मोलेला, कावड़ और फड़ - राजस्थान की पारंपरिक कलाओं को मिल रही नई पहचान

कला जीवन का अनुकरण करती है। शायद इसलिए राजस्थान के पारंपरिक मोलेला, कावड़ और फड़ चित्र भी आधुनिक समाज में प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। धार्मिक अनुष्ठानों और मनोरंजन कार्यक्रमों में गौरव बनने वाली ये कला अब खुद को अलमारी के दरवाजों और डिजाइनर कपड़ों पर पा रही है।

Parul KulshreshtaParul Kulshreshta   9 Dec 2022 5:50 AM GMT

मोलेला, कावड़ और फड़ - राजस्थान की पारंपरिक कलाओं को मिल रही नई पहचान

कुछ पारंपरिक लोककलाएं है जिन्हें हम मोलेला, कावड़ और फड़ के नाम से जानते हैं। इनका संबंध मूल रूप से धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जुड़ा रहा है। लेकिन आज यह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। सभी फोटो: अरेंजमेंट

जयपुर, राजस्थान। राजस्थान की खूबसूरती उसके रेत के टीलों, यहां से वहां भटकते लोक गायकों, पवित्र उपवनों और युद्ध के नायकों में छिपी हुई है, जो खुद को शानदार परंपरा, प्रेरक संगीत और जीवंत कला से और खूबसूरत बना लेती है।

राजस्थान में कहानी कहने, कठपुतली शो, हरि कथा और अन्य सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों की पृष्ठभूमि के रूप में कला का बड़े पैमाने पर मनोरंजन के क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन तकनीक के आने से यह सब कहीं पीछे छूटता चला गया।

ऐसी ही कला कुछ कला परंपराएं है जिन्हें हम मोलेला, कावड़ और फड़ के नाम से जानते हैं। इनका संबंध मूल रूप से धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जुड़ा रहा है। लेकिन आज यह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। इस कला को जिंदा बनाए रखने के लिए कलाकारों को कड़ी मेहनत से गुजरना पड़ रहा है। कलाकार कहते हैं, अक्सर, यह एक हारी हुई लड़ाई लगती है।

कुम्हारों की मोलेला कला

राजस्थान के दक्षिण में राजसमंद जिले का एक गुमनाम गाँव है मोलेला। यहां कलाकारों का एक समुदाय 800 साल पुरानी लोक कथा को मानते हुए इस कला को अपनाए हुए है।

कहा जाता है कि एक अंधे कुम्भार (कुम्हार) को सपने में देवनारायण देवता दिखाई दिए। उन्होंने उससे गांव में उपलब्ध एक खास मिट्टी से देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने का निर्देश दिया और उसे आश्वासन दिया कि अगर वह ऐसा करता है तो उसकी आंखों की रोशनी वापस आ जाएगी। कुम्भार ने उनके आदेश को माना। उसके बाद से उसे दिखाई देने लगा था। और इस तरह से मोलेला कला की परंपरा शुरू हुई।

कलाकार एक सपाट सतह पर देवी-देवताओं की तस्वीरों को एक टाइल या पट्टिका पर बनाते हैं जो पारंपरिक रूप से मंदिरों में स्थापित की जाती हैं।

यहां कलाकारों का एक समुदाय 800 साल पुरानी लोक कथा को मानते हुए इस कला को अपनाए हुए है।

लोक देवता ने अंधे कुंम्हार को जिस 'खास मिट्टी' का इस्तेमाल करने के लिए कहा था, वह मोलेला गाँव में ही पाई जाने वाली मिट्टी है। इसे गधों या घोड़ों के गोबर के साथ मिलाया जाता है और घंटों तक गूंथा जाता है। मूर्तियों को आकार देने के लिए मिट्टी को तैयार करने से पहले उसे आठ घंटे तक भट्टी में पकाया जाता है।

मोलेला कलाकार दिनेश चंद कुंभार के अनुसार, यह धार्मिक कला विशेष रूप से मेवाड़ क्षेत्र में खासी पसंद की जाती है। देवनारायण के आदिवासी भक्त मोलेला तक मीलों पैदल यात्रा करते हैं, कलाकारों से मूर्तियां खरीदते हैं और उन्हें पूरे रास्ते नाचते-गाते अपने गांवों में ले जाते हैं।

दिनेश चंद गाँव कनेक्शन को बताया, "मंदिरों के आसपास मेले लगते हैं और पूरा गांव वहां पूजा करने और उत्सव में हिस्सा लेने आता है।" हालांकि कला पारंपरिक प्रथाओं का अभिन्न अंग बनी हुई है, लेकिन अब यह धर्म की सीमाओं से भी बाहर निकल रही है।

दिनेश चंद ने कहा, "इनोवेशन और प्रयोग के बिना किसी का भी कोई अस्तित्व नहीं है। हमनें लोक देवताओं से शुरुआत की थी और मीरा बाई व महाराणा प्रताप जैसे अपेक्षाकृत आधुनिक विषयों पर चले गए। इसके अलावा निश्चित रूप से रामायण और महाभारत की कहानियों को भी फिर से गढ़ा गया है।"

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मोलेला कला का एक तरह से दस्तावेजीकरण हो रहा है। कलाकार ने याद करते हुए बताया, "जब मेरे पिता ने पहली बार हवाई यात्रा की, तो उन्होंने मुझे अपनी कला के जरिए उस कहानी को बयां करने के लिए कहा। पहली बार हवाई यात्रा करने वाले एक गाँव के व्यक्ति और उसके सामने आने वाली बाधाओं की कहानी। मुझे इसे पूरा करने में कुछ सप्ताह लगे, लेकिन मुझे लगता है कि यह कला के परिवर्तन की शुरुआत थी।"

मोलेला कलाकार गाँव की तेजी से घटती मिट्टी को लेकर चिंतित हैं जो उनकी कला का एक महत्वपूर्ण घटक है। कलाकारों को डर है कि ईंट भट्ठे हर जगह खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर खनन जल्द ही इसे खत्म कर देगा।

मोलेला कला का इस्तेमाल बड़े फ्रीज (FRIEZES) के रूप में किया जा रहा है। दिनेश चंद ने कहा, "कभी-कभी ऑर्डर बड़े होते हैं और इसे पूरा करने में हमें कई सप्ताह लग जाते हैं। मैंने हाल ही में उदयपुर रेलवे स्टेशन के लिए एक प्रोजेक्ट पूरा किया था। इसमें में मुझे लगभग दो महीने लग गए थे।"

मोलेला के कुछ कलाकार दुनिया भर में घूम रहे हैं और उन्हें दुनिया भर से ऑर्डर मिल रहे हैं। उन्होंने अपनी पुरानी लोक कला को समसामयिक विषयों में रूपांतरित किया है, जो उन्हें आर्थिक रूप से काफी फायदा पहुंचा रहे हैं।

दिनेश चंद के मुताबिक, लेकिन सभी ऐसा नहीं कर पाते हैं। उनके कई साथी कलाकारों ने नौकरी छोड़ दी और नियमित आय के लिए नौकरी करने लगे।

मोलेला कलाकार गाँव की तेजी से घटती मिट्टी को लेकर चिंतित हैं जो उनकी कला का एक महत्वपूर्ण घटक है। कलाकारों को डर है कि ईंट भट्ठे हर जगह खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर खनन जल्द ही इसे खत्म कर देगा।

उन्होंने कहा, "हमने इस खनन को रोकने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। सरकार कम से कम हमारे गांव में खनन के लिए लाइसेंस जारी करना बंद करे। वरना ये कला जिंदा नहीं रह पाएगी। "

कावड़ की कला

मोलेला से लगभग 400 किलोमीटर उत्तर में चित्तौड़गढ़ जिले का बस्सी गाँव है। वहां भी कावड़ नामक एक पुरानी कला मौजूद है।

कावड़ रंग-बिरंगे पेंट किए गए पैनल से बना होता है जो आपस में जुड़े होते हैं। इसका इस्तेमाल कहानी सुनाने के सत्रों की पृष्ठभूमि के रूप में किया जाता था। पुराने समय में कथावाचक स्थानीय लोक देवताओं के चमत्कारों के अलावा, रामायण और महाभारत में महाकाव्य नायकों के वीरता की कहानियों के साथ दर्शकों का मनोरंजन किया करते थे।

आधुनिक जीवनशैली के साथ कावड़ की कला फीकी पड़ती चली गई। कहानी सुनाना अब तकनीक के दायरे में आ गया है। किसी के पास इत्मीनान से सामुदायिक-गतिविधियों जैसे कि रंगमंच, कथा आदि के लिए समय या झुकाव नहीं है। और बमुश्किल पांच लोग हैं जो अभी भी इस कला को बस्सी में बनाए हुए हैं।

पुराने समय में कथावाचक स्थानीय लोक देवताओं के चमत्कारों के अलावा, रामायण और महाभारत में महाकाव्य नायकों के वीरता की कहानियों के साथ दर्शकों का मनोरंजन किया करते थे।

आदिवासी अकादमी, तेजगढ़, गुजरात के एंथ्रोपोलॉजिस्ट और आनरेरी निदेशक मदन मीणा ने गाँव कनेक्शन को बताया, "इनमें से अधिकांश पारंपरिक कलाओं ने आधुनिक युग में अपनी प्रासंगिकता खो दी है।" उन्होंने कहा कि जहां कुछ कलाकार अपनी कला को एक नया आकार देने में कामयाब रहे हैं, वहीं पुराने कलाकारों को प्रेरित करने वाली आत्मा और विश्वास हमेशा के लिए खो गया है।

2014 में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले बस्सी के कावड़ कलाकार सत्यनारायण सुथार इस बात को स्वीकार करते हैं, लेकिन इस तथ्य को भी स्वीकार करते हैं कि रीइंवेशंन ही आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है।

सत्यनारायण ने गाँव कनेक्शन को बताया, "पुराने तरीके महत्वपूर्ण हैं लेकिन जीवित रहने के लिए काफी नहीं होंगे। मैंने कावड़ के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया है।"

वह अब मशहूर हस्तियों की कहानियां सुनाने वाले कावड़ बनाते है, या यहां तक कि अलमारी के दरवाजों पर भी इन्हें उकेरा जाता है। उन्होंने कहा, "विचार यह है कि किसी ऐसी चीज़ पर कला बनी हो जो उपयोगी भी हो। कला को बनाए रखने के लिए मुझे यह करना होगा।"

पारंपरिक कावड़ को आमतौर पर मारवाड़ के कावड़िया भाट (कथावाचक) ही खरीदते हैं, जो लोगों के निमंत्रण पर अलग-अलग गांवों में कावड़ सुनाने के लिए जाते हैं। इन पैनलों का सामान्य आकार 12 इंच से लेकर दो फीट तक होता है लेकिन जैसे-जैसे समय बदला है, इनका आकार 20 फीट तक बढ़ गया है।

सत्यनारायण ने कहा, "मैं ऑर्डर पर कावड़ डिजाइन करता हूं। हाल ही में मैंने सिंगापुर में एक भारतीय जोड़े के लिए कावड़ बनाया और भारत से सिंगापुर तक की उनकी यात्रा को चित्रित किया। पैनल अब वहां एक अलमारी पर सजे हैं और एक कहानी बयां करते हैं।"

इस कला के जिंदा बने रहने के दिन सरकार के बिना किसी समर्थन और युवा पीढ़ी की रुचि के अभाव में गिने जा सकते हैं।

कावड़ कलाकारों को अडूसा (आमतौर पर मालाबार नट्स के रूप में जाना जाता है) की लकड़ी की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। सख्त वन कानूनों ने लकड़ी को उनकी पहुंच से मुश्किल कर दिया है।

सुथार ने समझाया, "अडूसा के पेड़ की लकड़ी हल्की होती है और उसमें दीमक भी नहीं लगता है। लेकिन पिछले कई सालों से इस लकड़ी को पाना काफी मुश्किल होता जा रहा है। हमें लकड़ी लेने के लिए काफी लालफीताशाही से गुजरना पड़ता है। यह भी एक कारण है कि कावड़ कलाकार कला छोड़ रहे हैं।"

बस्सी के कावड़ कलाकार द्वारका प्रसाद सुथार को 2019 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था।

द्वारका प्रसाद ने गाँव कनेक्शन को बताया, "अगर हम इस कला पर जीवित रहना चाहते हैं तो हमें गांवों से बाहर जाने की जरूरत है। अगर हम कावड़ कला का इस्तेमाल अलमारी या खिलौने बनाने में करते हैं तो हम अच्छा पैसा कमा सकते हैं। मैं पूरे भारत के ग्राहकों के लिए कावड़ बनाता हूं।"

इस कला के जिंदा बने रहने के दिन सरकार के बिना किसी समर्थन और युवा पीढ़ी की रुचि के अभाव में गिने जा सकते हैं।

द्वारका प्रसाद ने कहा, "कावड़ कला को जिंदा बनाए रखने के लिए, नई पीढ़ी को इसमें रुचि लेनी होगी। लेकिन इसका अभाव है। अब सिर्फ बमुश्किल पांच कारीगर बचे हैं जो अभी भी इस कला का अभ्यास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बहुत से कलाकार स्थिर आय अर्जित करने के लिए मजदूरी या खेती के काम में लग गए हैं।

फड़ पेंटिंग

मोलेला और कावड़ कला की ही तरह दक्षिण-मध्य राजस्थान के भीलवाड़ा से 700 साल पुरानी फड़ पेंटिंग भी कहानी कहने का एक माध्यम है।

देवी-देवताओं की कहानियाँ, खास तौर पर देवनारायण और पाबूजी को 40 फीट लंबे कपड़े पर चित्रित किया जाता था। यह गायक या भोपा (रेबारी कुलों से) के लिए एक प्रॉप हुआ करता था, जिसके आधार पर दर्शकों को कहानियां गाईं या सुनाईं जाती थीं।

सूती कपड़े पर फड़ बनाने की कला चिप्पा जाति के जोशी वंश की है। जोशी समुदाय के कलाकारों को भोपाओं ने कपड़े की पेंटिंग बनाने के लिए कमीशन दिया था।


एक प्रसिद्ध फड कलाकार कल्याण जोशी ने बताया, "अगर हम सिर्फ पुरानी परंपराओं से चिपके रहेंगे, तो कला जीवित नहीं रहेगी और न ही हम। वैसे भी आजकल घर 30-40 फीट लंबे फड़ को सहजने के लिए घरों में जगह नहीं हैं। " वह अब ब्रश स्ट्रोक से डिजाइनर कपड़े, छोटे दीवार चित्रों, कोस्टर, मिट्टी के बर्तनों आदि को सजाते हैं।

जोशी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हाल ही में, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने 500 छोटी फड पेंटिंग का ऑर्डर दिया था। वह अपने कर्मचारियों को दिवाली पर उपहार में देना चाहते थे। मैंने भीलवाड़ा रेलवे स्टेशन की दीवारों पर भी पेंटिंग की है।"

फड़ कला परंपरा को एक समय ईर्ष्या के चलते आगे बढ़ने से रोक दिया जाता था और सिर्फ परिवार के सदस्य ही कला के तरीके के बारे में जानते थे। लेकिन जोशी ने इस परंपरा को तोड़ा और चित्रशाला नाम से एक कला विद्यालय चलाया, जहां कोई भी कला सीख सकता है।

उन्होंने कहा, "मैंने 4,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया है। कई ने अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया है। कुछ फैशन डिजाइनिंग, टाइल पेंटिंग्स, क्रॉकरी और इंटीरियर डेकोरेशन में इस कला के साथ प्रयोग कर रहे हैं।"

यह परंपरा की सीमाओं से बाहर निकलने की इच्छा ही है जिसने उसे और एक हद तक कला को जीवित रहने की इजाजत दी है। कल्याण ने कहा, "अगर मैं पुराने तरीकों से जुड़ा होता तो मैं कामयाब नहीं होता। इस कला के बारे में अधिक जानने के लिए युवाओं में उत्सुकता है और इसके लिए मैं उनका आभारी हूं।"


हालांकि नए प्रयोग इस पुरानी कला को जीवित रखे हुए हैं, लेकिन इसका पारंपरिक चित्रण तेजी से गायब हो रहा है। 40 फुट के कपड़े पर देवनारायण और बापूजी की कहानियों को चित्रित करने की कला सिर्फ चार या पांच लोग ही कर सकते हैं।

कल्याण ने कहा, " तकनीक के आने के साथ ही धैर्य गायब हो गया है। मुझे लगता है कि आने वाले सालों में हमारे लोक देवताओं के लिए मूल भक्तिमय फड़ बनाने वाला कोई नहीं बचेगा। यह दुखद है, लेकिन नई पीढ़ी अपनी शर्तों के साथ आगे आ रही है।"

मदन मीणा ने कहा, "ये कला रूप कर्मकांड हैं और उन समुदायों की धार्मिक प्रथाओं से सीधा संबंध रखते हैं जिन्होंने उन्हें संरक्षण दिया था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।" वह आगे कहते हैं, " भले ही व्यावसायीकरण ने कुछ कलाकारों को एक अच्छी जगह पर ला खड़ा किया हो, फिर भी दूसरों के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।"

कपड़ा मंत्रालय ने 2021 में कारीगरों के लिए एंटरप्रेन्योरशिप डवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया था।

हस्तशिल्प सेवा केंद्र, उदयपुर के हैंडीक्राफ्ट प्रमोशन अधिकारी मनोहर मीणा ने गांव कनेक्शन को बताया, "कई कलाकार अपने काम में नयापन ला रहे हैं और हमने उन्हें आगे बढ़ने के लिए एक मंच दिया है। कारीगरों को 5 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता और उनमें उद्यमिता कौशल प्रदान करने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।"

उन्होंने कहा, "हमारा मकसद, कला के रूप को मार्किट के लिए तैयार करने और कारीगरों को जनता के स्वाद के अनुसार अपने कला रूप को विकसित करने में मदद करना रहा है। इससे उन्हें आर्थिक रूप से बढ़ने और अपनी कला को दुनिया के विभिन्न कोनों में ले जाने में मदद मिलेगी।"

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