ईंट-भट्टा मजदूरः आर्थिक जरुरतों के लिए पेशगी के चक्र में फंसे आज़ाद भारत के नए गुलाम

ईंट भट्टों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूर ठेकेदार के जरिए पहुंचते हैं, जिनसे पहले ही वो घर की जरुरतों, शादी और इलाज आदि के लिए कर्ज ले चुके होते हैं। जिसके बाद ये प्रवासी मजदूर एक तरह से ठेकेदार की शर्तों पर जीते हैं, उनके बताए भट्टे पर काम करते हैं, उनकी बताई दुकान से राशन तक खरीदते हैं। ग्राउंट रिपोर्ट- 2

Madhav SharmaMadhav Sharma   19 Jan 2022 11:40 AM GMT

ईंट-भट्टा मजदूरः आर्थिक जरुरतों के लिए पेशगी के चक्र में फंसे आज़ाद भारत के नए गुलाम

राजस्थान के भीलवाड़ा में एक भट्टे पर ईंट पाथने वाले तुलसी कुमार अपने साथियों के साथ, वो ठेकेदार के साथ यहां आए थे, पर्ची सिस्टम से परेशान हैं। सभी फोटो- माधव शर्मा

भीलवाड़ा (राजस्थान)। हम आप जब कहीं काम करते हैं जो हमारी सैलरी या मजदूरी, कैश, चेक या फिर सीधे खाते में ट्रांसफर के रुप में होती है, लेकिन ईंट भट्टों में पर्ची करेंसी चलती है। मजदूर जो पैसे मांगते हैं वो ठेकेदार ईंट भट्टा का संबंधित आदमी उतने रुपए एक कागज की पर्ची पर लिखकर दे देता है, हालांकि ये पर्चियां कुछ ही दुकानों पर चलती हैं। मजदूरों की माने तो ये पर्चियां उनके आर्थिक शोषण के लिए होती हैं।

ईंट-भट्टों पर काम करने वाले लाखों मजदूर कागज की पर्ची पर लिखी 'करेंसी' से ही अपनी रोजाना की जरूरत का सामान खरीद रहे हैं। ईंट भट्टों पर काम करने वाले ज्यादातर प्रवासी मजदूर होते हैं जो अपने पूरे परिवार के साथ रहते हैं। महीने में दो बार इनका हिसाब होता है। इस दौरान जरूरत के सामान के लिए एक निर्धारित दुकान से ही पर्ची पर लिखी रकम के बराबर का सामान दे दिया जाता है। ऐसे में दुकानदार सामान की कीमत भी ज्यादा लगाता है। इससे मजदूरों का आर्थिक शोषण होता है।

बिहार के नालंदा जिले के बिहार-शरीफ से भीलवाड़ा के ईंट-भट्टों में काम करने आए तुलसी ने बहुत ही साधारण तरीके से शोषण की इस प्रथा के बारे में बता दिया। तुलसी अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ भीलवाड़ा की मांडल पंचायत समिति के धन्नाजी का खेड़ा में 4 महीने पहले ईंट बनाने आए हैं।

तुलसी तफ़्शील से बताते हैं, "भट्टा वाले हमारी मजदूरी का हिसाब महीने में दो बार ही करता है। अमावस्या और महीने के आखिरी दिन को पूरे महीने किए काम की हिसाब-किताब होता है। लेकिन हिसाब में निकली हमारी मजदूरी हमें नहीं दी जाती। रोज-मर्रा की जरूरतों के लिए भी हमें पैसे की जरूरत होती है। उसके लिए ठेकेदार एक कागज पर वो रकम लिख देता है और एक निर्धारित दुकान से सामान लाने के लिए बोल देता है।"

पर्ची सिस्टम पर महंगा मिलता है सामान?

भट्टा मजदूरों के मुताबिक पर्ची सिस्टम में नुकसान ये है कि इसमें एक तय दुकान से सामान लाना होता है, भले ही वो महंगा दे। तुलसी के साथी कई मजदूरों ने बताया कि पूरे भीलवाड़ा में सरसों का तेल 170 रुपए लीटर है लेकिन पर्ची ले जाने पर दुकान 190 रुपए लीटर देता है। और एक परिवार औसतन महीने में 3 लीटर परिवार तो लेता ही है तो हर परिवार सिर्फ 60 रुपए सिर्फ तेल में देता है।

तुलसी के साथी मजदूर अरुण कहते हैं, "इस तरह महंगा सामान लेने से महीने में हमें कम से कम 1000-1200 रुपए का नुकसान होता है। ये बात मालिक को बताओ तो वो झिड़क देता है।"

बंधुआ मजदूरी उन्मूलन राष्ट्रीय अभियान समिति के संयोजक निर्मल गोराना इसे राष्ट्रीय समस्या कहते हैं। वे बताते हैं, "हमने अभियान के तहत पूरे देश में बंधुआ मजदूरों का रेस्क्यू कराया है। कागज पर नकदी देकर सामान लाने वाला सिस्टम लगभग हर जगह है। इससे मजदूरों का भयानक तरीके से आर्थिक और मानसिक शोषण होता है।"

यूपी-बिहार के मजदूरों में भी भेदभाव करते हैं भट्टा मालिक

ईंट-भट्टों में ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर ही काम करते हैं, लेकिन भट्टा मालिक दोनों में भेदभाव करते हैं। चूंकि यूपी के मजदूर एकजुट रहते हैं। इसीलिए मालिक इन्हें महीने में दो बार हिसाब के बाद मजदूरी देता है, लेकिन बिहार के साथ वालों के साथ ऐसा नहीं होता है। राजस्थान प्रदेश ईंट-भट्टा मजदूर यूनियन में भीलवाड़ा जिले के सचिव शैतान रैगर कहते हैं, "बिहार के मजदूर ठेका या पेशगी प्रथा में बुरी तरह जकड़े होते हैं। साथ ही इनकी सामाजिक पृष्ठभूमि यूपी के मजदूरों की तुलना में बहुत अच्छी नहीं होती।"

रैगर तो दूसरी बात कहते हैं, दरअसल भट्टा मजदूरों के संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण रखती है। "यूपी के मजदूरों को लाने वाला ठेकादार हमेशा भट्टा मालिकों के संपर्क में रहता है, लेकिन बिहार के मजदूरों को ईंट-भट्टों तक लाने वाला ठेकेदार इनके हालातों पर छोड़कर कभी वापस नहीं आता। ऐसे में भट्टा मालिकों को अपनी मनमानी करने की छूट मिल जाती है।" रैगर जोड़ते हैं।

ईंट भट्टों पर तीन तरह के मजदूर काम करते हैं, ईंट पाथने वाले, ईंट को सुरक्षित रखने वाले और तीसरे ईंट को जलाने वाले- जलाने का काम सबसे जोखिम वाला होता है। तीनों ही काम ठेके पर होते हैं। भट्टे का काम साल के 9 महीने चलता है और एक भट्टे पर औसतन 200 मजदूर परिवार रहते हैं। जिनमे से ज्यादातर को कोई ठेकेदार भट्टे तक पहुंचाता है। यही ठेकेदारी व्यवस्था कई चरणों में उनके शोषण घोषित-अघोषित रुप में उनका दोहन और शोषण करती है।

भाग एक- राजस्थान: ईंट-भट्टों में घुटता बचपनः बच्चों का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य खराब, पेशगी की कीमत में पिसते प्रवासियों के बच्चे


पेशगीः गुलामी की नई व्यवस्था, जिसमें ताउम्र फंसा रहता है ईंट-भट्टा मजदूर

ईंट-भट्टों में काम करने वाले मजदूरों को पेशगी सिस्टम (एडवांस कैश) के तहत लाया जाता है। ठेकेदारों ने इन मजदूरों को कर्ज के ऐसे भंवर में फंसाया हुआ है, जिसमें से ताउम्र निकलना मुश्किल हो जाता है। गरीबी के कारण ये मजदूर अपने गांव या आसपास के साहूकार से 20000 से 50 हजार तक का कर्ज लेते हैं और फिर उसे मजदूर कर के चुकाते रहते हैं।

बिहार में बिहार शरीफ जिले के निवासी तुलसी ने 35 हजार रुपए अपने गांव के ही एक साहूकार से बहन की शादी के लिए उधार लिए थे। 3 रुपए सैंकड़ा की ब्याज पर ली इस रकम को उसने धीरे-धीरे चुकाने का वादा किया। पैसे के लेनदेन के अलावा ये साहूकार ईंट भट्टा मजदूरों को दूसरे राज्यों में काम दिलाने का भी काम करते हैं। उन्होनें तुलसी के परिवार को भीलवाड़ा के धन्ना का खेड़ा में ईंट-भट्टों पर लाकर छोड़ दिया। तुलसी और बाकी मजदूरों को यहां 550 रुपए प्रति हजार ईंट की मजदूरी देने के वायदे के साथ लाया गया, लेकिन तुलसी कहते हैं, "550 रुपए का रेट बोलकर यहां हमें 520 रुपए ही मजदूरी दी जा रही। साहूकार को फोन पर यह बात बताई तो उसने खुद ही निपट लेने की बात कह दी।"

तुलसी पेशगी सिस्टम को अपनी तरह से हमें समझाते हैं। बताते हैं, "मेरा परिवार पूरे दिन में 2 हजार ईंट बनाता है। मतलब मजदूरी करीब एक हजार रुपए बनती है। अमावस्या के दिन जब हिसाब होता है तो उसमें से आधी रकम पेशगी वाली काट ली जाती है। इस आधी रकम का लगभग एक तिहाई हिस्सा ब्याज के रूप में चला जाता है। इस तरह पूरे महीने काम करने के बाद भी हम अपनी ली हुई पेशगी की ब्याज ही चुका पाते हैं। मूल राशि का बहुत थोड़ा हिस्सा ही हम चुका पाते हैं।"

कर्ज का यह चक्रव्यूह कई बार पीढ़ियों तक भी पहुंचता है। बीमारी या अन्य किसी कारण से यदि पेशगी लेने वाले मजदूर की मृत्यु हो जाती है तो ठेकेदार उस रकम को उसके बेटे से वसूलता है। चूंकि इन बेटों ने भी बचपन में ईंट-भट्टों पर काम किया होता है इसीलिए ये भी आसानी से मजदूरी के लिए यहां आ जाते हैं। मजदूरों ने बताया कि लगातार काम करने के बावजूद उन्हें कई बार यूपी के साथी मजदूरों से खर्चे के लिए उधार रुपए लेने पड़ते हैं।

आसींद ब्लॉक के मोड़ का निम्बाहेड़ा में भट्ठे पर काम कर रहे यूपी चित्रकूट के शत्रुघन रैदास खुद को बंधुआ मजदूर मानते हैं। कहते हैं, "मैं यहां 6 महीने पहले आया था, तब से एक बार भी घर नहीं गया हूं। मालिक जाने नहीं देता। मैंने 40 हज़ार रुपये की पेशगी ले रखी है। इसे चुकाने के लिए ठेकेदार यहां लाया है। 6 महीने में मेरे 14-15 हज़ार रुपये ही चुक पाए हैं। अभी सर्दी और गर्मी का सीजन बाकी है, लेकिन मैं नहीं जानता कि कितना कर्ज़ चुका पाऊंगा। पेशगी चुकाने में मेरी पत्नी भी साथ में मजदूरी करती है। "

गैर कानूनी है पेशगी व्यवस्था

पेशगी या एडवांस पैसा देकर मजदूरी कराना गैर कानूनी कृत्य है। बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 की परिभाषा में पहला बिंदु इसी बारे में है। नकद या अन्य किसी भी तरह का एडवांस देकर मजदूरी करवाना इस कानून के तहत गलत है।

निर्मल गोराना कहते हैं, "बीते 10 साल में हमने अपने अभियान के तहत राजस्थान से 2500 से अधिक बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया है। इनमें से 99 फीसदी मजदूर पेशगी सिस्टम के तहत लाए गए थे। बाकी एक प्रतिशत इनके साथ काम करने आए थे। "

गोराना कहते हैं, कानून में जिला कलक्टर को सारी शक्तियां सौंपी गई हैं। एसडीएम को समय-समय पर ईंट-भट्टों के निरीक्षण के अधिकार हैं, लेकिन विभाग की आंखों के सामने पूरे राजस्थान में बंधुआ मजदूरी हो रही है। कोई भी राज्य सरकार इस संबंध में गंभीरता से काम नहीं कर रही।

बंधुआ मजदूरों का कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। आधिकारिक बातचीत के लिए गांव कनेक्शन ने राजस्थान श्रम विभाग के सचिव भानू प्रकाश येतुरू को फोन किया। एसएमएस किया, लेकिन उनका जवाब नहीं आया। इसके अलावा श्रम विभाग की कमिश्नर शुभम चौधरी को भी फोन किए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका।

भीलवाड़ा में बंधुआ मजदूरों की संख्या को लेकर शैतान कहते हैं, "बीते 10 सालों में हमारे संगठन ने अकेले भीलवाड़ा से ही 700 से अधिक मजदूरों का रेस्क्यू किया है। इनमें बच्चे और जवान मजदूर शामिल हैं।"

पेशगी व्यवस्था और इसे लागू होते देखना काफी पीड़ादायक होता है। मजदूरों के शोषण को लेकर जब हम ईंट-भट्टा मालिकों से बात करते हैं तो उनकी नाराज़गी भी मोल लेते हैं। स्थानीय होने के कारण कई बार इस नाराज़गी की कीमत बड़ी चुकानी होती है। शैतान अपनी बात जोड़ते हैं।

ईंट भट्टों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाए टीन के कमरों में रहती हैं, खुले में शौच जाती है, और तिरपाल वाले बॉथरूम का इस्तेमाल करती है।

महिलाओं की स्थिति बदतर

ईंट-भट्टों पर काम करने वाली महिलाओं की स्थिति भी बेहद खराब है। यहां ना तो शौचालय की व्यवस्था होती है और ना ही नहाने के लिए ठीक सी बाथरूम की। महिलाएं खुले में शौच जाती हैं और तिरपाल या ईंटों की कच्ची दीवार के बने बाथरूम का इस्तेमाल करती हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिकतर महिलाएं कमजोर होती हैं।

मांडल ब्लॉक की धुवाला गांव में यूपी के चित्रकूट से आई निराशा देवी ने बताया, "भट्ठों पर किसी तरह की सुविधा नहीं होती। औरतों के लिए तो कुछ भी नहीं है। सभी लोग खुले में शौच जाते हैं। बाथरूम के नाम पर ईंटों की ही एक दीवार है। यहां काम करने वाले अधिकतर लोग भट्ठे से बाहर नहीं गए। क्योंकि सभी लगातार काम करते हैं। मालिक रहने के लिए टीन शेड वाला एक छोटा सा कमरा देता है, जिसमें हमारा पूरा परिवार भी नहीं समाता।"

12-14 घंटे काम करते हैं मजदूर

ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मजदूर रोजाना 12-14 घंटे तक काम करते हैं। अगर ईंट ज्यादा बनेंगी तो मजदूरी भी ज्यादा मिलेगी इसीलिए पेशगी जल्दी चुकाने के लिए मजदूर लगातार काम करते हैं। मजदूरी के नाम पर इन्हें 50 पैसे प्रति ईंट यानी 500 रुपए प्रति एक हजार ईंट दी जाती है। मजदूरों ने बताया कि दो लोग एक दिन में दो हजार ईंट बनाते हैं। साथ ही अगर उनका एक बच्चा मजदूरी कर रहा है तो उसे भी 100-120 रुपए मजदूरी दी जाती है।

हालांकि ईंट भट्टा मालिक किसी प्रकार के बच्चों के काम करने, ज्यादा वक्त काम करने से इनकार करते हैं। उनके मुताबिक वो ठेके पर काम करवाते हैं। जो जितना काम करेगा उतने पैसे मिलेंगे।

देश में हर छठा व्यक्ति मॉर्डन स्लेवरी का शिकारः रिपोर्ट

नई तरह की गुलामी यानी मॉर्डन स्लेवरी दुनिया के कई देशों में चलन में है। 2018 में वॉक फ्री की ओर से ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स में भारत का 167 देशों की सूची में 53 वां स्थान था। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रति हजार में से 6.10 लोग अलग-अलग तरह की गुलामी में जी रहे हैं। भारत में करीब 80 लाख लोग मॉर्डन स्लेवरी में रहने को मजबूर हैं।

सतत विकास लक्ष्यों के बिंदु 8.7 में आधुनिक दासता को 2030 तक दुनिया से खत्म करने की बात कही गई है, लेकिन वॉक फ्री की एक दूसरी रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की अलग-अलग सरकार जिस गति से इस समस्या से लड़ रही हैं। उससे इस लक्ष्य तक पहुंचना नामुमकिन है। वॉक फ्री के संस्थापक ऑस्ट्रेलियन फिलान्थ्रोपिस्ट और बिजनेसमैन एन्ड्रू फॉरेस्ट के मुताबिक 2030 तक इस लक्ष्य को पाने के लिए पूरी दुनिया में हर रोज 10 हजार लोगों को आधुनिक गुलामी से आज़ाद कराना पड़ेगा। जो कि असंभव सा काम है।

क्या कहता है देश का कानून?

भारत में साल 1976 में ही बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम बना दिया। लेकिन इतने साल बाद भी बंधुआ मजदूरी चरम पर है। कानून के मुताबिक इस समस्या से लड़ने के पूरे अधिकार जिला कलक्टर के पास है। कलक्टर बंधुआ मजदूरों की पहचान, रेस्क्यू और पुनर्वास के लिए जिम्मेदार हैं।

राजस्थान हाइकोर्ट में वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता अखिल चौधरी गांव कनेक्शन को बताते हैं, "एक्ट में हर बिंदु को आसानी से परिभाषित किया गया है, लेकिन जमीन पर इसे लागू ठीक से नहीं किया जा रहा। चूंकि ईंट-भट्टों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर प्रवासी होते हैं और इनका आर्थिक शोषण भी होता है। इन मजदूरों की ताकत दूसरे राज्यों में आकर कम हो जाती है। जागरूकता और पेशगी चुकाने की मजबूरी में यह कहीं शिकायत भी नहीं कर पाते। कलक्टर तक पहुंचने की भी इनकी हैसियत नहीं होती।"

अखिल चौधरी आगे जोड़ते हैं, "समय-समय पर कई हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में फैसले दिए हैं, लेकिन जमीन पर उनकी पालना नहीं होती। इसीलिए मेरा मानना है कि कानून को जमीन पर प्रभावी बनाने के प्रयास सरकार को करने चाहिए।"

लोकसभा में केंद्र सरकार ने बताया साल 2016-17 से 2021-22 तक बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए क्या हुआ। सोर्स - लोकसभा

अपने ही आंकड़ों में फंसती सरकारें

बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए 2016 में बने नियमों के मुताबिक मजदूर के पुनर्वास के लिए रेस्क्यू के तुरंत बाद आंशिक सहायता के तौर पर 20 हजार रुपए की सहायता दी जाती है। नवंबर 2021 में लोकसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि देश में 2016-17 से 2021-22 तक सिर्फ 12,760 बंधुआ मजदूरों को ही यह सहायता राशि दी गई है। इसमें राजस्थान से 2017-18 में 159 और 2020-21 में 49 मजदूर शामिल हैं। साफ होता है कि सरकारें अपने ही आंकड़ों में फंस रही हैं। एक तरफ 3.15 लाख बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने का दावा है तो दूसरी ओर सिर्फ 12,760 मजदूरों को ही आंशिक आर्थिक सहायता देने की बात संसद में स्वीकारी गई है।

इसके अलावा बंधुआ मजदूरों के कोर्ट केस लड़ने के लिए केन्द्र सरकार ने राज्यों को 2021-22 में 10 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता जारी की। इसमें से सिर्फ 2.80 करोड़ रुपए ही अब तक खर्च किए गए हैं।

ईंट भट्टों पर आधारित स्टोरी का भाग एक यहां पढ़ें-

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