राजस्थान: रेगिस्तान का जहाज 'ऊंट' अब रेत के समंदर में डूबने की कगार पर

ऊंटों के अस्तित्व पर लगातार खतरा मंडराता रहा है। जैसलमेर जैसे इलाकों में किसान खुद को ऊंटों से दूर कर रहे हैं। साल 2012 से 2019 के बीच 37 फीसदी से ज्यादा ऊंट कम हुए हैं। चारे, रखरखाव की समस्या, नई नियम कानून, सरकारी उदासीनता ऊंटों की राह में रोड़ा बन रही है।

Kamal Singh SultanaKamal Singh Sultana   6 Jan 2022 11:45 AM GMT

राजस्थान: रेगिस्तान का जहाज ऊंट अब रेत के समंदर में डूबने की कगार पर

साल 2012 से साल 2019 के बीच देश में 37 फीसदी से ज्यादा कम हुए ऊंट। फोटो प्रतीकात्मक / पिक्साबे

जैसलमेर (राजस्थान)। जैसलमेर के अचला गांव निवासी जोराराम राइका के पास 4-5 साल पहले करीब 200 ऊंट थे, लेकिन अब सिर्फ 70 बचे हैं। ऊंटों के गढ़ जैसलमेर ही नहीं राजस्थान के तमाम किसानों और पशुपालकों के पास ऊंटों की संख्या तेजी से कम हुई है।

"एक समय मेरे पास 200 ऊंटों का बग्ग (समूह) था, लेकिन अब महज 70 हैं। ऊंटों को पालना दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा है। पहले चरने की खुली जमीन थी, लेकिन अब ओरण (जंगल) क्षेत्रों कंपनियां (सौर ऊर्जा प्लांट) आ गई हैं, चारागाह खत्म हो गए। जिन ऊंटों को पालो-पोसो उन्हें बेचने का मन नहीं करता और पास रखो तो भुखमरी के हालात हो जाते हैं।" जोराराम राइका (58 वर्ष) कहते हैं। जोराराम के 2 लड़के और तीन लड़कियां हैं, उन्हें अपने बच्चों की शादियों की चिंता है इसलिए वो अब दूसरे काम पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

20वीं पशुगणना के अनुसार साल 2012 से 2019 के बीच एक तिहाई से ज्यादा ऊंट कम हो गए हैं। साल 2012 में देश में ऊंटों की संख्या 0.40 मिलियन थी, जो 2019 में आई 20वीं पशुगणना के मुताबिक 0.25 मिलियन बची है। इस अवधि में 37.1 फीसदी की गिरावट हुई है। वहीं अगर नर और मादा के आंकड़े देखें तो 2012 में 0.19 मिलियन नर ऊंट थे जो 2019 में 56.40 फीसदी गिरकर 0.08 मिलियन बचे। वहीं मादा की बात करें तो 2012 में 0.21 मिलियन से घटकर 0.17 बची है, जो 19.46 फीसदी की गिरावट दिखाता है। वहीं बात अगर सिर्फ राजस्थान की करें तो राजस्थान में साल 2012 में 3,25,713 ऊंट थे, जो साल 2019 में घटकर 2,12,739 ही रह गए हैं। वहीं अगर पिछले तीस सालों के आंकड़े देखें तो राजस्थान में ऊंटों की संख्या में लगभग 85 प्रतिशत की कमी हुई है।

जैसलमेर के सोढान के किसान पूरण सिंह सोढ़ा (45 वर्ष) ऊंटों की कहानी सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं, कहते हैं, "रेगिस्तान की तपती रेत पर 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाला ऊंट अब विलुप्ति की कगार पर आ गया है।"

आगे वो ऊंट के गुण गिनाते हैं, "सवारी की दृष्टि से ऊंट की गोमठ नस्ल सबसे उपयुक्त मानी जाती है। बोझा ढोने के लिए ऊंट की बीकानेरी नस्ल सहूलियत भरी समझी जाती है। ऊंटनी का दूध सेहत के लिए लाभदायक व औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। ऊंटनी का दूध दो सौ से तीन सौ रुपए लीटर तक बिकता है। ऊंटनी के दूध का उपयोग मंदबुद्धि, कैंसर, लीवर और शुगर के साथ कई बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता है।" वर्ष 1984 में स्थापित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र पिछले डेढ़ दशक से ऊंटनी के दूध और इसकी उपयोगिता पर काम कर रहा है। इस संस्थान के शोध के अनुसार ऊंटनी का दूध कई बीमारियों के उपचार में लाभकारी है। केंद्र ऊंट पालकों को ऊंट के दूध से कई तरह के उत्पादन बनाने का प्रशिक्षण भी देता है।

ऊंट राजस्थान की लोक संस्कृति का हिस्सा हैं वो रेगिस्तान के जहाज, ओरणों के सरताज हैं। यहां तक की राजस्थान का राज्य पशु भी ऊंट ही है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में रेगिस्तान का ये जहाज रेत में कहीं गुम होने लगा है।

फोटो सुमेर सिंह भाटी

विश्व युद्ध से लेकर चीन के संघर्षों में शामिल रहा है बीकानेर का गंगा रिसाला ऊंट दस्ता

भारतीय सेना व सशस्त्र बल के जवान ऊंटों पर सवार होकर सीमा की निगहबानी करते अक्सर दिख जाते हैं। सीमाओं की सुरक्षा को लेकर भी ऊंट अपनी अदायगी निभाते हैं। परेड में ऊंट सवारों का शामिल होना ऊंट की उपयोगिता व महत्ता को ओर अधिक बढ़ा देता है। राजस्थान राज्य अभिलेखागार के मुताबिक गंगा रिसाला की स्थापना महाराजा गंगा सिंह (1887-1943) ने वर्ष 1889 में की थी। महाराजा ने ब्रिटिश सरकार को शाही सेना में 500 कर्मियों वाली एक सैन्य इकाई का योगदान करने का प्रस्ताव पेश किया। इसे ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया था। नतीजतन, 'बीकानेर ऊंट कोर' जिसे "गंगा रिसाला" के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना की गई।

गंगा रिसाला ने कई युद्धों और युद्ध-समय के अभ्यासों में बड़े पैमाने पर भाग लिया। यह चीन के बॉक्सर विद्रोह (1900), अफ्रीका के सोमालीलैंड विद्रोह (1902-1904), प्रथम विश्व युद्ध (1914-1919) और दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945) में भाग लिया।

बीएसएफ के पूर्व जवान जुगत सिंह कहते है, "ऊंट बड़ा सीधा और सरल जानवर है और वफादार तो है ही। युद्ध जैसी स्थितियों में ऊंट ने घायल सवार सैनिकों को युद्धभूमि से बाहर ले जाकर अपनी उपयोगिता की प्रदर्शित किया है। ऊंट कम आवश्यकता में अधिक लाभ देने का हिमायती है। ऐसी विषम परिस्थितियों में कई कई दिन तक बिना पानी भी चल सकता है।" जुगत सिंह जैसलमेर में रनऊ इलाके में रहते हैं, और ऊंटों के साथ लंबे समय तक वास्ता रहा है।

ऊंट रिसाला बीकानेर (फोटो साभार राजस्थान अभिलेखागार)

ऊँटों की दुर्दशा को लेकर पर्यटन व्यवसायी भी परेशान

राजस्थान की आमदनी का बड़ा जरिया खनन और पर्यटन है। जैसलमेर मुख्य रुप से पर्यटन जिला है। यहां आए दिन देशी-विदेशी सैलानियों की धूम मची रहती है। बाजार पर्यटन से ही गुलजार होते है। जैसलमेर आने वाला हर सैलानी अपने मन मे ये ख्वाब लेकर आता है कि वह ऊंट की सवारी जरूर करेगा। कैमल सफारी जैसलमेर का विशेष आकर्षण भी है। ये ऊंट स्थानीय लोगों की आमदनी का बड़ा जरिया भी हैं। लेकिन ऊंट की कीमत, खानपान और रखरखाव की बढ़ती दिक्कतों से पालन कम होता जा रहा है।

जैसलमेर में पर्यटन कारोबारी तनेराव सिंह दामोदरा अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहते है, "बचपन में हमारे घर पर दो ऊंट थे। हमारा बचपन इनके इर्द गिर्द बीता। कुछ समय पहले तक यहां के लोगों के लिए ऊंटों का बड़ा महत्व था। ऊंट वाला घर बड़ा समृद्ध समझा जाता था। गांव में ऐसी मान्यता थी कि ऊंटों के बग्ग वाला अमीर घराने का होता है। समय का फेर पलटा और अब सब कुछ बदलता जा रहा है। पर्यटक ऊंट की सवारी जरूर करना चाहता है। पर्यटकों को सजे-धजे ऊंट खासे आकर्षित करते है और इसके लिए वे फोटोशूट में भी काफी दिलचस्पी रखते है। यहां कैमल सफारी के माध्यम से कई पशुपालक अपनी आजीविका चला रहे है। ऊँटों द्वारा किया जाने वाला 'ऊंट-नृत्य' भी खासा लोक-लुभावना पहलू है। लगातार घट रहे ऊंट को लेकर पर्यटन व्यवसायी भी चिंतित हैं।"

रेगिस्तान में विकास हुआ तो ऊंट महत्वहीन हो गए

छपनिया अकाल (1899) जैसे भीषण अकाल के समय रेगिस्तान वासियों का एकमात्र सहारा यहां का ऊंट था। दशकों तक ऊंट खेत जोतने से लेकर सामान ढोने यहां तक की थार में सवारी का जरिया बने रहे। जैसे-जैसे विकास को पंखे लगे ऊंट अपना महत्व खोते चले गए। ऊंटों के संरक्षण के लिए प्रदेश में कई कदम उठाए भी उठाए गए हैं। राजस्थान सरकार ने 30 जून 2014 को ऊंट को राज्य पशु घोषित किया। उसके एक साल बाद यानी 2015 में राजस्थान सरकार "राजस्थान ऊंट (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम" लेकर आई जिसका उद्देश्य ऊंटो के वध को रोकने और राज्य से बाहर उनकी ख़रीद फ़रोख़्त पर रोक लगा कर ऊंटों का संरक्षण करना था। ऊंटों के संरक्षण संवर्धन के लिए प्रदेश सरकार ने दो अक्टूबर 2016 को उष्ट्र विकास योजना शुरू की थी, जिसके तहत ऊंट पालन को बढ़ावा देने के लिए ऊंटनी के प्रजनन पर तीन किस्तों में 10 हजार रुपए दिए जाने थे, 3135.00 लाख रुपए की योजना सिर्फ 4 साल के लिए थी। ऊंट पालकों के अनुसार योजना खानापूर्ति थी जो बंद हो गई।

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ऊंटनी के दूध के साथ सुमेर सिंह भाटी, उनके मुताबिक सरकारी योजनाओं में जमकर धांधली हुई है।

पशुपालन विभाग झेल रहा है भ्रष्टाचार के आरोप

सरकार द्वारा राज्य पशु ऊंट के लिए उष्ट्र विकास योजना शुरू की गई थी। लगातार कम होती संख्या को चिंता जताते हुए सरकार ने इस योजना को जारी किया जिसके अंतर्गत ऊंटनी के प्रजनन के पश्चात 10 हजार रुपए अलग-अलग किश्तों में ऊंट पालकों को मिलने थे। लेकिन इस योजना के तहत जिन पशुपालकों को पहली किस्त दी गई हैं, उन ऊंट पालकों की बकाया राशि का भुगतान अब किया जा रहा है। इसको लेकर कई बार हंगामा भी हो चुका है। 10 मार्च 2021 को ऊंट पालकों ने पशुपालन विभाग के अधिकारियों का घेराव किया था। उस दौरान कई ऊंट पालकों ने आरोप लगाया था कि योजना के तहत राशि जारी करने के लिए उनसे 500 रुपए प्रति ऊंट वसूले गए हैं, बावजूद इसके वजूद नहीं मिले। जैसलमेर में करीब 450 ऊंट पालकों द्वारा 15 हजार ऊंटों के लिए आवेदन किया गया।

जैसलमेर के ऊंट पालक सद्दाम गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मैंने अपनी 20 ऊंटनियों के लिए पशुपालन विभाग के अधिकारी को 20 हजार रुपये दिए हैं। लेकिन अभी जो बजट आवंटित किया गया उसमे मेरा नाम ही नहीं है। पशुपालन विभाग के अधिकारियों द्वारा ऊंट पालकों के साथ जमकर खेल खेला जा रहा है।"

जैसलमेर में ही सांवता गांव के बड़े ऊंट पालक और पर्यावरण कार्यकर्ता सुमेर सिंह भाटी गांव कनेक्शन को बताते हैं, "योजना का पैसा 4 करोड़ आया था, जिसमे से 50 प्रतिशत तक फर्जीवाड़ा हुआ है। जिनके घर मे ऊंट है उनको पैसे जारी नहीं करते हुए दूसरे फर्जी नाम जोड़कर बंदरबाट की गई है। अधिकारियों द्वारा प्रति ऊंट 500 रुपये वसूले हैं। भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम कसते हुए निष्पक्ष जांच करवाकर ऊंट पालकों को राहत प्रदान की जाए।"

ऊंट पालकों द्वारा लगातार आरोपों और प्रदर्शन के बाद 2021 में पशुपालन विभाग ने ऊंट पालकों को जल्द एक कमेटी गठित कर जांच की बात कही थी, लेकिन एक साल बाद भी उसकी रिपोर्ट नहीं आई है।

गांव कनेक्शन ने इस संबंध में पशुपालन विभाग जैसलमेर के उपनिदेशक मनोज माथुर से बात की। उन्होंने गांव कनेक्शन से कहा, "उष्ट्र विकास योजना के तहत करीब 4 करोड़ की राशि आवंटित की गई है। पशुपालकों द्वारा फील्ड के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं, इस संबंध में उच्चाधिकारियों से बात करके जांच व कार्यवाही की जाएगी। ऊंट पालकों को जल्द भुगतान करने की व्यवस्था की जायेगी।"

जर्मनी की डॉक्टर इल्शे कोहलर ऊंटों पर अपना शोध कार्य कर रही है। पिछले लगभग तीस साल से शोध कार्य के चलते वे राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर रही है। शोध कार्य के चलते उन्होंने पुस्तक भी लिखी है "camel karma" डॉक्टर इलशे कोहलर कहती है "ऊंटों का सरंक्षण बेहद आवश्यक है। ऊंट केवल पशु भर नहीं है। रेगिस्तान के लोगों को जिजीविषा भी उनके संघर्ष का जीता जागता सबूत ऊंट है। ऊंटपालक राईका जाति भी अब लगातार ऊंटपालन से खुद को दूर कर रही है। सरकारी व सामाजिक स्तर पर ऊंट सरंक्षण का कार्य होना चाहिए।"

जैसलमेर के पशुपालकों के मुताबिक ओरण जो कभी ऊंटों के चरागाह हुआ करते थे वहां अब सोलर कंपनियां के बड़े बड़े प्लांट लग रहे हैं ये भी एक बड़ी समस्या बनी है। फोटो सुमेर सिंह भाटी

कोरोना और ऊंट संरक्षण का कानून का असर हुआ क्या?

ऊंट पालकों की मुख्य आमदनी ऊंटों की बिक्री से होती है, उसके बाद पर्यटन और ऊंटनी का दूध होता है। एक वयस्क ऊंट एक लाख रुपए तक बिकता है। लेकिन घटती उपयोगिता और कई नए कानूनों के चलते ऊंट का कारोबार प्रभावित हुआ है। राजस्थान में ऊंटों का ट्रांसपोटेशन आसान नहीं है। राजस्थान ऊँट अधिनियम उनके वध को रोकने के लिए लाया गया था। लेकिन ये राज्य से बाहर निर्यात पर पाबंदी भी लगाता है, पशुपालकों के मुताबिक इसका कुछ असर कारोबार पर पड़ा है। दूसरी तरफ कोविड ने भी प्रभावित किया। लॉकडाउन के लंबे समय में ऊंटनी का दूध का काम ठप पड़ गया था, गांव कनेक्शन ने इस संबंध में कई रिपोर्ट की थीं। इसके अलावा कोरोना के चलते पर्यटन पाबंदियों ने भी ऊंट पालकों को इधर असर डाला है। यहां तक दो साल बाद इस बार जब पुष्कर का प्रसिद्ध मेला लगा तो ऊंट की खरीद काफी फीकी रही। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस साल पुष्कर पशु मेले में 2,327 ऊंट लाए गए हैं जिसमें से सिर्फ़ 426 ऊंट ही बिक पाए हैं जो की ऊंट बिक्री का सिर्फ़ 18 प्रतिशत है। साल 2019 में यहां पर 3300 आए थे। 2001 में मेले में 15,460 ऊंट खरीदे और बेचे गए थे। 2011 में यह संख्या घटकर केवल 8,200 ऊंट रह गई थी।

क्या है राजस्थान का ऊंट संरक्षण क़ानून?

2014 में ऊंट को राजस्थान का राज्य पशु घोषित करने के बाद 2015 में सरकार "राजस्थान ऊंट (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम" लेकर आई। अधिनियम ऊंटों के राज्य से बाहर निर्यात पर पाबंदी लगाता है, लेकिन बाद में एक सक्षम प्राधिकार को यह अधिकार दिया गया की वो ऊंटों के राज्य से बाहर निर्यात के लिए "परमिट" जारी करें। लेकिन कई ऊंट पालकों का मानना है कि यह परमिट प्राप्त करने में कई महीने का समय लग जाता है।

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