रामनामी: पूरे शरीर में राम का नाम, लेकिन मंदिर से कोई लेना देना नहीं

ये लोग न किसी मंदिर जाते हैं ना मूर्तियों की पूजा करते हैं। इन्हें अयोध्या के राम मंदिर से भी कोई वास्ता नहीं है। इन्हें रामनामी कहा जाता है।

Arvind ShuklaArvind Shukla   18 Jan 2019 11:26 AM GMT

रामनामी: पूरे शरीर में राम का नाम, लेकिन मंदिर से कोई लेना देना नहीं

विविधिताओं के देश भारत के दो हिस्सों में दुनिया के बेहद खास आयोजन हो रहे हैं। एक तरफ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में अर्द्धकुंभ चल रहा है तो दूसरी छ्त्तीसगढ़ में रामनामी भजन मेला। दोनों ही आस्था और लोक सस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

छत्तीसगढ का रामनामी मेला अपने आप में बहुत खास है। यहां हर तरफ बस राम-नाम की ही गूंज होती है। माथे लेकर पूरे शरीर पर राम नाम का टैटू बनवाए रामनामी राम के नाम को ही कण-कण में बसाने की परंपरा को आगे बढ़ाते नजर आते हैं।

छत्तीसगढ़ के मेले में रामनामी भक्त।

न मंदिर से वास्ता ना मूर्ति की पूजा

छत्तीसगढ में जो लोग राम नाम को शरीर पर गुदवाते हैं, राम नाम लिखे वस्त्र पहनते हैं। रामचरित्र मानस की पूजा करते हैं। उनका पूरा एक संप्रदाय है। लेकिन ये लोग न किसी मंदिर जाते हैं ना राम की मूर्ति की पूजा करते हैं। इन्हें अयोध्या के राम मंदिर से भी कोई वास्ता नहीं है। इन्हें रामनामी कहा जाता है। सम्रदाय की मान्यता के अनुसार इनके राम मंदिर और मूर्तियों में नहीं हर मनुष्य पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं में समाए हैं।

तन और वस्त्र दोनों पर बस राम ही राम...



राम नाम का गुदना (टैटू) शरीर पर होता है, तो टोपी से लेकर कुर्ता, गमछा तक राम नाम से गुदा होता है। ये अपने घरों पर राम-राम लिखवाते हैं और मिलने पर एक दूसरे राम-राम कहकर अभिवादन भी करते हैं। स्थानीय लोगों और जानकारों के मुताबिक रामनाम की परंपरा करीब सवा साल पुरानी है।

इस सुंप्रदाय के लोग इन रामनामी भजन मेले में मिलते हैं। मेलों का उद्देश्य सप्रदाय के लोगों का आपस में मिलना जुलना और नए लोगों को दीक्षित करने का होता है।

रामनामी भजन मेले में परिवार के साथ शामिल होते हैंं सम्प्रदाय के लोग, नए लोगों को दी जाती है दीक्षा।



राम नाम का टैटू और बगावत

रामनाम का टैटू बनवाने के पीछे बगावत और रूढीवादिता की दिवारों का तोड़ना बताया जाता है। कहा जाता है करीब 100 साल पहले गांव में हिंदुओं के ऊंची जाति के लोगों ने इस समाज के लोगों को मंदिर में घुसने से मना कर दिया था, जिसके विरोध स्वरूप इन लोगों ने चेहरे समेत पूरे शरीर पर गोदना कराना शरु किया। रामनामी समाज को रमरमिहा के नाम से भी जाना जाता है। टैटू बनवाने वाले लोग बहुत पवित्रता के साथ रहते हैं।ये शरीब नहीं पते। और रोजाना राम नाम बोलना होता है। राम राम बड़े भजन मेले की एक उपलब्धि यह भी है कि रामनामी समाज में बिना दहेज के सामूहिक विवाह की अनोखी परंपरा भी शुरू हुई है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट में रामनामी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मेहत्तरलाल टंडन कहते हैं, मंदिरों पर सवर्णों ने धोखे से कब्जा कर लिया था, हमें राम नाम से दूर करने की कोशिश की गई। हमने मंदिरों को जाना और मूर्ति पूजा छोड़ दी। इसलिए हमने राम को अपने कण-कण (शरीर में गोदना) बसा लिया।"

टैटू की संख्या का महत्व

रामनामी समाज में राम के शरीर में कितने टैटू (कितने नाम गुदे हैं) हैं इसका खास महत्व है। अपने शरीर के किसी हिस्से में राम नाम लिखवाने वाले को रामनामी, माथे पर दो राम नाम गुदवाने वाले को शिरोमणी, पूरे माथे पर राम नाम लिखवाने वाले को सर्वांग रामनामी और शरीर के प्रत्येक हिस्से में राम नाम लिखवाने वाले को नख शिखा राम नामी कहते हैं।

युवा हो रहे दूर

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के चार जिलों में रामनामियों की प्रभाव है। रामनामी भजन मेले में अस्था का सैलाब भी उमड़ता है, सांस्कृतिक रंग भी दिखते हैं मगर पहले जैसी अस्था गोदना में अब युवाओं की नहीं रही। काफी युवा सिर्फ रामनामी कपड़े पहनते हैं तो कुछ माथे या शरीर के किसी हिस्से में राम नाम लिखवाते हैं। लेकिन राम नाम के सुमिरन का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

सभी फोटो- साभार शकील रिज़वी

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