शहर में छोड़ी जॉब-पहुंच गए कुंभ, नाव चलाने वालों की कहानी

बहुत से लड़के जो घर से दूर कमाने गए थे, कुंभ की वजह से लौट आए हैं और नाव चलाकर रोजाना डेढ़ से दो हजार तक कमा रहे हैं।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   16 Jan 2019 6:46 PM GMT

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शहर में छोड़ी जॉब-पहुंच गए कुंभ, नाव चलाने वालों की कहानी

प्रयागराज। ''कुंभ में कमाई अच्‍छी हो जाती है। इस लिए मैं और मेरा छोटा भाई बाहर के काम से छुट्टी लेकर नाव चलाने आए हैं।'' ये बात प्रयागराज के रहने वाले रोहित (28 साल) कहते हैं। रोहित पुणे की एक कंपनी में काम करते हैं, लेकिन कुंभ की वजह से उस काम से छुट्टी लेकर प्रयाग पहुंचे हैं, ताकि नाव चला सकें। रोहित की तरह ही बहुत से लड़के जो घर से दूर कमाने गए थे, कुंभ की वजह से लौट आए हैं और नाव चलाकर रोजाना डेढ़ से दो हजार तक कमा रहे हैं।

रोहित बताते हैं, ''हम निषाद हैं, ये मल्‍लाहों की बिरादरी है। हमारा पुशतैनी काम ही नाव चलाना है। मेरे पिता जी करीब 20 साल से नाव चलाते हैं, लेकिन इसमें आमदनी उस हिसाब की नहीं रही। इसलिए हम बाहर कमाने जाते हैं।'' रोहित कहते हैं, ''एक तो मेहनत भी ज्‍यादा है और उसके मुकाबले पैसा भी कम मिलता है, इसलिए मजबूरी में घर से दूर जाना होता है।''

रोहित पुणे की एक कंपनी में काम करते हैं, जो क‍ि मेले में नाव चलाने के ल‍िए अपने घर आए हैं।

रोहित अपने छोटे भाई सुशील (25 साल) के साथ ही पुणे में रहकर जॉब करते हैं। कुंभ में आने वाली भीड़ और इससे बनी कमाई की संभावना उन्‍हें अपने घर खींच लाई है। रोहित के भाई सुशील बताते हैं, ''कुंभ में रोजाना नाव चलाने से करीब डेढ़ से दो हजार रुपए तक की कमाई हो जाती है। बाहर 15 हजार की नौकरी करते हैं, उस हिसाब से ये सही है। अगर हमारे शहर में ही काम मिल जाता तो हम बाहर जाते ही नहीं, लेकिन यहां ऐसी कोई कंपनी नहीं है। अब जब तक कुंभ चलेगा, तब तक यहां रहेंगे। फिर तो बाहर ही जाना पड़ेगा।''

रोहित और सुशील की तरह कई लड़के अपना काम छोड़कर या छुट्टी लेकर नाव चलाने का काम कर रहे हैं, क्‍योंकि कुंभ में आ रही भीड़ की वजह से उनकी अच्‍छी कमाई हो जा रही है। संगम में स्‍नान कराने के लिए श्रद्धालुओं को ले जाना हो या फिर नदी को पार कराना हो, इस वक्‍त इन्‍हें नाव की सवारी बहुत मिल रही है। हालांकि आम दिनों में इतनी भीड़ नहीं रहती। सुशील बताते हैं, ''मेरे परिवार में 7 लोग हैं। कुंभ में तो कमाई हो जा रही है, लेकिन आम दिनों में कमाई सिर्फ 200 से 300 के करीब होती है। ऐसे में इतना बड़ा परिवार चलाना मुश्‍किल है। इसलिए हमें कुछ और करना ही होगा और घर से दूर जाए बिना कमाई नहीं हो पाएगी।''

नाव‍िक भोलानाथ।

रोहित और सुशील के पिता भोला नाथ 20 साल से नाव चला रहे हैं। वो बताते हैं, ''कुंभ से पहले उस हिसाब की आमदनी नहीं थी, लेकिन अब सही है।'' उनकी बातों में इस बात का मलाल भी दिखता है कि उनके लड़के घर से दूर जाकर कमाई करने को मजबूर हैं। वो कहते हैं, ''इस काम में आमदनी न के बराबर है। ऐसे में बच्‍चों को दूर प्रदेश में जाकर काम करना होता है। अगर यहीं कुछ काम मिल जाता तो अच्‍छा होता, लड़के घर ही रहते और बहुत कुछ देखरेख कर सकते थे।'' भोला नाथ कहते हैं, ''सिर्फ कुंभ की कमाई से तो पेट भरने से रहा।''

अपने पिता की बात का समर्थन करते हुए रोहित कहते हैं, ''हमारे पास एक नाव है। हम तीन लोग इस पर जुटे हैं। अगर पूरे दिन की कमाई डेढ़ हजार हुई तो एक आदमी पर 500 रुपए आते हैं। इस तरह दिन भर की मेहतन के बाद एक आदमी 500 रुपए कमा पा रहा है, लेकिन अगर खुद की नाव न हुई तो इस कमाई में चौथा हिस्‍सा भी लग जाएगा। इसमें से जिसकी नाव होगी वो भी अपना हिस्‍सा लेगा।'' रोहित कहते हैं, ''ये तो ऐसा है कि घर पर छुट्टी भी बिता ली और कुछ कमाई भी हो गई। वरना कुंभ की कमाई से घर चलाना मुश्‍किल है।''

इस मेले में अब तक नाव चलाने के 2 हजार लाइसेंस जारी किए गए हैं।

बता दें, मेला प्रशासन की ओर से बोट कार्यालय भी बनाया गया है। इसके द्वारा मेले के दौरान नाव चलाने का लाइसेंस जारी किया जाता है। बोट कार्यालय के प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार सिंह बताते हैं, ''इस मेले में अब तक 2 हजार लाइसेंस जारी किए गए हैं। इससे पहले के मेले में 800 लाइसेंस ही जारी किए गए थे। अभी और भी लाइसेंस के आवेदन आए हैं। ऐसे में जल्‍द ही लाइसेंस की संख्‍या 2600 से 2700 तक पहुंच जाएगी।'' मनोज बताते हैं, ''नाव के लाइसेंस के लिए बहुत से नौजवानों ने आवेदन किया था। इनके घर में कोई न कोई पहले से नाव चला रहा था। इसके अलावा लोग किराए पर नाव लेकर भी चलावा रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि इतनी भीड़ आ रही है तो व्‍यापार भी ज्‍यादा होगा।'' गौरतलब है कि 49 दिनों तक चलने वाले कुंभ मेले में करीब 14 से 15 करोड़ लोगों के आने का अनुमान है।

किराया भी है निर्धारित

बोट कार्यालय की ओर से नाव की सवारी के लिए किराया भी निर्धारित किया गया है। हालांकि नाविक मनमाने दाम भी वसूल रहे हैं, क्‍योंकि लोगों तक किराए की जानकारी पहुंच नहीं पाई है। ऐसे में व्‍यक्‍ति और स्‍थ‍िति के हिसाब से नाविक खुद ही किराया तय करते दिखते हैं।

नाव का किराया।

फिलहाल लोग भी नाव का इस्‍तेमाल खूब कर रहे हैं। ऐसे में जब तक कुंभ चलेगा तब तक रोहित और सुशील जैसे लड़कों को अस्‍थायी रोजगार मिला हुआ है। पानी पर चप्‍पू मारकर नाव को धकेलते ये लड़के अपने शहर में रोजगार मिलने पर खुश तो दिखते हैं, लेकिन रह रहकर इस रोजगार के जल्‍द खत्‍म हो जाने की निराशा भी उनके चेहरे पर उभर ही जाती है। साथ ही नेपथ्‍य में एक दृश्‍य भी चलता होगा, जिसमें ये ट्रेन में बैठे घर से दूर जा रहे होंगे।


   

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