पीलीभीत जहां बनती है 'कन्‍हैया' की बांसुरी

पीलीभीत अपने बांसुरी उद्योग के लिए जाना जाता है। आजादी के पहले से यहां बांसुरी का कारोबार चलता आ रहा है।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   2 March 2019 2:58 AM GMT

रणविजय सिंह/दया सागर

पीलीभीत। ''ये कन्‍हैया जी की देन है जो हम लोगों की रोजी-रोटी चल रही है।'' यह बात बांसुरी बनाने वाले हाफ‍िज नवाब कहते हैं। हाफिज पीलीभीत के उन चंद कारिगरों में से एक हैं जो अपने पुश्तैनी बांसुरी बनाने के काम में लगे हैं। पीलीभीत में बांसुरी बनाने वाले कई मुसलमान परिवार हैं, जो अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

पीलीभीत अपने बांसुरी उद्योग के लिए जाना जाता है। आजादी के पहले से यहां बांसुरी का कारोबार चलता आ रहा है। यहां की बनाई गई बांसुरी दुनिया के कोने-कोने तक जाती है। शहर के बीचो बीच स्‍थ‍ित लाल रोड की तंग गलियों से गुजरते हुए आपको कई ऐसे घर मिलेंगे जहां बांसुरी बनाने का काम हो रहा होगा। ऐसी ही एक गली में अपने छोटे से मकान की छत पर हाफिज नवाब ने भी अपना कारखाना बना रखा है।

बांसुरी बनाने का एक कारखाना।बांसुरी बनाने का एक कारखाना।

हाफिज बताते हैं, ''मेरी उम्र 60 साल की है, मैं बचपन से ही इस काम में लगा हूं, मेरे दादा-परदादा यह काम करते आए हैं। फिलहाल मैं और मेरे परिवार के कई सदस्‍य इस काम से रोजी रोटी कमा रहे हैं।'' हाफिज कई साइज की बांसुरी बना लेते हैं। इसमें छोटी साइज से लेकर बड़ी साइज की बांसुरी शामिल है। बांसुरी 24 तरह ही होती हैं। इसमें नौ इंच से लेकर 36 इंच तक की बांसुरी आती है।

हाफिज बताते हैं, ''एक दिन में करीब 200 से 250 बांसुरी बना लेता हूं, जैसा ऑर्डर मिलता है उस हिसाब का काम किया जाता है।'' हाफिज की ही तरह पीलीभीत में करीब 200 परिवार बांसुरी बनाने के काम से जुड़े हैं। हाफिज याद करते हुए कहते हैं, ''पहले बहुत लोग इस धंधे से जुड़े थे, लेकिन फिर कच्‍चा माल लाने की परेशानी और मार्जिन न होने की वजह से लोग अपना पेशा बदलते गए। कई बांसुरी बनाने वाले अब बैंड का काम करने लगे हैं।''

बांसुरी उद्योग से जुड़े पुश्तैनी लोगों की इससे खत्‍म होती रूचि पर नगर के समाजसेवी अमिताभ अग्‍निहोत्री बताते हैं, ''बांसुरी जिस बांस से बनती है उसे निब्‍बा बांस कहते हैं। 1950 से पहले नेपाल से यह बांस यहां आता था, लेकिन बाद के द‍िनों में नेपाल से आयात बंद हो गया। इसके बाद असम के सिलचर से निब्‍बा बांस पीलीभीत आने लगा। पीलीभीत से छोटी रेल लाइन पर गुहाटी एक्‍सप्रेस चला करती थी, इससे सिलचर से सीधे कच्‍चा माल (निब्‍ब बांस) पीलीभीत आ जाता था। इससे बहुत सुविधा थी, लेकिन 1998 में यह लाइन बंद हो गई। यहीं से दिक्‍कत की शुरुआत हो गई।''

समाजसेवी अमिताभ अग्‍निहोत्री।समाजसेवी अमिताभ अग्‍निहोत्री।

अमिताभ बताते हैं, ''इसके बाद बड़ी लाइन से कच्‍चा माल बरेली आने लगा, लेकिन वहां से उतारने और फिर पीलीभीत लाने तक में कच्‍चा माल ज्‍यादा खराब होने लगा था। ऐसे में अब एक ही चारा था कि कच्‍चे माल को ट्रक के रास्‍ते लाया जाए। ट्रक से लाने पर कच्‍चे माल की कीमत 10 गुना तक बढ़ गई। यानी पहले जो सामान 10 हजार में आ जाता, वही अब 1 लाख में पड़ने लगा। ऐसे में बहुत से परिवार इस उद्योग से अलग होते गए। अब हाल ये है कि बड़े करोबारी ही इसमें जमे हैं, और वो कारीगर जिन्‍हें इस काम के अलावा कुछ नहीं आता।''

बांसुरी बनाने के काम में मुख्‍य रूप से मुस्‍लिम समुदाय के लोग ही शामिल हैं। इसमें बहुत से ऐसे हैं, जिन्‍हें यह हुनर उनके पुरखों से मिला है। जहां मर्द बांसुरी को काटने, छिलने और ट्यून करने का काम करते हैं, वहीं औरतें रंगाई और बांसुरी में सुराख करने का कम करती हैं। हाफिज नवाब की पत्‍नी रैबुनिशा बताती हैं, ''वो बचपन से बांसुरी को रंगने का काम करती आई हैं। शादी से पहले और बाद में भी यह काम कर रही हैं।'' रैबुनिशा बताती हैं, ''एक दिन में 300 से ज्‍यादा बांसुरी को रंग देती हैं। वो हंसते हुए कहती हैं, ''यह काम मुझे पंसद है और अब उन्‍हें इसकी आदत हो गई है, ऐसे में इसे करते हुए वक्‍त का पता ही नहीं चलता।''

बांसुरी को रंगने के लिए रंग को एक बर्तन में निकालती रैबुनिशा। बांसुरी को रंगने के लिए रंग को एक बर्तन में निकालती रैबुनिशा।

हालांकि हाफिज नवाब और रैबुनिशा के बेटे जावेद को अपना यह पुश्तैनी काम पंसद नहीं। जावेद कहते हैं, ''इस काम में फायदा नहीं है। अब्‍बू जब तक सही सलामत हैं कर रहे हैं। हम लोग इस काम को नहीं करेंगे। जो बांसुरी पहले 10 रुपए की बिकती थी, अब 5 की हो गई है। ऐसे में यह मुनाफे का सौदा नहीं रहा।'' जावेद के चचरे भाई ओवैश भी उनकी बात से सहमत हैं। ओवैश बताते हैं, ''मेरे अब्‍बू बांसुरी बनाते हैं, लेकिन मैं कारपेंटर का काम करता हूं। यह काम मैंने नहीं सीखा।'' ओवैश कहते हैं, ''जिस धंधे में बरकत न हो, वो करने का क्‍या फायदा। बांसुरी के धंधे पर कोई सरकार ध्‍यान नहीं देती। न ही इससे इतना फायदा होगा कि घर का खर्च ही चल सके। इसलिए मैंने दूसरी लाइन चुन ली है।''


ऐसा नहीं है कि जावेद और ओवैश की तरह हर युवा सोच रहा है। इन्‍हीं गलियों में कई ऐसे युवा भी मिल जाते हैं जो अपना पुश्तैनी काम बड़ी लगन और मेहनत से कर रहे हैं और इसे भी मुनाफे का सौदा बनाकर दिखा रहे हैं। इन्‍हीं युवाओं में से एक हैं राश‍िद मानवी। राश‍िद बताते हैं, ''मैंने आठ साल का कोर्स किया है बांसुरी बनाने और इसके सुर को समझने का। इसके बाद मैं इस कारोबार में उतरा हूं।'' राश‍िद कहते हैं, ''जिन लोगों को सुर की समझ नहीं वो बांसुरी नहीं बना सकते। ऐसे ही लोग अपना पुशतैनी काम छोड़कर कुछ और कर रहे हैं, ये ठीक भी है कि जब आपको यह पसंद ही नहीं, या इसमें मन ही नहीं लगता तो कुछ और ही करें, वो ज्‍यादा बेहतर होगा।'' राश‍िद को बांसुरी बजानी भी आती है। अपने अपनी इस कला के लिए स्‍थानीय स्‍तर पर सम्‍मानित भी किया जा चुका है।

बांसुरी बनाने वाले राश‍िद मानवी। बांसुरी बनाने वाले राश‍िद मानवी।

''बांसुरी उद्योग को सरकार का भी सहयोग मिल रहा है। हमारी बनाई गई बांसुरी पर कोई टैक्‍स नहीं लगता। इससे अच्‍छा और क्‍या होगा। आप जितना चाहे मेहनत करें और मुनाफा कमाएं।'' - बांसुरी बनाने वाले राश‍िद मानवी

पीलीभीत के बांसुरी उद्योग को लेकर समाजसेवी संजय अग्रवाल कहते हैं, ''बांसुरी पीलीभीत की पहचान रही है, लेकिन वक्‍त के साथ इस पहचान को धूमिल होते देखा है मैंने। सरकार की ओर से इस उद्योग को प्रमोट करने के लिए जितने प्रयास होने चाहिए थे, उतने नहीं हुए। स्‍थ‍ित यह हुई कि बहुत से लोग इस उद्योग से पलायन कर गए। यह इच्‍छा शक्‍ति की कमी को दिखाता है। हालांकि एक बार फिर इस उद्योग की ओर सरकार का ध्‍यान गया है। अगर सब सही रहा तो एक बार फिर पीलीभीत इस उद्योग के नाम से जाना जाएगा।'' बता दें, 'वन ड‍िस्‍ट्र‍िक्‍ट-वन प्रोडक्‍ट' के तहत पीलीभीत के बांसुरी उद्योग को भी रखा गया है। इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से भी प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि जमीन पर कारिगरों को इन प्रयासों के बारे में ज्‍यादा मालूम नहीं है।

फिलहाल पीलीभीत के बांसुरी उद्योग में लोग जरूर कम हुए हैं, लेकिन फिर भी व्‍यापार में ज्‍यादा फर्क नजर नहीं आता। हाफिज नवाब जैसे बुजुर्ग से लेकर राश‍िद मानवी जैसे नौजवान इस उद्योग से अपना खर्च चला रहे हैं और उनके मुताबिक वो इस धंधे से खुश भी हैं।


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