'फेक न्‍यूज' के बाद 'डीपफेक वीडियो' बन रहा लोगों की परेशानी का सबब

आजकल यूट्यूब हो या फिर फेसबुक, वाट्सएप हो या फिर स्नैपचैट, हर जगह फेक वीडियो की भरमार है। इन फेक वीडियो में किसी सेलिब्रिटी का चेहरा डालकर वायरल किया जाता है और लोग उसे असली समझने लगते हैं।

Vivek ShuklaVivek Shukla   31 Aug 2019 5:09 PM GMT

लखनऊ। फेसबुक के संस्‍थापक हैं मार्क जकरबर्ग। मान लीजिए कल को एक वीडियो आए और उसमें मार्क अपनी कंपनी को बंद करने की बात करें। या फिर वो यह बताएं कि फेसबुक आपकी निजी जानकारियां चुरा रहा है। शायद ऐसा वीडियो देखते ही आप शेयर का बटन दबा दें। ताकि यह जानकारी और लोगों तक पहुंच सके। लेकिन क्‍या आपको पता है कि यह वीडियो जिसमें मार्क बोल रहे हैं, यह फेक भी हो सकता है।

जी हां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस दौर में ऐसा मुमकिन है। मशीन लर्निंग प्रोग्राम द्वारा बनाई गई जाली तस्वीर या मूवी से ऐसा किया जा सकता है। इस तस्‍वीर या मूवी को 'डीपफेक' कहा जाता है। हम आपको इसी डीपफेक के बारे में बता रहे हैं।

क्‍या है 'डीपफेक वीडियो'

डीपफेक एक विशेष प्रकार के मशीन लर्निंग प्रोग्राम द्वारा बनाई गई नकली तस्वीर या वीडियो है। जिसे मशीन लर्निंग प्रोग्राम का प्रयोग करके डीपफेक बनाया जाता है, उसे जेनरेटर एडवरसरी नेटवर्क या GAN कहा जाता है। साइबर एक्‍सपर्ट नितनेम सिंह‍ सोढ़ी ने गांव कनेक्‍शन को बताया कि 'डीपफेक वीडियो' देखकर कोई आसानी से नहीं बता सकता है कि यह वीडियो असली है नकली।

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किसी का भी डीपफेक वीडियो बन सकता है।किसी का भी डीपफेक वीडियो बन सकता है।

उन्‍होंने बताया कि इस प्रकार के वीडियो को दो प्रकार से बनाया जाता है। पहला फोटो को एडिट करके और दूसरा वीडियो को एडिट करके। आजकल तो ऑनलाइन ऐसे सॉफ्टवेयर आ गए हैं कि कोई भी आसानी से किसी की फोटो या वीडियो को एडिट कर सकता है। आप सोशल मीडिया पर ऐसे बहुत से वीडियो को देखते होंगे जिसमें तस्‍वीर किसी और की होती हैं और उसमें बोलने वाला कोई और होता है।

नितनेम बताते हैं कि वे आठ साल से साइबर सिक्‍योरिटी पर काम कर रहे हैं। उनका कहना कहना है कि ऐसे वीडियो की मदद से बस लोग प्रोपेगेंडा फैलाने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए आप देख सकते हैं कि कई नेताओं का भाषण वाला वीडियो वायरल होता है, इसमें फोटो तो नेता की रहती है लेकिन आवाज उनकी नहीं होती है लेकिन लोग उस वीडियो को देखते ही बिना उसकी सच्‍चाई जाने सोशल मीडिया पर शेयर करना शुरू कर देते हैं। ऐसे वीडियो की खास बात यह रहती है लोग बिना सोचे समझे शेयर करने लगते हैं।


बीते साल फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे फेसबुक के शक्तियों के बारे में एक खौफनाक भाषण देते हुए दिखाई दे रहे थे। जो इनकी खुद की कंपनी है। ऐसे ही अमेरिका के पूर्व राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का ए‍क वीडियो वर्तमान राष्‍ट्रपति डोलांड ट्रंप को अपशब्‍द बोलते दिखाई जाती है। यह दोनों वीडियो पूरी तरह से फर्जी थे। यह एक कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा बनाया गया था, जिसे एक प्रोग्रामिंग स्क्रिप्ट के आधार पर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से बनाया गया था। इस प्रोग्राम के नाम 'डीपफेक वीडियो' है।

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बिना जांच किए ही लोग वीडियो को शेयर कर देते हैं। बिना जांच किए ही लोग वीडियो को शेयर कर देते हैं।


कहां से आया 'डीपफेक वीडियो'

नितनेम बताते हैं कि 'डीपफेक वीडियो' कहां से आया, इसका अंदाजा लगाना मुश्‍किल है। यह किसी शरारती और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले की दिमागी उपज है। अगर इस तरह के वीडियो से बचना है तो बिना जाने समझे किसी भी वीडियो को शेयर न करें। इसके लिए नागरिको को खुद जागरुक होना पड़ेगा। वहीं दैनिक भाष्‍कर की एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण कोरियन कंपनी सैमसंग ने डीपफेक सॉफ्टवेयर का निमार्ण किया था। इसकी मदद से सिंगल फोटो को वीडियो क्लिप में बदली जा सकती है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर काम करती है। ये किसी सिंगल फोटो को एक्सप्रेशन देने वाले वीडियो क्लिप में बदलने में सक्षम है। किसी फोटो की फोटो से भी इस तरह का वीडियो बनाया जा सकता है।

आजकल पॉलिटिक्स, फेक न्यूज और बदला लेने के लिए डीपफेक वीडियो का उपयोग होने लगा है। यूट्यूब हो या फिर फेसबुक, पोर्न साइट्स हों या फिर वेमियो, हर जगह ऐसे वीडियो की भरमार है।

उदाहरण के लिए आपके लिए एक डीपफेक वीडियो नीचे दिया गया है। इसमें हॉलीवुड के दो स्‍टार अभिनेत्री एमी एडम्स (बाएं) और अभिनेता निकोलस केज (दाएं) हैं। इसमें आप देख सकते हैं कि अभिनेत्री एमी एडम्स को अभिनेता निकोलस केज के चेहरे में बदला गया है।


सायबर सिक्‍योरिटी एक्‍सपर्ट चात‍क वाजपेयी ने गांव कनेक्‍शन को बताया, "डीपफेक वीडियो किसी का भी बनाया जा सकता है और इसे कोई भी बना सकता है। इसका प्रयोग लोग राजनीति में भी कर रहे हैं। यह वीडियो, तस्‍वीर और ऑडियो की मदद से बनती है। सोशल साइट पर ऐसे तमाम वीडियो पड़े हुए हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से उल्‍टा सीधा बुलवाया गया है। यह फेक न्‍यूज का नया वर्जन है।

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डीपफेक वीडियो बनाना अपराध है। डीपफेक वीडियो बनाना अपराध है।

कैसे करें 'डीपफेक वीडियो' की पहचान

लखनऊ विश्‍वविद्यालय के मॉसकॉम के डीन मुकुल श्रीवास्‍तव कई साल से लगातार साइबर क्राइम पर लिखते आए हैं। ये देशभर में लोगों को फेसबुक पर फेक फोटो वीडियो पर जागरुक करते आए हैं। उन्‍होंने बताया कि फेक फोटो को पहचानने में गूगल और यांडेक्स ने रिवर्स इमेज सुविधा शुरू की है जहां आप कोई भी फोटो अपलोड करके यह पता कर सकते हैं कि कोई फोटो इंटरनेट पर यदि है तो वह सबसे पहले कब अपलोड की गई है। एमनेस्टी इंटरनेशल ने वीडियो में छेड़छाड़ और उसका अपलोड इतिहास पता करने के लिए यूट्यूब के साथ मिलकर यू ट्यूब डाटा व्यूअर सेवा शुरू की है।

उन्‍होंने आगे बताया कि नब्बे प्रतिशत वीडियो सही होते हैं पर उन्हें गलत सन्दर्भ में पेश किया जाता है। किसी भी वीडियो की जांच करने के लिए उसे ध्यान से बार-बार देखा जाना चाहिए। किसी भी वीडियो को समझने के लिए उसमें कुछ खास चीजों की तलाश करनी चाहिए, जिससे उसके सत्य या गलत होने की पुष्टि की जा सके। जैसे वीडियो में पोस्टर, बैनर, गाड़ियों की नम्बर प्लेट, फोन नंबर की तलाश की जानी चाहिए। इसे गूगल द्वारा खोजकर उनके क्षेत्र की पहचान की जा सकती है। किसी लैंडमार्क की तलाश की जाए, वीडियो में दिख रहे लोगों ने किस तरह के कपडे पहने हैं, वो किस भाषा या बोली में बात कर रहे हैं, उसको देखा जाना चाहिए। सबसे जरुरी बात किसी भी वीडियो और फोटो को देखने के बाद यह जरुर सोचें कि यह आपको किस मकसद से भेजा जा रहा है, सिर्फ जागरूकता या जानकारी के लिए या फिर भड़काने के लिए।

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बढ़ रहा है साइबर अपराध

'डीपफेक वीडियो' बनाना साइबर अपराध की श्रेणी में आता है। यह कितना बड़ा अपराध इस बात का अंदाजा दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा कमीशन की एक रिपोर्ट से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में भारत में 4 बिलियन डॉलर (24,630 करोड़ रुपए) की लागत के साइबर अपराध हुए हैं।

2011 से लेकर 2016 के बीच साइबर सुरक्षा अपराधों, जैसे स्कैनिंग, दुर्भावनापूर्ण कोड शुरू करने, वेबसाइट में अनधिकार प्रवेश करना और सेवा से वंचित करने जैसे अपराधों में 76 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2011 में ऐसे मामलों की संख्या 28127 थी जबकि 2016 में यह बढ़ कर 49455 हुआ है।

वहीं नेशनल काइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 2010 से लेकर 2016 तक साइबर क्राइम के मामले 966 से बढ़कर 12,317 हो गए, यानि इसमें 1175 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि देश में साइबर क्राइम किस तेजी से बढ़ रहा है।


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