आपको रज़ाई में भी ठंड लगती होगी, कभी इनके बारे में सोचिएगा ...

Anusha MishraAnusha Mishra   10 Dec 2018 11:35 AM GMT

आपको रज़ाई में भी ठंड लगती होगी, कभी इनके बारे में सोचिएगा ...फुटपाथ पर रहने वाले लोगों पर विशेष ख़बर।

उस दिन शाम कुछ जल्दी ढल गई थी, छह ही बजे होंगे। लेकिन कोहरा इतना घना था कि वाहन चालकों को लाइट जलानी पड़ गई थी। टीवी पर ब्रेंकिग चलने लगी थी, शीत लहर और घने कोहरे की चपेट में उत्तर भारत। सर्दी इतना ज्यादा थी कि जेब से हाथ निकालना मुश्किल था।

पहाड़ी इलाकों में हुई बर्फबारी के चलते दिल्ली, लखनऊ जैसे शहर में भी लोग ठिठुरने लगे थे। लखनऊ के देर रात तक गुलज़ार रहने वाले 1090 चौराहे के आस-पास सन्नाटा सा हो चला था। लेकिन उसके पीछे की सड़क के किनारे पर मिट्टी के कुछ छोटे चूल्हों में आग सुलग रही थी, वहीं सड़क किनारे ही खाना बन रहा था। कोई सब्ज़ी काट रहा था तो कोई चावल धो रहा था। ये वो लोग हैं जिन्हें एक छत भी नसीब नहीं है जहां ये सर्दी से बचकर रह सकें।

रमेश सिंह उसी सड़क के किनारे एक पतली सी टाट की बोरी से बना अपना बिस्तर बिछा रहे थे। रमेश लखनऊ में सैकड़ों आलीशान घरों को बनाने में अपना पसीना बहा चुके हैं, लेकिन इतना नहीं कमा पाए कि वो अपने लिए एक अदद छत की जुगाड़ कर पाते। अब खुला आसमान और ठंडी सड़क ही उनकी दुनिया है। फुटपाथ पर जिंदगी की कहानी सुनाते हुए रमेश बताते हैं, "अब इतनी सर्दी में खुले आसमान के नीचे इस कंबल (पतले से कंबल को दिखाते हुए) में नींद किसे आती है लेकिन कोई और चारा नहीं।'

4-5 साल से बेघरों की जिंदगी जीने वाले रमेश इस हालत के लिए कुदरत को जिम्मेदार बताते हैं, ''मेरा गाँव बहराइच में था। वहां खेतों में काम करता थे लेकिन 4 साल पहले गाँव में बाढ़ आई और पूरे खेत में बालू भर गई। सब बर्बाद हो गया। खाने के लाले पड़ गए। हम गाँव छोड़ कर लखनऊ आ गए। अब बीते 4 साल से यहीं इसी फुटपाथ पर रह रहे हैं।''

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फोटो - विनय गुप्ता

यहां रमेश जैसे 50-60 लोग यूं ही रहते हैं। रमेश के गुट से कुछ आगे इसी बालू अड्डे चौराहे पर ऐसे कई और गुट हैं। रात को कभी आप यहां से गुजरेंगे तो कई अपने आप में सिकुड़े साए, करवटें बदलते खांसते लोग नजर आएंगे। ये लोग खुले आसमान के नीचे सड़कों पर सूरज निकलने का इंतज़ार करते हैं ताकि उसकी तपिश से उन्हें हाड़ कंपाती ठंड से कुछ राहत मिल सके। ये सिर्फ लखनऊ नहीं, यहां से लेकर दिल्ली, मुंबई और लगभग हर बड़े शहर में आपको ये बेघर फुटपाथिए नजर आएंगे। सरकारी परिभाषा की बात करें तो बेघर लोग वे होते हैं जो सड़कों पर, फुटपाथ पर, फ्लाईओवर के नीचे या सीढ़ियों पर, मैदानों में, मंदिर के बाहर, रेलवे स्टेशन पर रहते हैं।

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ये लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं। कभी काम मिल जाता है और कभी नहीं। जो पैसा मिलता है उसी से खाना खर्चा चलाते हैं। सड़क का ये किनारा ही उनका कमरा है, आंगन है, रसोई है, बैठक है। ये तो उनके लिए अब उनकी ज़िंदगी ही है लेकिन इस ज़िंदगी में कई ऐसी समस्याएं हैं जो बहुत बड़ी बन जाती हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल 1.77 मिलियन यानि 17 लाख 70 हज़ार लोग बेघर हैं। देश के दो सबसे बड़े शहरों यानि मुंबई में 57,416 और दिल्ली में 46,724 लोग सड़कों पर रहते हैं। गाँव में 8.3 लाख लोग बेघर हैं तो शहरों में 9.4 लाख लोग। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 18 लाख 78 हज़ार घरों की कमी है। ये तो सरकारी आंकड़े हैं लेकिन यकीनन हकीक़त इससे कहीं अलग होगी। इन बेघर लोगों की ज़िंदगी कितनी मुश्किल होती है इसका शायद मैं और आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

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ये हैं समस्याएं

बेघरों के सामने वैसे तो कई समस्याएं होती हैं लेकिन कुछ ऐसी समस्याएं जिनका असर उन पर सबसे ज़्यादा पड़ता है...

सुरक्षा

इसमें से सबसे पहली समस्या है, सुरक्षा की। नोएडा के सेक्टर 58 में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर करीब 10 महिलाएं काम करती हैं। इनमें से कुछ की उम्र 18 - 22 साल है। अपना दिन तो ये महिलाएं मज़दूरी करते हुए बिता देती हैं लेकिन रात बिताना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है। आदमियों को तो बस सर्द हवाओं से ही खुद की हिफ़ाज़त करनी होती है लेकिन इन महिलाओं को दूसरे आदमियों से भी खुद को बचाना होता है।

इस बिल्डिंग में काम करने वाली कुसुम बताती हैं कि उनका गाँव झारखंड में था लेकिन वहां गुज़ारा नहीं चलता था तो दिल्ली चले आए, लेकिन रहने के लिए एक घर का इंतज़ाम यहां भी नहीं कर पाए। वह बताती हैं कि रात में अक्सर शराबी सड़कों पर घूमते रहते हैं जिनसे हमें खुद को बचाना होता है। कुसुम कहती हैं कि हम एक साथ नहीं सोते। दो - तीन लोग जागकर पहरा देते रहते हैं। लड़कियों को पूरा शरीर ढककर सोने के लिए कहा जाता है। उनका हाथ - पांव भी बाहर न आ पाए जिससे किसी को ये न पता चले कि कंबल के अंदर लड़की सो रही है या आदमी है।

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31 अगस्त 2016 को ऐसा ही एक मामला कोलकाता में सामने आया था। जहां फुटपाथ पर अपनी मां के साथ सो रही एक 12 साल की बच्ची का दो आदमियों ने बलात्कार किया था और उसकी हत्या करके, लाश को कैनाल में बहा दिया था।

फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ने के मामले भी सामने आते रहते हैं। लखनऊ में 1090 चौराहे के पीछे रहने वाले रमेश बताते हैं, ये वही जगह है जहां पिछले साल शराब पीकर गाड़ी चला रहे एक युवा ने 5 मज़दूरों पर गाड़ी चढ़ा दी थी। उन पांचों की मौत हो गई। ये घटना 8 जनवरी 2017 की है। वो बताते हैं कि ये घटना हमारी आंखों के सामने हुई थी। इसके बाद जाने कितनी रातें हमने जागते हुए बिता दीं लेकिन क्या करते कोई और ठिकाना भी नहीं है। कहीं भी जाएं, ये ख़तरा तो बना ही रहेगा।

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भुखमरी

सड़कों पर रहने वाले कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कहीं काम मिल जाता है लेकिन इनमें से कुछ को कई कई दिनों तक काम नहीं मिलता। कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। ऐसे में कुछ मज़बूरी में भीख मांगना शुरू कर देते हैं, तो कुछ की मौत भूख से हो जाती है। सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलेपमेंट के आंकड़ों के अनुसार, अकेले दिल्ली में दिसंबर 2015 में 279 बेघरों की मौत सर्दी और भूख से हो गई। ज़्यादातर बेघर दूसरे गाँवों या शहरों से आए लोग होते हैं। इनमें से ज़्यादातर के पास मतदाता पहचान पत्र तक नहीं होता जिससे इन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाला राशन भी नहीं मिल पाता।

स्वास्थ्य

बेघर लोगों के लिए स्वास्थ्य भी एक बड़ी समस्या होती है। हमेशा खुले में रहने, सुविधाओं के अभाव में कई बीमारियां इन्हें घेर लेती हैं। मुश्किल ये है कि न तो ये डॉक्टर को दिखा पाते हैं और न ही अपनी देखभाल खुद कर पाते हैं। लखनऊ के लोहिया अस्पताल में फिजीशियन एससी मौर्या बताते हैं – खुले में रहने और ठंड के सीधे संपर्क में आने के कारण इन्हें निमोनिया हो जाता है, अस्थमा की समस्या बढ़ जाती है। सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार तो इनके लिए आम समस्याएं हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर ऐसे होते हैं जो कभी डॉक्टर के पास नहीं जा पाते और ऐसे ही सड़क पर दम तोड़ देते हैं।

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मानव तस्करी

वेबसाइट गार्डियन के मुताबिक 15 जून 2017 को सुबह 3 से 5 बजे के बीज पश्चिम बंगाल के सियालदह रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म 14ए से तीन साल की एक बच्ची का अपहरण हो गया। वो बच्ची अपने मां -बाप के बीच में सो रही थी। सिर्फ सियालदह रेलवे स्टेशन से ही जून 2016 से मई 2017 के बीच अपहरण हुए 1628 बच्चों को पुलिस ने ढूंढा। ये उन हज़ारों बच्चों में से थे जो हर ट्रेन से अकेले सफर करते हैं या बेघर हैं और प्लेटफॉर्म पर रहते हैं। एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक, साल 2016 में मानव तस्करी के 8000 मामले सामने आए, जिसमें 15, 379 लोगों की तस्करी की गई। इसमें से 9,034 यानि लगभग 58 फीसदी की उम्र 18 वर्ष से कम है।

रैनबसेरों का हाल

गोमती नगर के एक फुटपाथ पर 10 साल से ज़िंदगी बिता रहे गोगे बताते हैं, ''पिछले साल सर्दी बहुत थी। मेरे पास बस एक कंबल था जिससे सर्दी नहीं जाती थी। मैंने सोचा कि रैनबसेरे में चला जाऊं लेकिन जिस दिन मैं वहां गया उसी दिन एक बूढ़े व्यक्ति का सामान वहां से चोरी हुआ था। मेरे पास तो वैसे ही थोड़ा सा सामान था, अगर वो भी चोरी हो जाता तो मैं क्या करता। यही सोचकर मैं वापस आ गया और इसी फुटपाथ पर सो गया। अब यही मेरा घर है।

फुटपाथ पर वो अपने सामान की सुरक्षा कैसे करते हैं ये पूछने पर गोगे बताते हैं, ''रात में तो सिर के नीचे सामान रखकर सोता हूं और दिन में जब काम पर जाता हूं तो पेड़ पर टांग कर उसे छिपा देता हूं।'' गोगे बताते हैं कि कई रैनबसेरे ऐसे भी हैं जहां के संचालक इन बेघरों से वहां रुकने के लिए पैसे मांगते हैं।

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