जाती कच्ची सड़क

झारखंड की राजधानी रांची से महज़ 50 किलोमीटर दूर गांवों को जाने वाली सड़कें कच्ची हैं। बरसात में चलने लायक नहीं रहतीं। इन गांवों में पीने के साफ पानी की दिक्कत है। स्वास्थ्य सुविधायें नदारद हैं और स्कूलों में टीचर नहीं आते। लेकिन आठ बार सांसद रह चुके बीजेपी नेता और मौजूदा एमपी करिया मुंडा को यह सामान्य बात लगती है।

"देश भर में सभी आदिवासी इलाके पिछड़े हैं। हमारा इलाका तो बाकी क्षेत्रों के मुकाबले कम पिछड़ा हुआ है।" करिया मुंडा ने हमसे फोन पर कहा। सरकार और प्रशासन खूंटी ज़िले में भड़के पत्थलगड़ी आंदोलन के बाद अब हालात काबू में आने का दावा कर रहे हैं। लेकिन एक सवाल मुखर है कि आखिर राजधानी से इतने करीब स्थिति को कैसे बिगड़ने दिया गया? क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी? या खूंटी के पिछड़ेपन ने इस आंदोलन की ज़मीन तैयार की।

सामाजिक कार्यकर्ता दयामनि बारला जो कई दशकों से जन, जंगल और ज़मीन के मुद्दों को लेकर कई मोर्चों पर सक्रिय रहीं, वह कहती हैं कि राजनेताओं और सरकार की विफलता ही है जिसकी वजह से पत्थलगड़ी जैसा आंदोलन भड़का। जो मौजूदा नेता पत्थलगड़ी आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं उन्हें कोई जानता तक नहीं था। बारला ने हमें बताया, 'जो लोग आंदोलन को लीड कर रहे थे मैंने उनके नाम तक नहीं सुने थे। उन्हें कभी देखा भी नहीं जिनके नाम सामने आए, मैं उनको पहले कभी नहीं मिली थी, जबकि लोगों के अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में अक्सर मुझे बुला ही लिया जाता है।'

खूंटी गांव में अनाज साफ करती लड़की, यहां की ज़मीन एक फसली है

खूंटी के जिन इलाकों में पत्थलगड़ी आंदोलन भड़का वह एक-फसली ज़मीन है। रांची पुलिस और प्रशासन के अधिकारी कहते हैं कि खरीफ की फ़सल की कटाई के बाद अक्टूबर से लोगों को पास अधिक काम नहीं रहता तो उन्हें 'भड़काना' और बहलाना-फुसलाना आसान होता है। दयामनि बारला भी इस बात को खारिज नहीं करतीं लेकिन साथ ही वह एक अहम सवाल उठाती हैं।

'सरकार के पास कई एजेंसियां हैं। हर जगह सरकार के लोग मौजूद हैं। गृह मंत्रालय क्या काम करता है। बाहर और भीतर सूचना प्रदान करने वाला तंत्र क्या काम कर रहा है। मैं कहती हूं जो लोग गलत कर रहे हैं उन्हें सरकार अलग करे और जो ग़लत हो रहा है उसे अलग किया जाए तो पता चलेगा कि कौन लोगों को भड़काने वाला है और उनकी पहचान हो सकेगी। लेकिन सरकार सभी लोगों को एक तराजू में नहीं तौल सकती।' बारला कहती हैं।

सवाल यह है कि क्या माओवाद प्रभावित लातेहार, सिमडेगा और सिंहभूम जैसे ज़िलों से घिरे खूंटी में बेरोज़गारी और हताशा ने आंदोलन की ज़मीन तैयार की। गांवों में जाने से पता चलता है कि पिछले साल की शुरुआत से ही खूंटी में विद्रोह की सुगबुगाहट थी हालांकि गुस्सा लम्बे समय से पक रहा था। राज्य की बीजेपी सरकार ने जब भूमि से जुड़े राज्य के दो कानूनों- छोटा नागपुर टैनेंसी एक्ट और संथाल परगना टैनेंसी एक्ट- में बदलाव की कोशिश की तो आदिवासियों के भीतर असुरक्षा की भावना भड़क गई और विरोध तीखा हो गया। राज्य सरकार को भी लगा कि इन कानूनों में बदलाव राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है और वह आखिरकार पीछे हट गई लेकिन सरकार और आदिवासियों के बीच रिश्तों में खाई चौड़ी हो चुकी है।


आदिवासी सलाहकार समिति के सदस्य रतन टिर्की कहते हैं, 'झारखंड राज्य के लिये संघर्ष और निर्माण के वक्त से ही अन्याय की एक चोट यहां के आदिवासियों के मानस पर है। झारखंड की परिकल्पना में उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों को नये राज्य में शामिल किये जाने की बात थी। आदिवासियों को लगता है कि एक छोटा राज्य देकर उनकी ताकत को सीमित किया गया है।'

दीवार पर लिखा हम बच्चों को वीर बिरसा मुण्डा बनायेंगे

2017 के मध्य से आदिवासी ग्रामसभा बैठकों में 'हम भारत सरकार' के नारे लगने शुरू हुए और आदिवासी नायक बिरसा मुन्डा के नाम पर आंदोलन के लिये आह्वान किए गए। खूंटी ज़िला आदिवासी जननायक बिरसा मुण्डा की जन्मभूमि भी है। उनकी प्रेरक छवि के साथ दीवारों पर नौकरी और शिक्षा के अभाव के ऐसे नारे साफ बताते हैं कि कैसे इन आदिवासी इलाकों की अनदेखी होती रही।

हताशा का आलम यह रहा कि गांवों में न केवल बच्चों को वर्णमाला में अ से अनार की जगह अ से अधिग्रहण और ख से खरगोश की जगह ख से खनिज पढ़ाया जाने लगा। साथ ही भारतीय मुद्रा का बहिष्कार करते हुये अपनी मुद्रा जारी कर दी। झारखंड पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार पत्थलगड़ी नेताओं ने उन्हें बताया कि वह गुजरात के काफी आक्रामक विचारों वाले सत्पती समुदाय से प्रभावित थे और वहां से ट्रेनिंग लेकर ही पत्थलगड़ी आंदोलन को भड़का रहे थे।

हल लिए हुए एक आदिवासी किसान

इसी आंदोलन के दौरान खूंटी के गांवों में होने वाली अफीम की खेती की बात सामने आयी। अतिवादी संगठन अपनी मशीनरी और गतिविधियों को चलाने के लिये अफीम की खेती से होने वाली कमाई को इस्तेमाल कर रहे थे इसमें कोई शक नहीं है। सरकार ने इसे लेकर पत्थलगड़ी समर्थकों पर हमला किया कहा कि सारा खेल अफीम का ही है। मुख्यमंत्री रघुबर दास कहते हैं, 'वहां लड़ाई पत्थलगड़ी की नहीं है... लड़ाई है 100 एकड़ में अवैध अफीम की खेती की। उग्रवादी संगठनों को संरक्षण देकर कुछ लोग वहां इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं।' हालांकि मुख्यमंत्री के इस बयान से एक सवाल खुद सरकार पर भी उठता है। क्या प्रशासन को पहले ये सब पता नहीं था या अधिकारी और राजनेता भ्रष्टाचार में लिप्त होकर यह सब होते देखते रहे।

पत्थलगढ़ी की कहानी काफी जटिल है। इसमें अतिवादी संगठनों की सक्रियता के साथ, प्रशासन का निकम्मापन और बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार का असर साफ दिखता है। पत्थलगड़ी में जब पुलिस हालात के काबू में आने का दावा कर रही है तो वहां चर्च और ईसाई मिशनरियों का बीजेपी के नेताओं और हिन्दू संगठनों के साथ टकराव भी साफ दिख रहा है। इस इलाके में रहे रहे आदिवासियों की बड़ी संख्या ईसाई धर्म को मानती है इसलिये इस पूरे परिदृश्य में यह एक ऐसा मोड़ है जो एक लम्बे राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत है। खासतौर से आने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुये।

"हम शांति चाहते हैं लेकिन सरकार यह तो बताए कि वह आदिवासियों के साथ नाइंसाफी नहीं करेगी। यहां किसी को सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं है। अभी सब ठीक होता दिख रहा है लेकिन यहां हालात बिगड़ने में देर नहीं लगेगी।" खूंटी और पश्चिम सिंघभूम ज़िले की सरहद पर एक आदिवासी युवक ने हमसे कहा।

यह भी देखें: पत्थलगड़ी: पुलिस कार्रवाई के बाद गांवों में अब भी है डर और खामोशी

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