फूलों और औषधीय खेती से बढ़ सकती है किसानों की आय : एस के बारीक

आमतौर पर लोग एनबीआरआई को पर्यावरण पर शोध करने वाली संस्था के रूप में जानते हैं लेकिन एनबीआरआई और भी उपयोगी विषयों पर काम करता हैं।

लखनऊ। "वैज्ञानिक देश के अलग-अलग राज्यों में सुदूर जंगलो में जाकर मानव जीवन के लिए उपयोगी वनस्पतियों और औषधियों की खोज कर रहे है। साथ ही उनकी लिस्टिंग भी की जा रही हैं और उनके जींस को लखनऊ के बंथरा स्थित फार्म में संरक्षित करने का काम किया जा रहा है ताकि वनस्पतियों की ये प्रजातिया विलुप्त न हो और भविष्य में उनका गुणात्मक संवर्धन किया जा सके।"

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ (एनबीआरआई) के निदेशक प्रोफ्रसेर एस.के.बारीक ने गाँव कनेक्शन को दिए गए साक्षात्कार में जलवायु परिवर्तन से लेकर, पानी, भूमि, में हो रहे प्रदूषण के साथ-साथ एनबीआरआई द्वारा किसान के हित में किये जा रहे कार्यों की जानकारी साझा की।

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के निदेशक एसके बारीकराष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के निदेशक एसके बारीक

भूमि का व्यवसायीकरण जलवायु परिवर्तन से ज्यादा हानिकारक

जलवायु परिवर्तन से वनस्पतियों और औषधियों को हो रहे नुकसान के सवाल पर एनबीआरआई के निदेशक प्रो.एस.के बारीक बताते है " जलवायु परिवर्तन से वनस्पतियों को जो नुकसान हो रहा है वो पहाड़ों के उपरी क्षेत्र में ज्यादा है कितनी वनस्पतिया जलवायु परिवर्तन के चलते खत्म हुई है या हो रही है ये तभी बताया जा सकता है जब ये पता हो कि कितनी वनस्पतियाँ इन क्षेत्रों में पहले मौजूद थी या इस समय है। इस दिशा में एनबीआरआई कार्य कर रहा है। एक वनस्पति है "आईलेक्सखासियाना" आईयूएसए के रिपोर्ट में ये पाया गया की ये वनस्पति विलुप्त होने की कगार पर है,जिसे एनबीआरआई द्वारा संरक्षित कर लिया गया है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक है। जलवायु परिवर्तन का कारण क्या है इस पर भी एनबीआरआई का पश्चिम बंगाल के दुधवा और कर्तानिया पार्क में शोध चल रहा हैं।

प्रो.बारीक बताते आगे बताते है "जलवायु परिवर्तन से ज्यादा नुकसान पहाड़, जंगल, जमींन के व्यवसायीकरण से हुआ है। फायदे के लालच में जमींन का लैंडयूज बदला जा रहा है जो की हानिकारक है और ये हम खुद के लिए समस्या उत्पन्न कर रहे हैं।"

ये भी पढ़े :जलवायु परिवर्तन निगरानी में मददगार हो सकती हैं शैवाल की कई प्रजातियां

उत्तर प्रदेश सहित देश के ग्यारह राज्य आर्सेनिक के चपेट में ...

पर्यावरण संरक्षण पर हुए काम के सवाल पर प्रो.बारीक बताते है "आमतौर पर लोग एनबीआरआई को पर्यावरण पर काम करने वाले शोध संस्थान के रूप में जानते है। पर्यावरण अपने आप में एक बड़ा विस्तृत क्षेत्र है, इस पर एनबीआरआई ने काफी शोध किया है कि कौन सा पौधा या वनस्पति किस तरह के प्रदूषण को ख़त्म कर सकता है। इसकी लिस्ट पहली बार एनबीआरआई द्वारा बनायीं गयी हैं। एनबीआरआई के पास करीब दो सौ ऐसी वनस्पतिया और पौधे है जो अलग–अलग तरह के प्रदूषण को आब्जर्व करके ख़त्म कर सकते हैं। इस रिसर्च को संस्थान द्वारा एप फार्म में भी रिलीज किया गया हैं। देश के 11 राज्यों सहित उत्तर प्रदेश के 70 जिलों में आर्सेनिक प्रदूषण मौजूद है जो चावल और गेहूं की फसल को प्रभावित करता है। उत्तर प्रदेश में बीमारी की मुख्य वजहों में से गेहूं और धान की फसलों में आर्सेनिक की मात्रा का बढ़ना भी है। एनबीआरआई ने पश्चिम बंगाल की सरकार के साथ मिलकर धान की ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसमे आर्सेनिक की मात्रा कम है और ये विश्व स्वास्थ्य संगठन निर्धारित मानकों से भी कम है ये स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है। इसे भारत सरकार ने रिलीज भी कर दिया है। साथ ही उत्तर प्रदेश की मिटटी और जल में आर्सेनिक की मात्रा कितनी है इसका भी आकलन एनबीआरआई द्वारा किया गया हैं।

वो आगे बताते है "अलग&अलग तरह की जो इंडस्ट्री चल रही है इनसे भी बड़ी मात्रा में अलग-अलग तरह का प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है जैसे स्टील की फैक्ट्री से "सियोनाइड" नाम का प्रदूषण पैदा होता है जो की पर्यावरण के लिए काफी हानिकारक है। ऐसे ही रिफायनरी से अलग तरह का प्रदूषण उत्पन्न होता है अलग-अलग तरह के प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए एनबीआरआई ने काफी शोध के बाद अलग–अलग पौधों की लिस्ट बनायीं हैं। टाटा स्टील के साथ मिलकर स्टील प्लांट से निकलने वाले प्रदूषण "सियोंनाइड" को किन पौधों द्वारा खत्म या उनके असर को कम किया जा सकता है इस पर काम किया जा रहा है व "माइक्रोब्स एंड प्लांट टेक्नोलॉजी " विकसित की जा रही है।"

ये भी पढ़े :एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने आर्सेनिक ग्रस्त क्षेत्रों के लिए विकसित की ट्रांसजेनिक धान की नई किस्म

फ्यूचर क्लाइमेट चेंज सिनारियों पर भी शोध

भविष्य में जब जलवायु परिवर्तन और बढेगा उस समय फसलों और वनस्पतियों पर क्या असर होगा,जंगली,पेड़, पौधे कैसे व्यवहार करेंगे इस पर भी एनबीआरआई द्वारा शोध किया जा रहा है और ये सब काम फेस (FCCS) प्लान के तहत हो रहा हैं। इस सबको लेकर एनबीआरआई काफी सक्रीय हैं और इसके लिए हमारे वैज्ञानिको की टीम निरंतर शोध कर रही हैं।

फूलों और मेडिशनल प्लांट की खेती किसानों के लिए फायदेमंद

किसानों के लिए एनबीआरआई का सबसे बड़ा योगदान वैरायटी ऑफ फ्लोरीकल्चर हैं। पुष्प उद्यान को किसानों को व्यवसायिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। फूलो की 75 प्रजातिया एनबीआरआई ने विकसित की है ,225 तरह के फूलो की प्रजातियाँ एन बीआरआई ने संरक्षित की हैं। सामान्य तौर पर अगर किसान इनकी नर्सरी का भी काम शुरू करे और नर्सरी शुरू करने के बारें में प्रशिक्षण संस्थान से प्राप्त कर ले तो किसानो के लिए फायदेमंद हैं।

उदाहरण के तौर पर फूल की खेती के मामले में "डाई फ्लावर" की खेती बहुत आसान हैं अगर किसी वस्तु को जैसे मूर्ति ,लकड़ी के आइटम आदि को फूलो के रंग से डाई किया जाता है तो उसका रंग लम्बे समय तक नही उतरता हैं। डाई कलर के साथ साथ फूलों से गुलाल भी बनाया जा रहा हैं। किसान औषधीय पौधों की खेती करके भी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

एनबीआरआई ने सुगर को नियंत्रित करने की दवाई बनायीं है जिसकी धूम देश भर में हैं करीब 15- 20 प्रकार के औषधीय पौधे ऐसे है जो इंडोगंगटिक प्लेन में आसानी से उगाये जा सकते है। और ये किसानों के लिए फायदेमंद खेती है। किसानो को और ज्यादा सुविधा और लाभ हो सके इसके लिए इंडस्ट्री और किसान के बीच सम्बन्ध जरुरी है "किसान जो भी खेती और औषधीय खेती या फूलो की खेती कर रहे है इसमें सम्बंधित उद्योग वाली कंपनी सीधे किसान के संपर्क में आ सके और किसान सीधे अपने उत्पाद कंपनी को बेच सके। जैसे देश में बहुत से किसान एरोमा आयल की खेती कर रहे है इसमें किसानों के जो उत्पाद होते हैं उन्हें एरोमा आयल एसोसिएशन वाले सीधे किसान से खरीद लेते है ।ये तेल की किसान को अच्छी कीमत मिलती हैं।

Share it
Top