सांपों को समझता है राजस्थान का ये प्रकृति प्रेमी, गौरैया के लिए भी शुरु कर रखी है मुहिम

जोधपुर का एक बाशिंदा बचपन से ही प्रकृति के प्रति समर्पित रहा, फलस्वरूप आज जंगल, तालाब, पशु-पक्षियों, सांपों, गोरैया इत्यादि के संरक्षण के क्षेत्र में मिसाल बनकर उभरा है।

Moinuddin ChishtyMoinuddin Chishty   27 Oct 2018 6:41 AM GMT

सांपों को समझता है राजस्थान का ये प्रकृति प्रेमी, गौरैया के लिए भी शुरु कर रखी है मुहिम

जोधपुर। राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाली राजधानी जोधपुर का एक बाशिंदा शरद पुरोहित बचपन से ही प्रकृति के प्रति समर्पित रहा, फलस्वरूप आज जंगल, तालाब, पशु-पक्षियों, सांपों, गोरैया इत्यादि के सरंक्षण के क्षेत्र में मिसाल बनकर उभरा है। न सिर्फ जोधपुर में बल्कि पूरे देश में उनसे जुड़ने वाले युवाओं की तादाद दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

प्रकृति ने मुझे चुना है

बातचीत की शुरुआत में शरद पुरोहित बताते हैं, "लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं फ़ेसबुक और निजी जीवन में प्रकृति, पक्षी, सांप, नदी, पेड़-पौधों, जंगल, आकाश की बात करता हूं, मैंने आखिर इस विषय को क्यों चुना? तब मेरा जवाब होता है, मैंने किसी विषय को नहीं चुना, हो सकता है शायद इसी विषय ने मुझे चुन लिया हो! घर के माहौल और पारिवारिक स्थितियों में पिताजी हिंदी के अध्यापक हुआ करते थे। अक्सर जब भी लोग घूमकर आते तो हम पूछते थे कि कहां घूम कर आए हो? जवाब होता-मार्केट गए थे, बाज़ार देखा, चीज़ें खरीदने और खाने-पीने गए थे। होटल गए थे, फ़िल्म देखी। मैंने बचपन से लोगों का घूमने का यही वातावरण देखा।" अनुभवी शरद अपनी संस्था ‛यूथ अरण्य' के माध्यम से अनेकों कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। बीते दिनों उनके कारनामों की धूम सुनकर मैंने भी उनसे बात की।


जंगलों में घूम-घूमकर बड़े हुए

हम भी पिताजी से बोलते कि हमको घुमाने ले चलो। तय कार्यक्रम था कि हर शनिवार को हम शहर के बीच बने भूतेश्वर वनखंड में चले जाते, वहां एकलिंग और जागनाथ महादेव के मंदिर बिल्कुल जंगलों में बने हुए थे। लोगबाग भी कम आया-जाया करते थे, पक्की सड़कें नहीं थीं। कच्ची सड़क थी तो वो भी एक तरह का अज़ाब थीं। शनिवार की शाम पांच से सात घंटे वहीं रहते, रविवार आता तो फिर निकल पड़ते। वहां जाकर उस इलाके के पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़ों को देखते, पक्षियों की आवाज़ सुनते। यह दौर निरंतर चलता रहा। इस प्रकार मेरा लगाव मिट्टी से हो गया, पेड़-पौधों, पत्थरों, जीव-जंतुओं से गहरा जुड़ाव हो गया। धीरे-धीरे मुझे यह वातावरण रास आने लगा।


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ऐसे में सोने पर सुहागे वाली घटना हुई। बुआ के बेटे बिस्साजी फॉरेस्ट में रेंजर बन गए। घर आकर उन्होंने बड़े विस्तार से चर्चा की कि मैंने अपनी ट्रेनिंग के दौरान टाइगर के बीच की बात सुनी। वुल्फ की आवाज़ सुनी, ज़रख की आवाज़ सुनी, हाइना की बात सुनी, जैकल की बात सुनी तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कैसा आदमी है?

इन्होंने तो जंगल की बड़े-बड़े नाम गिनवा दिए हैं। ऊपरवाले की कृपा रही कि उनका पहला पदस्थापन जोधपुर के ही चिड़ियाघर में हुआ, जो लोग जू देखने जाते थे, वे पिंजरे में बन्द जानवर देखने जाते थे, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था।

मैंने बहुत करीब से उन पशु-पक्षियों को देखा। यह वर्ष 1980 की बात है, फिर मैंने कानूनी मान्यता प्राप्त पशु-पक्षियों को घर में रखना शुरू किया। जावा, फिंच, बजरीगर, पाइट, किसर, खरगोश आदि को पालने का दौर आरम्भ हुआ। घर में पिंजरे ही पिंजरे, पशु-पक्षियों को रखने का एक वातावरण बना। वे ब्रीड कर रहे थे, बढ़ रहे थे। उनको देखकर बहुत कुछ देखा समझा, जाना। सन्डे खेलने कूदने का होता है, पर हम पिंजरे साफ करते, जानवरों के स्वास्थ्य की बात करते या जू चले जाते। कुल मिलाकर यह वह दौर था, जब मुझमें जानवर, पक्षी, पेड़-पौधों और मिट्टी की बात को भरा गया।

जीवन के 3 आत्मीय सहयोगी

मेरे जीवन को तराशने में पिताजी और रेंजर साहब का बड़ा योगदान रहा, जिनकी सीख ने जीवन को नए आयाम दिए। बड़े भाई ने भी बहुत सहयोग दिया। शादी के बाद मेरे इस जुनून को धर्मपत्नी सारिका ने सहेजे रखने में मदद की। बड़े हुए तो संघर्ष के दौर शुरू हुए। पिताजी की मृत्यु हो गई। सारे शौक हटाने पड़े, बड़ी आर्थिक तंगीयां बनीं। उस दौर में ननिहाल पक्ष के सहयोग से पढ़ाई की, मौसी-दादा ने भी सहयोग किया। शिक्षा, संस्कार भोजन की व्यवस्थाएं उन्हीं ने संभाली। समय बीतने पर एक अनुदानित संस्था में अध्यापक बनते हुए हिंदी पढ़ाना स्वीकार किया, लेकिन शौक ऐसा था कि मरने को तैयार नहीं था, वापस लौट आया। मैंने बेरोजगारी के समय को खूब सुंदर तरीके से निकाला। बेरोजगारी ने जीवन में वरदान की तरह काम किया, न कि अभिशाप की तरह। बेरोजगार आदमी के पास सबसे ज्यादा छुट्टियां हुआ करती हैं, इसलिए पढ़ाई खत्म करने के बाद ट्रैन में बैठकर फालना चला जाता, चूंकि ट्रैन में सबसे कम पैसे लगते थे।


फालना उतरने के बाद सभी व्यवस्थाएं मुफ़लिसी की धार पर चलती थीं। लिफ्ट लेकर सादड़ी पहुंच जाता। सादड़ी से परशुराम महादेव। उससे आगे कई जगहों से गुजरते हुए कुम्भलगढ़ की सड़क पर आ जाता। इस मार्ग में बने छोटे-छोटे आश्रमों में समय बिताया और आसपास के वातावरण को जाना-समझा। इस वातावरण में पेंथर, भालू, वुल्फ, अजगर, पेंगुलिन आदि को करीब से देखा-समझा, जाना। घरवालों को मेरे बारे में पता था कि मैं इधर-उधर भटकने वालों में से नहीं हूं, वे मुझे लेकर आश्वस्त थे, इसलिए मैंने इन जंगलों में जीवन का एक शानदार समय बिताया। यहीं से मुझमें पक्षियों की समझ की शुरुआत हुई।

जोधपुर के घंटाघर में एक कबाड़ीखाना हुआ करता था, वहां पक्षी, सांप और जानवर की कोई भी पुस्तक हुआ करती तो ले आता। यहीं से पढ़ने का चलन शुरू हुआ। पढ़कर ज्ञान प्राप्त करने का चक्र चलता रहा। जब अध्यापन शुरू किया तो इच्छा रहती कि बच्चों को बाहर ले जाने के कार्यक्रमों में प्रकृति और पर्यावासों में लेकर जाऊं। पांच दिन की यात्रा स्कूल की तरफ से तय होती तो कैसे भी करके दो दिन जंगलों में ले जाता। वहां उनसे पेड़ों की पत्तियां, पंख, पत्थर, मिट्टी लाने को कहता। समझाता कि यह पंख उसका है, मिट्टी वैसी है, कीड़ा यह है, इसे खाने वाला प्राणी ऐसा होता है, फ़ूड चैन समझाता।

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इस बीच सरकार ने अनुदानित से ग्रामीण सेवाओं में मुझे मर्ज कर दिया। ग्रामीण क्षेत्र में जाते ही शहरी बच्चों से कट गया, यहीं से एक नई दुनिया की शुरुआत हुई। इस बीच इंटरनेट आ चुका था, लेकिन मैं अपनी पहचान छिपाते हुए खामोशी के साथ काम करना चाहता था।

मेरे एक शिष्य ने ज़बरदस्ती फ़ेसबुक पर मेरा खाता बना दिया। इसी दौरान लम्बे समय तक सांपों के रेस्क्यू भी कर चुका था। वनविभाग ने बुलाकर पूछा, सांप क्यों पकड़ते हो? क्या करते हो उनका? मैंने कहा, जनहित में सांप पकड़कर उनके स्थानों पर छोड़ आता हूं। इस पर उन्होंने कहा कि अपराध कर रहे हैं, मैं बोला करता रहूंगा यह अपराध। इस पर जेल हो सकती है, मैंने उसे भी मंजूर किया।

कहा कि छूटने पर फिर यही काम करुंगा या फिर आप मुझे ये आश्वासन दो कि आपका विभाग इनको बचाने के लिए आगे आएगा, नहीं तो यह मरते चले जाएंगे, जब तक इनके प्रति जागरूकता का भाव नहीं होगा, लोग इनको मारते रहेंगे। इस पर बाज़ी उलट गई। फारेस्ट वालों ने कहा, हम मज़ाक कर रहे हैं! आपके कार्यों की गूंज सुनी है। आप जो-जो कार्य कर रहे हैं, उनकी लिस्ट बनाकर हमें दें। फिर मैंने पक्षियों, पेड़-पौधों, सर्पों, मेमल्स के कार्यों की एक फेहरिस्त बनाकर उनको दी। उन्होंने मुझे जू ऑथोरिटी की डेवेलपमेंट कमेटी में सदस्य बना लिया। उन्होंने कहा कि अब आप ये काम कर सकते हो।

जन्म हुआ ‛यूथ अरण्य' का

पर आपके पास अभी भी कोई संस्था नहीं है। उस वक़्त रेस्क्यू के दौरान डॉ हेमंत जोशी मेरे परम मित्र हुआ करते थे, उन्होंने कहा कि एक नाम लिखो तो दिमाग में ‛यूथ अरण्य' नाम आया। मेरी सोच थी कि बुड्ढा होकर मर भी जाऊं, लेकिन मेरी संस्था जवान रहनी चाहिए। युवाओं का आह्वान किया कि इस संस्था के तहत घरेलू चिड़ियों के सरंक्षण, सर्पों के सरंक्षण, जागरूकता के लिए कार्य करेंगे। 50 से ज़्यादा लड़कियां-लड़के जुड़ गए। काम तो हम लम्बे समय से कर रहे थे, कर रहे हैं पर वर्ष 2011-12 में हमें विधिवत रूप से नाम रखकर काम करना पड़ा। वर्षों की साधना का ही परिणाम है कि आज सीए, डेंटिस्ट, अकाउंटेंट, मीडियाकर्मी, वेबसाइट के महारथी मेरे साथ जुड़े हुए हैं। कइयों को तो रेस्क्यू करने के लिए तैयार भी किया है। आज हम सब साथ मिलकर काम कर रहे हैं। संस्था के नाम पर हमने कभी किसी से एक पैसा तक नहीं लिया, उल्टे पक्षियों के नाम पर खुद की जेब से सालभर में 30 से 40 हज़ार रुपये तक खर्च करते हैं। अब तो पुलिस, वन विभाग को सांपों को पहचानने, उनके सरंक्षण को लेकर ट्रेंड कर रहे हैं।


जारी है सांपों पर शोध

सांपों की आइडेंटिफिकेशन, उनकी पहचान, उनके व्यवहार को लेकर वर्षों से काम कर रहा हूं। किस सर्प का व्यवहार कैसा है? 25 प्रजातियां हैं, जिनमें से 13 को मैंने बड़े सुंदर तरीके से समझा है। लोगों को जहर और बिना जहर वाले सांपों में भेद करना सीखा रहा हूं। काम चल रहा है, एक ब्रोशर बनाया है, जिसमें 13 प्रजातियों का वर्णन है। उनका व्यवहार कैसा है? उनके दंश से क्या हो सकता है? क्या करें? क्या न करें? किस सर्प के व्यवहार को हम कैसे समझें और उसके प्रति कैसा व्यवहार करें। दोनों का सहअस्तित्व बना रहे और दोनों ही अपना बचाव कर पाएं, ऐसी एक मुहिम सुंदर तरीके से चल रही है। प्रति वर्ष जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर में लोगों को जागरूक करता हूं। वन विभाग के महकमे में जितने भी ट्रेनीज आते हैं, चाहे रेंजर हों या फोरेस्टर्स- उनके लिए प्रशिक्षण का विशेष कार्यक्रम झालामंड स्थित कार्यालय में करता हूं। यहां फारेस्ट की एक ट्रेनिंग स्कूल बनी हुई है, उसमें तीन से चार घंटे की दो-दो दिन की क्लास लेता हूं। उनको सांपों की प्रजातियों, सरंक्षण के बारे में, रेस्क्यू के बारे में, अगर रेस्क्यू न कर पाएं तो कैसे सुरक्षित तरीके से खुद बचते हुए उनको बचा लें, ऐसे कुछ काम चल रहे हैं। कुल मिलाकर बड़ा रोचक विषय है यह।

एंड्रॉयड फोन ने सबको प्रकृति से दूर किया

देख रहा हूं कि शहर बहुत डूब चुका है, ऊपर देख ही नहीं पा रहा, मोबाइल में झुका हुआ है, लोगों के पास समय नहीं है। खुद को दिखाने का, जो भी है उसे लाइव कर दो। इसके अलावा उनके पास कुछ बचा नहीं। इस चक्कर में वे कभी ऊपर देख नहीं पाते हैं या पक्षियों की आवाज़ें नहीं सुन पाते। वे अपने आसपास के वातावरण को समझ नहीं पाते, आज की तारीख में हमारा जो ग्राफ है, वो कितना नीचे आ चुका है हार्मोनी को लेकर, सामंजस्य जो कभी हमारा था प्रकृति के साथ अब वो बिल्कुल टूट गया है। इससे कैसे जुड़ाव किया जाए, इस मुहिम को मैं चलाने जा रहा हूं। विश्वास व्यक्त करता हूं कि जितनी योग्यताएं हासिल की हैं या जितना सीखा-समझा है, उसको लेकर मैं दुनिया को समझा पाऊं कि कैसे हम अपने घर में बैठे रहकर भी प्रकृति के सरंक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं।

गोडावण का विलुप्त होना भी दर्द दे रहा है

हाल ही में दो साल पहले ‛प्रोजेक्ट गोडावण' से भी जुड़ा। बड़ा आश्चर्य होता है कि विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि विकास की स्वरलहरियां चारों तरफ लहराई जा रही हैं। ऐसे में रणभेरी बज चुकी है एक ऐसे पक्षी के नाम पर कि किस तरह उसे दुनिया के नक्शे से हटाया जाए। बहुत कम, बहुत ही कम 120-30 बचे हैं बेचारे। संघर्षरत हैं, पाकिस्तान-भारत के बीच झूल रहे हैं। जैसलमेर में इनका रहवास है, रामदेवरा-पोकरण की तरफ आकर अपने परिवारों को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। बड़ी बड़ी विंड मिल्स लगी हुई हैं, पवन चक्कियों से टकराकर मरते रहते हैं। विकास के स्वर...! विद्युत चाहिए तो गोडावण नहीं मिलेगा और गोडावण चाहिए तो विद्युत नहीं मिलेगी।

बचपन के जुनून ने घर में बनवा दी 'वैली ऑफ फ्लॉवर्स', अब करते हैं करोड़ों के गार्डनिंग प्रोजेक्ट

हमें नहीं चाहिए साहब, प्रगति नहीं चाहिए, विकास भी नहीं चाहिए। हमें चाहिए वो प्राणी जिसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह है। और हम ये जानकर चलें कि वह बहुत जल्दी हमारी आंखों के सामने से हटेगा। इतना बड़ा हेवीएस्ट फ़्लाइंग बर्ड, 13 से 15 किलो के बीच का, उड़ने वाला एकमात्र पक्षी है। शानदार उड़ान भरता है, गज़ब का सौंदर्य, गज़ब का रूप रंग है। इसे किसी जू में लाकर पाल लेंगे या इसको बड़ा कर लेंगे या इसके परिवार की संख्या बढ़ा लेंगे तो बड़ा मुश्किल काम है क्योंकि इसके जीवन की बहुत सी शर्तें हैं। एक तरफ बेर खाता है तो दूसरी तरफ सांप और जहरीले बिच्छू भी खा लेता है, वनस्पतियां भी खा लेता है। जहां पानी बिल्कुल न हो, सूखा पड़ा हो , वहां सर्वाइव करता है। इतने कठोर जीवन को जीने वाला तपस्वी होने के बावजूद भी इसे मौत के मुंह में जाना पड़ेगा, इसे विलुप्ति की कगार पर जाना पड़ेगा, यह दुखदायी स्थिति है। जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‛प्रोजेक्ट टाइगर' चला, उसी तरह इसे बचाने के प्रयास भी किए जाने चाहिएं।


इधर विलुप्ति की कगार पर है घरेलू चिड़िया भी

2013 में कुछ लोगों ने कहा कि, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सब सही चल रहा है, मुझे यह काम अब बन्द कर देना चाहिए। कुछ ने यहां तक भी कहा कि अब हमें आपके ज्ञान की जरूरत नहीं है। इस पर मैंने फ़ेसबुक पर एक आह्वान भरी पोस्ट की। लिखा, किसी भी कैमरे से घरेलू चिड़िया की एक फोटो खींचकर लाकर दें, हम एक प्रदर्शनी में आपकी फोटो भी लगाएंगे। घरेलू चिड़िया जो बरसों से हमारे घर के आंगन में रहती आई है, कभी पंखे पर घोसला बनाती तो कभी हमारे घर को अपना घर समझ के खूब कचरा करती और दादागिरी से अपने बच्चे हमसे पलवाती।

एक सप्ताह के भीतर ही मुझे सैंकड़ों लोगों के फोन कॉल्स आ गए। यह चिंता का विषय था। वे कह रहे थे कि वो चिड़िया जो कभी दिखती थी, अब नहीं दिख रही, कहां गई? एक दाढ़ी वाला चिड़ा होता था, उसके बच्चे होते थे, एक चिड़िया हुआ करती थी, वे अब नहीं मिल रहे। मैंने कहा अब आप समझ जाइए, हमने उसको निर्वासित कर देश निकाला दे दिया है, हमारी गलियों से। वर्ष 2013-14 में एक दिन अचानक बैठे बैठे बर्ड हाउस बनाने का खयाल आया।

पुराने जमाने के लोग तो घर बनाने के बाद इस बात को मानते थे कि उन्होंने इस घर को बनाने के दौरान कई कीड़े मकोड़ों को कष्ट दिया है, बहुत से जानवरों को कष्ट पहुंचाया है। इसका प्रायश्चित करने के लिए वे अपने घर के बाहर चिड़िया के घर रखते थे। हमने अपने द्वारा बनाए हुए बर्ड हाउसेस को संभावित जगहों पर लगाया। परिणाम यह रहे कि 3 घंटे के भीतर ही चिड़े ने मुआयना किया, चिड़िया को बुलाया, घर पसन्द आया और रहवास शुरू हुआ, परिवार बना, मेरा दिल और दिमाग खुशी के मारे झूम उठे।

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जनवरी-फरवरी में, मैं अपने कुछ शिष्यों के साथ अपने घर में बैठकर इन चिड़ियों के लिए घर बनाता हूं। अपने घर के खर्चों से पैसे बचाकर तकरीबन 100-150 बर्ड हाउस बना लेता हूं। ‛वर्ल्ड स्पेरो डे' 20 मार्च को मनाता हूं। अब यह समझ आ गया है कि पूरी दुनिया के नक्शे से यह चिड़िया खत्म होती जा रही है। आम जीवन में इस चिड़िया को कैसे पुनर्वासित किया जाए, इस पर काम जारी है। लगभग 500-700 बर्ड हाउस मैंने निजी तौर पर लगाए हैं। पिछले साल तो एक व्यक्ति मिले जिनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने 100 बर्ड हाउस लगवाए पिता की याद में।

मैं अगली पीढ़ी की रक्त शिराओं में चिड़िया को फिर से पुनर्जीवित करना चाहता हूं, आ जाएगी वो, हम उसकी चहक सुनने के लिए मजबूर होंगे। इन सबके अलावा जोधपुर के आसपास के 13 तालाबों में देश विदेश से आने वाली 150 से 170 पक्षियों की प्रजातियों पर भी शोध-अध्धयन जारी है। संपर्क-९४१४९००२७२

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