पानी की कमी: चुनाव बुझाएंगे राजस्थान की प्यास?

राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। देश की ज़मीन का 11 प्रतिशत इसके हिस्से आता है और पानी का केवल 2प्रतिशत। आधे से अधिक राजस्थान पानी की कमी की चपेट में है। चुनाव के दौरान नेता उनकी सभी परेशानियाँ दूर करने का दावा करते हैं तब चारों ओर से केवल एक ही माँग उठती है और वो है, पानी

करौली/जयपुर/अलवर। राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। देश की ज़मीन का 11 प्रतिशत इसके हिस्से आता है और पानी का केवल 2प्रतिशत। राज्य का आधे से अधिक हिस्सा सूखे की चपेट में है। राजस्थान में 7 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों में इस समस्या का स्थाई निवारण एक प्रमुख मुद्दा है।

मूंगाबे इंडिया ने में राजस्थान के लगभग हर ज़िले में पानी कि कमी को एक महत्वपूर्ण मुद्दा पाया। पानी को लेकर होने वाला झगड़ा आम बात है। इसके बावजूद, सामुदायिक प्रयासों की सफलता की कुछ कहानियाँ राहत देती हैं।

सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 370 बिलियन रुपए की एक परियोजना का प्रस्ताव दिया है। इससे राजस्थान के 13 ज़िलों में पीने और कृषि के पानी की व्यवस्था की जाएगी। कांग्रेस के घोषणापत्र में भी पानी पर कोई घोषणा होने की उम्मीद है। राजस्थान के आगामी चुनावों में पर्यावरण की भूमिका पर दो भागों में प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट का यह पहला भाग है। दूसरे भाग में राज्य में खनन के मुद्दे पर बात की जाएगी।

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अपने खेतों के सामने खड़े अस्सी साल के रघुबीर की आँखें अपने गाँव में पानी की कमी के बारे में बताते हुए भर आती है और गला रुंध जाता है। राजस्थान के करौली ज़िले के धूल भरे खेड़ा मंदेली गांव में लोग न केवल साल भर पीने के पानी की कमी से झूझते हैं बल्कि पानी की कमी से फसलों को होने वाला नुकसान भी उनकी कमर तोड़ देता है।

" हमेँ बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।आप देखो अभी गेहूँ कि फसल खड़ी है और जल्द ही यह पानी की कमी से बर्बाद हो जाएगी। हम क्या कर सकते हैं? अब हमें मजदूरी का काम भी नहीं मिलता और खेती करना यहाँ संभव नहीं है। बच्चे कमाने शहर निकल जाते हैं और हमें यहाँ भुगतना पड़ता है।" रघुबीर ने दुखी मन से कहा।

राजस्थान के इस अकाल ग्रस्त क्षेत्र में महिलाएं को चिलचिलाती धूप में पानी लाने के लिए मीलों चलना पड़ता है। खेड़ा मंदेली से कुछ किलोमीटर दूर शाहनपुर गाँव में महिलाएं कुंए के आगे घंटों कतार में खड़ी रहती हैं। यह लंबा इंतज़ार इलाक़े में इंसानों और जानवरों की प्यास बुझाने का एकमात्र ज़रिया है। खेती के लिए भी गाँव वाले इसी कुँए पर आश्रित हैं।

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"मेरा घर यहाँ से लगभग एक किलोमीटर दूर है। कभी-कभी हमें अपनी बारी के लिए दो-तीन घंटे खड़े रहना पड़ता है। घर की सभी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चार से पाँच बार पानी ले जाना पड़ता है। नेता चुनाव में हर साल वादा करते हैं लेकिन किसी ने हमारी परेशानी दूर करने की कोशिश नहीं की।" बीस साल की रिजवाना ने बताया। यह केवल एक गाँव या एक ज़िले की कहानी नहीं है। आधे से अधिक राजस्थान पानी की कमी की चपेट में है। चुनाव के दौरान नेता उनकी सभी परेशानियाँ दूर करने का दावा करते हैं तब चारों ओर से केवल एक ही माँग उठती है और वो है - पानी।


मूँगाबे- इंडिया ने पूरे राजस्थान में यात्रा की। लगभग हर गाँव में एक जैसी कहानी सुनने को मिली। इस साल नवंबर और दिसंबर में पाँच राज्यों- राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगान, राजस्थान और मिज़ोरम- में चुनाव होने हैं। राजस्थान की 200 सीटों वाली विधानसभा के लिए 7 दिसंबर को चुनाव होने हैं। इन राज्यों के चुनावों के नतीजे 11 दिसंबर को आएंगे। 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए राजस्थान का चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है। लोकसभा की 25 सीटें राजस्थान से आती हैं।

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"यह सरकार अंधी है। यह हमारा दर्द नहीं देख सकती।" गुस्से से भरे रघुबीर ने कहा। "वह (राजनेता) पाँच साल में एक बार आकर वादे करते हैं लेकिन चुनावों के बाद हमारी सुध कोई नहीं लेता। केवल ऊपर वाले को हमारी चिंता है। क्योंकि जब बरसात होती है तब ही हमें कुछ राहत पहुँचती है।"

राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। क्षेत्रफल में यह देश का ग्यारवां हिस्सा है और देश की छ प्रतिशत जनसंख्या यहाँ रहती है। लेकिन भारत के कुल भूजल का दो प्रतिशत से भी कम हिस्सा यहाँ है। राज्य सरकार हालांकि कई कल्याणकारी योजनाओं पर इठलाती है, प्रमुख तौर से "मुख्यमंत्री जल स्वावसंबन अभियान(एमजेएसए) पर। बेहतर जल प्रबंधन और संरक्षण के लिए 2016 में शुरू हुई इस योजना में का लक्ष्य चार साल में 21,000 से अधिक गाँवों तक पहुँचने का है। 2017-18 में अपने तीसरे चरण में एमजेएसए अब तक 4,240 गाँवों और 123 शहरों में पहुँची है। अधिकारी कहते हैं कि अलग- अलग विभागों के एक साथ काम करने के कारण इस कार्यक्रम को सफलता मिली है।


"साझा प्रयासों से हमेशा बेहतर नतीजे मिलते हैं। इससे पहले हर विभाग की अपनी अलग योजना थी। इससे योजनाओं में देरी होती थी। अब पहली बार सभी विभाग साथ आए हैं और एक लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं। " करौली के उप वनसंरक्षण अधिकारी शशि शेखर पाठक ने बताया।

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इससे पहले नीति आयोग की एक रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि भारत में 600 करोड़ से अधिक लोग पानी की भारी किलल्त में जी रहे हैं। राजस्थान के पर नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि सिंचाई में भागीदारी और स्रोत की मरम्मत के सूचकांकों के अनुसार स्तिथि में सुधार हुआ है लेकिन अभी भी राज्य "कमतर प्रदर्शन" की श्रेणी में आता है। नीति आयोग के रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राजस्थान में भूजल प्रबंधन को लेकर नियमों का खाका अभी तक तैयार नहीं हुआ है और इस कारण राज्य सिंचाई के पानी के आंकड़ों में पीछे है।


इस कारण आम लोगों को परेशानी तो हो ही रही है, गाँवों से छोटे शहरों की ओर पलायन करने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। शाहनपुर गाँव में रहने वाले 62 साल के अब्दुल कादिर ने बताया, "पानी की कमी से जीना दूभर हो रहा है। केवल बरसात में ही राहत मिलती है। जनवरी के बाद पानी का स्तर नीचे जाने लगता है जिससे हमें पानी नहीं मिल पाता।"

करौली ज़िले के ही सकलूपुरा गाँव में रहने वाली सुखीबाई देवी भी कुछ यही बताती हैं। " पीने के पानी वाले कुएं में बहुत कम पानी है। पास से एक नदी गुज़रती है जहाँ पशु पानी पीते हैं और हम कपड़े धोने जाते हैं। लेकिन गर्मियों में नदी भी सूख जाती है और ज़मीन का पानी भी ग़ायब हो जाता है।"

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लेकिन करौली के ज़िला अधिकारी अभिमन्यू कुमार गाँव वालों की परेशानियों के बारे में पूछे जाने पर साफ़ तौर पर मना कर देते हैं। "यहाँ पानी की कोई कमी नहीं है। हम चंबल- नदौती जल आपूर्ती परियोजना जैसे कई कार्यक्रम चला रहे हैं और पानी सभी को मुहैया है।" बार-बार पूछे जाने के बाद उन्होंने माना कि "गर्मियों में शायद कुछ दिक्कत हो सकती है।"

गाँव जहाँ खाली हो रहे हैं वहीं शहरों में जनसंख्या बढ़ रही है। इस कारण शहरों में भी पानी की आपूर्ती दबाव में है। राज्य की राजधानी जयपुर के पानी की 80% आपूर्ति बिलासपुर बाँध से होती है जो बरसाती नदी के संचय पर आधारित है। लेकिन बढ़ती माँग के देखकर यह साफ़ है कि बाँध का पानी जल्द ही ख़त्म हो जाएगा। इस साल हुई कम बरसात के कारण पहले ही राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने शहरी घरों में पानी की आपूर्ति समय घटा दिया है। इस बाँध से टोंक और अजमेर को भी जल आपूर्ती होती है। मार्च के बाद स्थिति बिगड़ सकती है।

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पानी को लेकर होने वाली लड़ाइयाँ आम हैं और लोग चोरी हो जाने के डर से पानी ताले में रखते हैं। आम जनता की परेशानियाँ सामने आने लगी हैं। हाल ही में अजमेर के दुकानदारों, सरकारी कर्मचारियों और व्यापार मंडलों ने "पानी नहीं तो वोट नहीं" अभियान चलाया था।

भाजपा ने 27 नवंबर को अपना घोषणापत्र जारी किया जिसमें पूर्वी राजस्थान कैनाल परियोजना, ईआरसीपी, का प्रस्ताव है। इससे 13 जिलों की पीने और सिंचाई की परेशानियाँ दूर होंगी। केंद्रीय जल आयोग के सामने इसे प्राथमिकता के साथ पेश किया जाएगा। मैग्सेसे औऱ स्टॉकहोम वॉटर पुरस्कार प्राप्त राजस्थान के जल संरक्षण और पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह कहते हैं, " टैंकर माफिया के दबाव अधिकतर सरकारी योजनाएं असफल हुई हैं। कुछ सामुदायिक प्रयास इस स्थिति में आशा की किरण लेकर आए हैं।"

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करौली ज़िले के महाराजपुर गाँव में बरसाती पानी के संचय के लिए एक बड़ा तालाब बनाया गया है। ग़ैर सरकारी संगठन, तरुण भारत संघ की मदद से गाँव वालों ने मिट्टी और कंक्रीट की एक 68 मीटर ऊँची दीवार बनाकर एक तालाब का निर्माण किया है। आज इस तालाब से डेढ़ किमी दायरे में सिंचाई मुहैया हो रही है। आसपास के सौ से अधिक परिवार इस तालाब पर निर्भर हैं।

महाराजपुर गाँव के ही 45 साल के रामसहाय के चेहरे पर तालाब के बारे में बताते हुए खुशी चमक उठती है। वो कहते हैं, "छ साल पहले हमारे पास पीने और सिंचाई के लिए पानी नहीं था। फिर हमने इस तालाब को बनाने के लिए हर घर से पैसा इक्ठ्ठा किया। आज भू जल स्तर भी सुधर गया है और हम गेहूँ, सरसों और सब्जियों की फ़सलें भी उगा लेते हैं।"

तरुण भारत संघ के चमन सिंह कहते हैं कि," पथरीली जमीन में हरियाली लाने और सूखे तालाबों को पूर्नजिवित करने का यही तरीका है। लेकिन बदकिस्मती से सरकार ऐसी कोशिशों में लोगों की हौसलाफजाई नहीं कर रही है।"

यह खबर मूंगाबे इंडिया में पहले प्रकाशित हो चुकी है।

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