भारतीय कारागारों में कैदी नहीं हैं सुरक्षित, जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदी 

भारतीय कारागारों में कैदी नहीं हैं सुरक्षित, जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदी प्रतीकात्मक तस्वीर

अपराध करने वाले अपराधियों को सजा मिलने के बाद जहां रखा जाता है वह स्थान भी सुरक्षित नहीं है। भारतीय जेलों में सुरक्षा में कमी के साथ-साथ क्षमता से अधिक कैदी हैं। गृह मंत्रालय के मुताबिक 2014 में पूरे देश की जेलों में कुल 1702 कैदियों की मौत हो गई। साथ ही देश की जेलों में 17 प्रतिशत से अधिक कैदियों की संख्या है।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारतीय जेलों में हुई कुल मौतों का 89 प्रतिशत यानि 1507 साधारण मृत्यु थी जबकि 11 फीसदी यानि 195 लोगों की मौत अप्राकृतिक थी। जेल में हुईं अप्राकृतिक मौतों में मृत्यु का कारण आत्महत्या, फांसी, कैदियों द्वारा हत्या, बाहरी तत्वों द्वारा किए गए हमले और जेल कर्मियों एवं अन् लोगों द्वारा लापरवाही के कारण होने वाली मौत रहीं।

वर्ष 2014 के अंत में भारतीय जेलों में बंद कैदियों की कुल संख्या 4,18,536 थी। लोकसाभा में मार्च 2016 को जेल से संबंधित पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने जवाब पेश किया था। जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश की जेलों में उस समय देश में सबसे ज्यादा कुल 88,221 कैदी बंद थे, जबकि क्षमता 52,780 कैदियों की थी। मध्य प्रदेश की जेलों में कैदियों की संख्या 36,433 और बिहार में 31,433 और बिहार में 31,295 थी।

उत्तर प्रदेश कारागार प्रशासन की तरफ से बताया गया कि वर्तमान में कुल 64 कारागारें क्रियाशील है। इन 64 कारागारों में 05 केन्द्रीय कारागार, 53 जिला कारागार, 03 उप कारागार, 01 नारी बंदी निकेतन, 01 किशोर सदन बरेली और लखनऊ में स्थित है। इसके साथ ही मंडल स्तर पर विभिन्न कारागारों को 09 मंडल में विभाजित किया गया है। इन नौ मंडलों में आगरा, बरेली, गोरखपुर, इलाहाबाद, मेरठ, कानपुर, फैजाबाद, वाराणसी तथा लखनऊ मंडल आते हैं।

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उत्तर प्रदेश में 05 केन्द्रीय कारागार चल रहे है। जिनका निर्माण सन 1800 में निर्माण हुआ था। वर्ष 1884 में केन्द्रीय कारागार बरेली, वर्ष 1854 में केन्द्रीय कारागार आगरा, वर्ष 1867 में केन्द्रीय कारागार लखनऊ, वर्ष 1868 में केन्द्रीय कारागार फतेहगढ़, वर्ष 1877 में केन्द्रीय कारागार वाराणसी की स्थापना की गई थी।

जिला कारागार कन्नौज के जेलर शिवकुमार यादव बताते हैँ, "जिला कारागार में बंद कैदी बैरक की क्षमता से अधिक हैं। इतना ही नहीं यहां का स्टाफ भी 50 फीसदी कम है। जेल अधीक्षक का पद भी तीन महीने से खाली है। आज तक 829 कैदी यहां हैं। क्षमता 620 की है। बंदी रक्षक 100 होने चाहिए, लेकिन 55 ही हैं।" बाराबंकी के जेल अधीक्षक आर.के जैसवाल बताते हैं, "मौजूदा समय मे जेल में कुल 1200 कैदी बंद है जबकि उनके जेल में कैदियों के रखने की छमता 960 है।"

सोनभद्र जिला जेल के जेलर रमाकान्त दोहरे बताते हैं, "जिला जेल में कैदियों को रखने की क्षमता 550 है, लेकिन हर समय क्षमता से अधिक कैदी यहां रहते हैं। इस समय कैदियों की संख्या लगभग 600 है। कैदियों की सुरक्षा के नाम पर हमारे यहां 35 बंदीरक्षक, 50 होमगार्ड, एक जेल अधीक्षक, एक जेलर और दो डिप्टी जेलर मात्र है। स्टाफ की हमारी जेल में कमी है।" जिला कारागार ललितपुर के जेल अधीक्षक एसपी सिंह जेल की सुरक्षा को लेकर बताते हैं "जेल में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद हैं। शासन द्वारा जिन-जिन जेलों को चिन्हित किया हैं वहां-वहां सीसी टीवी, कैमरा लगवाया गया है। ललितपुर जेल में अभी कैमरे नहीं लगे हैं। जेल में 108 कैदियों को रखने की क्षमता हैं, जेल में 432 कैदी हैं जो क्षमता से अधिक हैं। ललितपुर में नई जेल बनना प्रस्तावित है।"

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देश की जेलों में कुल क्षमता के अलावा करीब 62,000 कैदी अधिक रह रहे हैं। भारतीय जेलों की कुल क्षमता 3,56,561 कैदियों की है। यानि भारतीय जेलें अपनी क्षमता के करीब 17 फीसदी ज्यादा कैदियों का बोझ ढो रही हैं। क्षमता से अधिक कैदियों के मामले में दादर और नागर हवेली की जेलों का नमा सबसे आगे है।

जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की स्थिति और कार्ययोजना के बारे में उत्तर प्रदेश कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं के महानिरीक्षक प्रामोद कुमार मिश्रा बताते हैं, "सरकार की तरफ से प्रत्येक जिले में एक स्थिर जेल का निर्माण कराने का प्रस्ताव है। एक जिले में कारागार के निर्माण का खर्च 100 से 150 करोड़ रुपए का आता है। जिन जिलों में पुरानी जेलें हैं ज्यादातर वो शहर के अंदर है उनको वहां से हटा कर शहर के बाहर नई जेलों का निर्माण कराया जाएगा। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जिला जेल नहीं हैं वहां जेलों का निर्माण कराया जाएगा। प्रदेश में पांच नई जेलों का निर्माण कराया जा रहा है। दो जेलों की शिफ्टिंग की जा रही है। अंबेडकर नगर, श्रावस्ती, चित्रकूट, संतकबीर नगर, इलाहाबाद जिले में नई जिला जेलों का निर्माण कराया जा रहा है। इटावा और रामपुर शहर की जिला जेलें शहर के बाहर शिफ्ट की जा रही हैं अभी सात और जिलों में नई जिला जेलों का निर्माण कराया जाएगा। प्रदेश की जेलों में क्षमता से अधिक बंदी होने के कारण नई बैरिकों का निर्माण कराया जा रहा है।"

उत्तर प्रदेश में स्टाफ की कमी के बारे में प्रमोद कुमार मिश्रा बताते हैं, "उत्तर प्रदेश में कारागारों में में 35 से 40 प्रतिशत कर्मचारियों की कमी है। सरकार की तरफ से अभी भर्ती नहीं हो रही है। जेल प्रशासन ने सरकार को कर्मचारियों की भर्ती के लिए प्रस्ताव भेज चुके हैं। अभी भर्तियों की प्रक्रिया चल रही है। ज्यादातर जलें अंग्रेजों के समय बनी हैं। जहां पहले 500 बंदी थें वहीं आज 3000 से ज्यादा कैदियों की संख्या है। आज भी उसी हिसाब से ही स्टाफ है जो अभी तक नहीं बढ़ाया गया है। प्रदेश में 10129 स्टाफ होना प्रस्तावित है लेकिन इसके विपरीत 6500 स्टाफ ही कार्यतर है। 3450 कर्मचारियों की जगह अभी भी खाली है।"

दादर और नागर हवेली जेलें 231 फीसदी, छत्तीसगढ़ की जेलें 159 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश की जेलें 127 फीसदी और दिल्ली की जेलें 122 फीसदी भरी हुई हैं। जबकि नागालैंड की जेलों में क्षमता का 69 फीसदी, त्रिपुरा की 58 फीसदी, लक्ष्यद्वीप की 56 फीसदी और दमन और दीव की कुल 44 फीसदी ही कैदी बंद हैं।

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साल दर साल बढ़ता गया जेलों में मौत का आंकड़ा

आंकड़ों पर गौर करें तो साफतौर पर नजर आता है कि साल दर साल जेलों में हुई मौतों का आंकड़ा बढ़ात गया है। 2011 में जहां जेल में कुल 1332 मौत हुई थीं तो वहीं यह आंकड़ा 2014 में बढ़कर 1702 मौतों पर पहुंच गया। चार सालों में जेल के भीतर हुई मौतों में 28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सामान्य मौतों में यह बढ़ोत्तरी 21 फीसदी ही रही, लेकिन असामान्य मौतों का आंकड़ा इस दौरान दोगुने से भी अधिक हो गया। 2011 में जहां जेल में असामान्य मौतें कुल 88 हुईं तो वहीं 2014 में यह संख्या 195 हो गई। 2012 में 126 और 2013 में 115 कैदियों की आप्रकृतिक मृत्यू हुई।

यूपी की जेलों में सबसे ज्यादा प्राकृतिक मौतें

उत्तर प्रदेश की जेलों में प्राकृतिक मौतों के आंकड़े अन्य राज्यों की तुलना में काफी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में कुल 300 सामान्य मौतें हुईं जबकि पंजाब में 218 और मध्य प्रदेश में 122 मौंतें हुई।

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