‘मेरा बलात्कार हुआ इसके लिए सब मुझे ही दोषी समझते हैं’

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   16 Dec 2017 6:39 PM GMT

‘मेरा बलात्कार हुआ इसके लिए सब मुझे ही दोषी समझते हैं’रेप के बाद सवाल जवाब पीड़िता को मानसिक कष्ट देते हैं। 

“हां मेरे साथ बलात्कार हुआ है, ये बात मुझे कम से कम 20 बार बतानी पड़ी थी तब जाकर मेरे एफआईआर लिखी गई। यही नहीं मैंने क्या पहना था, कहां गई थी, क्यों गई थी, कब गई थी, कैसे क्या हुआ ये सारी बातें भी मैंने कम से कम 20 से 25 बार दोहराई थी फिर भी मुझे आज तक न्याय नहीं मिला।”

पीलीभीत की रहने वाली 24 वर्षीय लड़की के साथ जब बलात्कार हुआ तो ऐसे में संवेदना दिखाने के नाम पर उसके साथ ऐसा व्यवहार हुआ जिससे वो खुद को ही दोषी समझने लगी और ऐसा ज्यादातर महिलाओं के साथ होता है।

पीड़िता ने बताया कि मुझे बार बार सवालों के जवाब देते देते ये लगने लगा था कि शायद मेरी ही गलती थी। मैंने सब कुछ खो दिया और सब मुझे दोषी ठहराते है। घटना के बाद एक महीने तक मैं घर के बाहर नहीं गई। लोग मुझे गंदी नजरों से देखते थे, घूरते थे। मेरे कानों में आवाजें गूंजने लगी थीं कि ये वही लड़की है जिसके साथ बलात्कार हुआ है। ऐसा लगता था जैसे मैं पागल हो जाऊंगी। थाने में मुझसे महिला पुलिस ने बड़े गंदे तरीके से बात की थी कि गाँव का ही लड़का है कोई चक्कर तो नहीं चल रहा था जो फंसाने के लिए ये सब कर रही हो। उस रात मैं शौच के लिए अकेले क्यों गई और किसी को बताकर क्यों नहीं गई।

ऐसी घटना के बाद ज्यादातर पीड़िताओं को इन सबका सामना करना पड़ता है। बार बार सवालों के जवाब उनकी मानसिक स्थिति को और कमजोर कर देते हैं जबकि इस समय उन्हें बेहतर काउंसलिंग की जरूरत होती है। उसे थानों, कोर्ट, कचहरी, अस्पताल के इतने चक्कर लगाने पड़ते हैं कि वो शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूप में कमजोर हो जाती हैं।

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कई माता-पिता ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि पुलिस शिकायत दर्ज करने के बाद उन्हें अपनी बेटियों की सुरक्षा की चिंता थी क्योंकि आरोपी को जमानत मिल गई और फिर उसने लड़कियों को धमकी दी। अक्सर, लड़कियां घर से बाहर की अपनी गतिविधियों पर खुद रोक लगा लेती हैं या माता-पिता उनकी गतिविधियों पर और ज्यादा प्रतिबंध लगा देते हैं।

एफआईआर के लिए भटकना पड़ा

एक पीड़िता की मां ने बताया, “हम दलित परिवार के हैं। मेरी बेटी के साथ गाँव के ही कुछ दंबगों ने मिलकर बलात्कार किया। मेरी एफआईआर तक नहीं दर्ज हो पाई। मैं दूसरों के घरों में काम करती हूं और पति मजदूरी। हमारे पास न पैसे थे न कोई बड़े साहब का दबाव कि कोई हमारी मदद करता।”

वो आगे बताती हैं, “बलात्कार करने वालों को यकीन था कि हम उनका कुछ नहीं कर सकते इसलिए जब कभी वो हमारे सामने आते थे तो धमकियां देते थे, गंदी गंदी गालियां देते थे कि मैं पुलिस के चक्कर न लगाऊं क्योंकि कुछ होने वाला नहीं है। हमें सर नीचे करके चलाना पड़ता था लोग तरह तरह की बातें करते थे। मेरी बेटी महीनों घर में कैद रही न किसी से मिलती थी न बात करती थी और मजबूरी में हमें अपना गांव छोड़ना पड़ा”

बलात्कार पीड़िताओं को स्वास्थ्य, कानून व सुरक्षा से सभी सुविधाएं एक जगह मिले इसके लिए केन्द्र सरकार ने वन स्टॉप सेंटर योजना की शुरूआत की थी। सरकार के मुताबिक, अगस्त 2017 तक देश भर में 151 केंद्र स्थापित किए गए, 2013 से 2017 तक इसके लिए 3000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए लेकिन इसके बावजूद ये कारगर साबित नहीं हुए।

वन स्टाप केन्द्रों का भी लाभ नहीं

महिला मुद्दे पर काम करने वाली समाजिक कायर्कत्री ताहिरा हसन बताती हैं, “ये घटना वैसे ही पूरे परिवार व पीड़िता को झकझोर देती है इसलिए उनको मेडिकल, जांच व एफआईआर सब एक ही स्थान पर दिया जाए इसके लिए वन स्टॉप सेंटर बनाए जाने थे जिससे उसे इस सबके लिए भटकना न पड़े।”

वो आगे बताती हैं, “महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने 660 वन स्टाप केन्द्र बनाने की बात कही थी जिसके लिए 3000 करोड़ का बजट भी इस्तेमाल हुआ लेकिन ये बजट कहां गया केन्द्र कहां बने इसकी कोई जानकारी नहीं है न ही कोई पारदर्शिता है इसमें।”

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दिल्ली की वरिष्ठ आपराधिक वकील रेबेका मैमन जॉन ने कहा कि सुनवाई की प्रक्रिया भयभीत करने वाली और भ्रामक हो सकती है और "पीड़िता को शर्मिंदा करने की कोशिशें अभी भी अदालतों में खूब होती हैं। हमें अदालती भाषा को बदलने के लिए काम करने की आवश्यकता है।" अदालतों में न केवल न्यायाधीशों बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी पीड़िताओं के प्रति अक्सर पक्षपाती और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।”

इस बारे में समाज सेविका अर्चना सिंह बताती हैं, “बलात्कार के बाद पीड़िता के साथ हमारी संवेदनशीलता मर जाती है। पहले वो थाने में जाकर मुंशी को घटना बताती है फिर एसओ को बताती है, एसओ उसकी विवेचना करता है फिर एफआईआर लिखी जाती है।” वो आगे बताती हैं कि इसके बाद 164 का बयान होता कि उसके साथ क्या हुआ, कैसे हुआ ये सब पूछा जाता है। उसके बाद कोर्ट कचहरी शुरू होती है। इन सबके बीच महिला मानसिक रूप से भी पूरी तरह टूट जाती है एक ही बात बार बार बता कर।

घटना के बाद पीड़िता को काउंसलिंग की सबसे ज्यादा जरूरत : मनोवैज्ञानिक

पीड़िता की मानसिक स्थिति इस समय क्या हाती है इसके बारे में लखनऊ की मनोवैज्ञानिक डॉ नेहा आंनद बताती हैं, “जब एक लड़की का रेप होता है तो वो हर सेकेंड इस घटना को महसूस करती है फिर थाने, कोर्ट कचहरी में जिस तरह की भाषा में उससे सवाल पूछे जाते हैं, घटना को बार बार याद कराया जाता है उतनी ही बार उसका आत्मविश्वास कम होता है। चूंकि इसके लिए कोई कानून भी नहीं है कि पीड़िता से कैसे सवाल किए जाएंगे।

मानसिक रूप से कमजोर हो जाती हैं महिलाएं।

डॉ आनंद आगे कहती हैं कि पीड़िता को ये लगने लगता है कि अब उसकी पहचान सिर्फ यही है कि उसका बलात्कार हुआ है उसके कई मेंटल डिस्आर्डर हो जाते हैं जैसे उसे लगता है अब सब खत्म हो गया है, कई बार वो बार बार नहाती है, चेहरा साफ करती है कि वो गंदी हो गई है। हमारे यहां इसे इतना आवश्यक भी नहीं माना गया है कि उनके मेंटल काउंसलिंग को अनिवार्य किया जाए न इसके लिए सेंटर हैं और न काउसंलर।

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