पिनाकी चंद्र घोष बने देश के पहले लोकपाल, प्रधानमंत्री भी आएंगे जांच के दायरे में

भारत में पहली बार लोकपाल बिल 1971 में पेश हुआ था लेकिन वह पास नहीं हो सका था।

पिनाकी चंद्र घोष बने देश के पहले लोकपाल, प्रधानमंत्री भी आएंगे जांच के दायरे में

लखनऊ। पूर्व जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया गया है। सोमवार देर शाम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उनकी नियुक्ति की। न्यायमूर्ति दिलीप बी भोंसले, न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार मोहंती और न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी को भ्रष्टाचार निरोधक निकाय का न्यायिक सदस्य नियुक्त किया गया है। वहीं सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की पूर्व प्रमुख अर्चना रामसुंदरम, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव दिनेश कुमार जैन, महेंद्र सिंह और इंद्रजीत प्रसाद गौतम लोकपाल के गैर न्यायिक सदस्य होंगे।

इन नियुक्तियों की सिफारिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत चयन समिति ने की थी जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष, पूर्व अटॉर्नी जनरल भी शामिल थे। इस तरह पिनाकी चंद्र घोष देश के पहले लोकपाल होंगे। वह मई, 2017 से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य रह चुके हैं। लोकपाल और उनकी समिति के पास प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, संसद के दोनों सदनों के सदस्यों, ग्रुप ए, बी, सी और डी लेवल के अधिकारियों की जांच का अधिकार होगा।

प्रधानमंत्री के खिलाफ वे मामले लोकपाल के दायरे में नहीं आएंगे जो अंतरराष्ट्रीय या आंतरिक सुरक्षा और अंतरिक्ष व परमाणु कार्यक्रम से जुड़े हो। इसके अलावा पीएम के खिलाफ जांच तभी हो सकेगी जब लोकपाल की समिति के दो तिहाई सदस्य प्रधानमंत्री पर जांच के लिए सहमत हो। पीएम के खिलाफ जांच करने के लिए अनिवार्य वोटिंग की कार्रवाई पूरी तरह से गोपनीय होगी।

इसके अलावा सरकारी मदद लेने वाली एनजीओ, ट्रस्ट और सोसायटी भी इसके दायरे में आएंगे। हालांकि न्यायपालिका और सेना के अंग लोकपाल के जांच के दायरे से बाहर होंगे। किसी जनसेवक के खिलाफ लोकपाल में शिकायत कोई भी व्यक्ति कर सकता है। वहीं कई भ्रष्टाचार के मामलों में लोकपाल खुद संज्ञान लेंगे। शिकायतों की पहले प्रारंभिक जांच होगी। शिकायत में दम पाए जाने पर ही आगे की कार्रवाई होगी।

प्रारंभिक जांच के बाद पूर्ण जांच के लिए लोकपाल सीबीआई या सीवीसी का सहारा लेगा। ग्रुप सी और डी के मामले सीवीसी देखेगा। वहीं उससे ऊपर के मामलों पर सीबीआई जांच करेगी। इसके लिए सीबीआई में अलग से लोकपाल शाखा गठित की जाएगी। सीबीआई की इस लोकपाल शाखा की जवाबदेही सीधे-सीधे लोकपाल और उसके समिति के ऊपर होगी। भ्रष्टाचार साबित होने पर दो से 10 साल तक की सजा दी जा सकती है।

लोकपाल: लंबी रही है लड़ाई

वैसे तो लोकपाल की लड़ाई को अन्ना हजारे और उनके द्वारा शुरू किए गए लोकपाल आंदोलन से जाना जाता है, लेकिन यह लड़ाई उससे कहीं लंबी रही है। देश में लोकपाल बनाने की प्रथम मांग 1967 में उठी थी जब भारतीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों को देखते हुए लोकपाल नामक संस्था के गठन का सुझाव रखा था। इससे पहले नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क और ब्रिटेन जैसे देशों में 'ओम्बुड्समैन' नाम से लोकपाल रूपी संस्था आकार ले चुकी थी।

भारत में पहली बार लोकपाल बिल 1971 में पेश हुआ था लेकिन वह पास नहीं हो सका था। इसके बाद नए सिरे से इस विधेयक को 1985 में लोकसभा में पेश किया गया लेकिन तब भी वह पास नहीं हो सका। इसके बाद 1989, 1996, 1998, 2001, 2005, 2008 में संसद में पेश किया गया, लेकिन हर बार यह किसी न किसी वजह से पारित नहीं हो सका।

2010 में समाजसेवी अन्ना हजारे ने लोकपाल के लिए एक बड़ा जनांदोलन किया। इसके बाद सरकार दबाव में आई। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने 2013 में इसे संसद से पारित भी कराया लेकिन किन्हीं वजहों से लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो सकी। 2019 चुनावों से ठीक पहले अब जाकर लोकपाल की नियुक्ति हुई है।

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