क्या कूड़े में ही बीत जाएगी कूड़ा बीनने वालों की ज़िंदगी

कचरा उठाने वालों का दिन या यूं कहिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा कूड़े के बीच ही बीत जाता है। ये वो समूह है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में एक अहम भूमिका निभा रहा है। कभी उसके चेहरे के भाव पढ़ें हैं...शायद नहीं।

क्या कूड़े में ही बीत जाएगी कूड़ा बीनने वालों की ज़िंदगीसाभार इंटरनेट

लखनऊ। सुबह जब आप आखों को मीचते हुए एक गहरी नींद से उठकर अपने गेट तक अखबार उठाने जाते हैं, या जब फिर जब आप नहा धोकर अपने काम के लिए अपने ऑफिस निकलते हैं, कुछ लोग आपके कॉलोनी, अपार्टमेंट या मोहल्ले को साफ करने में जुटे होंते हैं। ये वो कूड़ा भी उठाते हैं जिसे आप छूना तक पसंद नहीं करते। लोगों के घरों और कॉलोनियों का ये समूह है कूड़ा बीनने वाले, कचरा उठाने वाले रैगपिकर्स (कूड़ा उठाने वाला) का। ये वो लोग हैं जिनके दिन का, या यूं कहिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा कूड़े के बीच ही बीत जाता है। ये वो समूह है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में एक अहम भूमिका निभा रहा है। जिस कचरे वाले को आप दूर से अपने घर की डस्टबिन या कचरे से भरी पॉलीथीन पकड़ाते हैं, कभी उसके चेहरे के भाव पढ़ें हैं...शायद नहीं।

लखनऊ में एक इलाका है बालू अड्डा। जहां 6 मई 2017 को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने झाड़ू लगाकर स्वच्छता अभियान को रफ्तार देने का वादा किया था। यहां से थोड़ी दूर पर ही कूड़ा बीनने वाले रैगपिकर्स का एक समूह रहता है। छोटी-छोटी झोपड़ियां, आस-पास कबाड़, प्लास्टिक, टीन के डिब्बे, शीशे, चप्पल, जूते, गंदे कपड़े, थर्माकोल, गीले कचड़े पर बैठती मक्खियां, उनसे निकलती बदबू और इन सब के बीच भी कुछ बच्चे जो खेलते, मुस्कुराते नज़र आते हैं। ये समूह असम से आया हुआ है, जिसमें छह बड़े और चार बच्चे शामिल हैं। जो अपनी रोज़ी रोटी के लिए कूड़ा बीनने का काम करते हैं।


नहीं बनना मां जैसा
वैसे तो इनका पूरा परिवार इसी काम में जुटता है। सनियारा खातून (11 वर्ष) समूह के सदस्यों में से एक है। सनियारा की मां कूड़ा बीनने का काम करतीं हैं। यहां आसपास की ऊंची इमारतों से जो कूड़ा फेंका जाता है, सनियारा की मां उसी में अपने काम की चीजें तलाश लेती हैं। सनियारा को पढ़ने का शौक नहीं, लेकिन उसे बड़े होकर अपनी मां की तरह भी नहीं बनना। उसकी मां आकलिमा खातून (42 वर्ष) बताती हैं, "कूड़ा के काम से महीने में पांच हजार से छह हज़ार की कमाई हो जाती हैं। किचन के सामान और घर के कबाड़ के अलावा कूड़े में उन्हें डायपर्स और सेनेटरी नैपकिन जैसी चीज़े मिलती हैं, जिसे वो न चाहते हुए भी छूने को मजबूर होती हैं।"
बॉयो-मेडिकल वेस्ट रूल्स 1998 के मुताबिक कोई भी कचरा जो खून, मल और शरीर के तरल पदार्थ से जुड़ा हुआ हो उसे दूसरे कचरे के साथ नहीं फेंका जाना चाहिए। सरकार से क्या उम्मीद है इस सवाल पर आकलिमा का जवाब था कि इससे पहले भी उनसे इस तरह के सवाल कई दफ़ा किए जा चुके हैं पर आज तक उन्हें कुछ नहीं मिला। आकलिमा का सपना है अपना खुद का एक घर। इन्हीं कूड़ा बीनने वालों की झोपड़ी में शहनाज़ बेगम (16 वर्ष) भी रहती है। वो बताती है कभी-कभी कूड़ा बीनने के दौरान उनके पीछे कुछ युवक पड़ जाते हैं जो मना करने पर भी नहीं मानते और परेशान करते हैं।
आगे की पीढ़ी हो शिक्षित और करे तय वेतन वाली नौकरी
इमदाद अहमद जो भंगार (कबाड़ी) का काम करते हैं। बताते हैं, वो शहर के लोगों से कबाड़ का सामान खरीदते हैं। प्लास्टिक, टीन और पेपर तीनों को वो अलग बेच देते हैं। उन्हें लोहे का सबसे ज़्यादा पैसा मिलता है और कॉपी किताब सबसे कम दामों में बिकता है। इमदाद नहीं चाहते की उनसे जुड़े लोग आगे भंगार का काम करें। वो चाहते हैं की उनकी आगे की पीढ़ी शिक्षित होकर महीने में एक तय वेतन वाली नौकरी करे।
भारत में एक अनुमानित तौर पर रैगपिकर्स की संख्या 1.5 लाख से 4 लाख के बीच मानी जाती है। कूड़ा बीनने के दौरान इन्हें शीशे, लोहे या दूसरे मेटल्स से लगने वाली खरोच, इन्फेक्शन्स, टीबी, सांस की बीमारियों का खतरा बना रहता है। ये भारत में एक साल में 62 लाख टन कूड़े को साफ़ करने में मदद करते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो ये आधा से ज्यादा नगर निगम का काम निपटाते हैं। इनके योगदान के लिए इन्हें राष्ट्रीय सम्मान देने तक की बात की जा चुकी है।
ज्यादातर रैगपिकर्स का एक अनौपचारिक क्षेत्र से होना इन्हें कई अधिकारों से वंचित रखता है। जिसकी वजह से ये सीधे नगर निगम या कानूनी व्यापारियों से नहीं जुड़ें होते। जिससे ये जॉब सिक्योरिटी और एक तय मजदूरी का लाभ नहीं उठा पाते।
अक्टूबर 2017 लखनऊ में 6000 कूड़ा बीनने वालों को स्वछता अभियान से जोड़ा जाना था। जो गोमतीनगर, अलीगंज, और जानकीपुरम के साथ साथ अन्य क्षेत्रों में कूड़ा बीनकर शहर की सफाई में योगदान देते। जिसके बाद नगर निगम प्रशासन ने मध्य प्रदेश और केरल के तर्ज पर रैग पिकर्स को आईकार्ड के साथ साथ वर्दी और कूड़ा बीनने के उपकरण मुहैया कराये थे।


एक तय वेतन, बच्चों की शिक्षा और एक बेहतर जीवन
लखनऊ नगर निगम में पर्यावरण अभियंता इंजी. पंकज भूषण बताते हैं, " कूड़ा बीनने वाले औपचारिक रूप से नगर निगम के साथ काम कर रही ईकोग्रीन एनर्जी जैसी कंपनी के साथ जुड़कर काम करना ही नहीं चाहते। दरअसल कंपनी के साथ जुड़ जाने पर इनके परिवार के किसी एक ही सदस्य को कूड़ा बीनने का काम करना होगा और उन्हें महीने में एक तय वेतन ही मिलेगा। जिस दिन भारत में सॉलिड वेस्ट सिस्टम जिसके अंतर्गत डोर से डोर गार्बेज कलेक्शन आता है, 100 प्रतिशत लागू हो जायेगा उस दिन रैगपिकर्स का रोल पूरी तरह से ख़त्म हो जायेगा।" पंकज भूषण इन लोगों पर एक गंभीर आरोप भी लगाते हैं, "रैगपिकर्स कबाड़ से कीमती चीज़ों को निकाल लेते हैं बाकी कचरे को वहीँ छोड़कर गंदगी फैलाते हैं।" 2017 में स्वच्छ भारत अभियान से जिन 6000 रैगपिकर्स को जोड़ने की बात कही गई थी उस में से आज बस 135 रैगपिकर्स ही ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के साथ काम कर रहे हैं। इनमें से भी कुछ-आधे गायब हो चुके हैं। एक औपचारिक कंपनी के साथ जुड़ जाने पर रैगपिकर्स को एक तय वेतन, बच्चों की शिक्षा और एक बेहतर जीवन मिल सकेगा।
बाघ और बकरी, ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी और कूड़ा बीनने वाले
ऑल इंडिया कबाड़ी मज़दूर महासंघ से जुड़े शशि भूषण पंडित बताते हैं, '' देश में सोशल सिक्योरिटी एक्ट 2008, जो असंगठित श्रमिकों के लिए काम करता है। इसी के अंतर्गत रैगपिकर्स या वेस्टपिकर्स भी आते हैं। रैगपिकर्स को एक व्यावसायिक पहचान मिलनी चाहिए। रैगपिकर्स पर ऐसा आरोप भी लगाया जाता है वो बांग्लादेशी हैं। 2016 में भारत सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक कानून बनाया जिसके अंतर्गत ये साफ़-साफ़ लिखा है की रैगपिकर्स को सॉलिड वेस्ट सिस्टम से जोड़ा जाये।"

शहर में एक बनिये को कूड़ा प्रबंधन का काम सौंप दिया जाता है, जिसका मकसद है सिर्फ पैसे कमाना। नगर निगम को रैगपिकर्स को अपने साथ जोड़ना चाहिए पर वो ईकोग्रीन एनर्जी जैसी कंपनी से रैगपिकर्स को जोड़ रहे हैं, जिसे अपने पैसों से मतलब है पर्यावरण से नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक महत्वाकांक्षी सपना है स्वच्छ भारत अभियान का, जिसको ध्यान में रखते हुए अगर रैगपिकर्स को वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हिस्सा बनाया जाये, तो वो कचरा जो शहर, गांव और मोहल्ले पैदा करते हैं, उसका नब्बे प्रतिशत इस्तेमाल किया जा सकता है, अगर रैगपिकर्स को इसका अधिकार दिया जाए।
ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के साथ रैगपिकर्स को जोड़ने के सवाल पर शशि भूषण पंडित कहते हैं कि "अगर बाघ और बकरी को एक ही घाट पर खड़ा कर दिया जाए, तो बाघ बकरी को मार देगा, यहां बाघ ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी है और बकरी रैगपिकर। ईकोग्रीन एनर्जी जैसी कंपनी में प्रधानमंत्री के करीबी हैं, ये संस्था कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रही है, जो बस अपना मुनाफा देखती है।" प्रवीन कुमार और छेदा लाल जो ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के साथ मिलकर नगर निगम के अंतर्गत घर-घर जाकर कूड़ा उठाने का काम करते हैं, बताते हैं की ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के साथ काम करने से ज्यादा अच्छा है अपने खुद के किसी संगठन से जुड़ना, क्योंकि यहां इन्हें 45 दिन बाद इनके काम का भुगतान होता है।
ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी
इस बारे में बात करने पर ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के जनरल मैनेजर आशीष शर्मा दिल्ली से फोन पर बताते हैं '' ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी से रैगपिकर्स का काम न करना उनका अपना निर्णय है। कंपनी के साथ कई रैगपिकर्स जुड़े और कई नहीं जुड़े। हमने रैगपिकर्स को वाहन उप्लब्ध कराये कूड़ा उठाने के लिए हम ठेले पर कूड़ा नहीं उठवाते। वेतन समय पर न दिए जाने पर आशीष बताते हैं की ईकोग्रीन एनर्जी कंपनी के 24 करोड़ आज नगर निगम में पेन्डिंग पड़े हैं, जिसकी वजह से एक डेढ़ महीने से वेतन समय पर न दिए जा पाने की दिक्कत आ रही है, इसके बावजूद कंपनी अपना काम कर रही है। आशीष का मानना है की विकासशील और विकसित देशों में रैगपिकर्स जैसे कोई लोग ही नहीं हैं, हम भारत में भी ऐसा कुछ क्यों नहीं कर सकते। वेस्ट या कूड़ा-कचड़ा ये हाथ से छूने वाली चीज़ ही नहीं है।
स्वच्छ वातावरण और बेहतर ज़िंदगी की मांग
भारत में रैगपिकर्स की संख्या 1.4 मिलियन से 5 मिलियन के बीच है । सड़क पर, नाले किनारे या कूड़े के ढेर से कचरा बीनना शायद ही किसी का पसंदीदा काम हो। पेट पालने के लिए कूड़ा बीनना इनकी मजबूरी बन चुकी है। एक बेहतर आजीविका के लिए जरूरी है एक बेहतर रोजगार। जहां सेहत से खिलवाड़ ना हो, जहां दिन एक साफ़ वातावरण में गुजरे और जहां इनके छोटे-छोटे सपने सच हो। राजनीति और अधिकारों की लड़ाई इन कूड़ा बीनने वालों की समझ से परे है। इनकी मांग है तो बस एक स्वच्छ वातावरण और बेहतर ज़िंदगी की। जहां सनियारा जैसे बच्चे ये समझ पाए की अगर मां जैसा नहीं बनना तो शिक्षित होना जरुरी है । जहां इमदाद अहमद अपने आगे आने वाली पीढ़ी को पढ़ लिखकर एक तय वेतन वाली नौकरी के साथ देख सके ।

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