फौज़िया की कहानी : “एक औरत के लिए रूढ़ियों को तोड़ना मुश्किल भरा कदम था”

Astha SinghAstha Singh   11 Dec 2017 3:15 PM GMT

फौज़िया की कहानी : “एक औरत के लिए रूढ़ियों को तोड़ना मुश्किल भरा कदम था”फौज़िया 

अच्छी कहानियां किसे नहीं पसंद। दास्तानगोई का नाम सुना होगा। दास्तानगोई फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना है दास्तां (कहानी) और गोई (सुनाना)। यह तेरहवीं शताब्दी में उपजी कहानियां सुनाने- कहने की एक कला है।

18वीं से लेकर 19वीं सदी तक यह फ़न हिंदुस्तान में काफ़ी लोकप्रिय था। हाल के वर्षों में भारत में दास्तानगोई की पुरानी कला फिर से प्रचलन में दिख रही है जिनमें अब महिलाएं भी पुरुषों के दबदबे वाले इस क्षेत्र में मज़बूत दख़ल दे रही हैं। इन्हीं में से एक हैं तीस वर्षीय फ़ौज़िया।

पुरानी दिल्ली के पहाड़ी भोजला इलाके में पली बढ़ी फौज़िया को बचपन से ही कहानियाँ सुनाना पसंद था। उनकी मां अक्सर उन्हें चेतावनी देते हुए कहा करती थी कि "कहानियां तुम्हें किसी रोज़ मुसीबत में डाल देंगी, लेकिन वो थीं कि "कहानी की हर एक किताब पढ़ जाना चाहती थीं।"

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फौज़िया का बचपन

फौज़िया ने गाँव कनेक्शन से हुई बातचीत में बताया "मेरा बचपन दिल्ली में बीता।" मेरे पिता एक मोटर मेकैनिक थे। मेरी माँ अक्सर मुझे उर्दू की क्लासिक कहानियाँ पढ़कर सुनाती थीं, जिससे मेरे अन्दर दास्ताँगो की मशाल को जला दिया।" पहाड़ी भोजला वह इलाका है जो अतीत में दास्तानगोई के लिए जाना जाता था। यह भी एक बड़ा कारण रहा मेरे इस विधा के प्रति आकर्षित होने का।

दास्तानगोई के प्रति लगाव की वजह

मीर बाकर अली, जो इस परंपरा के लुप्त होने से पहले के आखिरी दास्तानगो थे, उनका इंतकाल यहीं हुआ था। जब मैंने दास्तानगोई के बारे में जाना तो लगा की यह तो मेरे ज़मीन से जुड़ीं चीज़ है। और उर्दू से तो मुझे प्यार था ही। वो बताती हैं, "मैंने स्कूल में उर्दू पढ़ा ताकि मैं सारे क्लासिक पढ़ सकूं। मैं जानती थी कि मुझे अपने खयालों की दुनिया से मोहब्बत की खातिर कुछ बड़ा करना था। मैंने अच्छी-खासी तनख्वाह वाली नौकरी की बजाए दास्तानगोई को पेशे के तौर पर चुना। परिवार ने मेरे हर कदम पर मेरा साथ दिया।"

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फौज़िया

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कैसे अपने शौक को पूरा किया

फौज़िया कहती हैं ‘‘चूंकि मैं एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार से आती हूँ इसलिए मैंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी की। मैंने हिंदी साहित्य में एमए किया और एक गैर-सरकारी संगठन में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर नौकरी शुरू की। लेकिन इतिहासकार और लेखक महमूद फ़ारूक़ी से दास्ताँगो का प्रशिक्षण लेने के लिए 2010 में मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और तब से पूर्ण रूप से दास्तानगोई कर रही हूँ।

लोगों का नज़रिया

वो बताती हैं, "मुझे मर्दों के आधिपत्य वाले इसे पेशे में अपनी जगह बनाने में खासी मुश्किलें हुईं ।" मैं अब भी उस दिन को याद करती हूं जब 2006 में पहली बार मैंने परफॉर्मेंस दिया था और "दास्ताँगो के रूप में एक औरत को देखकर श्रोताओं को अचरज" हुआ था। औरतें सार्वजनिक तौर पर नहीं बल्कि अकेले में कहानियां कहती हैं। लेकिन मैंने इसे बदलने की कोशिश की है और देश भर में अब तक 100 से ज्यादा शो कर चुकी हूं। "

वो आगे बताती हैं "एक मुसलमान औरत के तौर पर उनके लिए रूढ़ियों को तोड़ना मुश्किल भरा कदम था।"

कैसे शुरुआत हुई

जामिया मिलिया इस्लामिया से एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन में एमए फौज़िया ने दास्तानगोनाम- द स्टोरी टेलर्स नाम से अपना ग्रुप बनाया है। वो बताती हैं "मैं इसे लीड कर रही हूँ। इस पेशे में आई शुरुआती मुश्किलों पर वो बताते हुए कहती हैं, एक मुस्लिम महिला के तौर पर स्टेज पर जाना आसान नहीं था, लेकिन मुझे मेरे परिवारवालों का पूरा सपोर्ट मिला। तब मैंने ठान लिया था कि कुछ करने निकली हूँ तो करके रहूंगी।

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क्या दिक्कतें आईं

वो बताती हैं, “शुरू में पुरुषों के साथ काम करते हुए मुझे महसूस हुआ कि मेरी आवाज़ उनकी तुलना में काफ़ी हल्की है। इस कमी को दुरुस्त करने के लिए मैंने काफ़ी रियाज़ किया। रोजाना मैं दो घंटे रियाज़ करने लगी, क्यूंकि ऑफिस भी जाना होता था। रियाज़ के साथ साथ मैंने अपने भाव-भंगिमा, शारीरिक ढांचे पर भी काम किया, जिससे मेरी आवाज़ भी थोड़ी खुल गई। वो कहती हैं, "मैं हिजाब या बुर्का नहीं पहनती थी। इसलिए शुरू में लोग ताज्जुब करते थे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने मुझे स्वीकार किया। "

उनके पसंदीदा लेखक

हिंदी में हरिशंकर परसाई को पढ़ना मुझे बेहद पसंद है। वहीँ उर्दू में मेरे इस्मत चुगताई, अशरफ सुबुही देहलवी और इंतिज़ार हुसैन मुझे पसंद हैं। लोग मुझसे अक्सर कहते हैं- इस्मत चुगताई की लिहाफ़ सुनाओ, पर मैं उन्हें उनकी नन्ही की नानी सुनाती हूँ। दिल्ली के लोग देहलवी की घुम्मी कबाबी सुनना इतना पसंद है कि जब मैं स्टेज पर परफॉर्म करने जाती हूँ, तो लोग आवाज़ लगाने लगते हैं, घुम्मी कबाबी, घुम्मी कबाबी। वो हँसते हुए कहती हैं कि कहीं मेरा नाम ही घुम्मी कबाबी न पड़ जाए।

भविष्य की योजना

21वीं सदी में फ़ौज़िया उन गिनी-चुनी महिलाओं में हैं जो इस कला को फिर से लोकप्रिय बनाने में लगी हुई हैं। उन्होंने दास्तानगोई में ही अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी है और शादी नहीं करने का फ़ैसला लिया है। वो कहती हैं," सबको अपनी जिंदगी में कई चीज़ों से इश्क होता है, मुझे मेरे इस काम से इश्क है। "

साभार: इंटरनेट

टीम में लोग

ज़िंदगी को बिना जीवनसाथी गुज़ारने का निर्णय करनेवाली फ़ौज़िया कहानियों के प्रस्तुतिकरण में अच्छे पार्टनर्स की भूमिका को काफ़ी अहम् मानती हैं। भोपाल के रहने वाले फ़ज़ल राशिद, जो अपनी फुल टाइम नौकरी करते हुए पिछले एक साल से उनका साथ दे रहे हैं। फ़ज़ल जैविक खेती के सेक्टर में काम करते हैं। वह बताती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि यह कारवां आगे बढ़ेगा और हम लोगों को और कहानियां सुनेंगे ।

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भारत में दास्तानगोई का भविष्य

फौज़िया भारत में दास्तानगोई के भविष्य को लेकर काफ़ी आशान्वित हैं। वो कहती हैं, कि लोगों ने इसके महत्व को समझना शुरू कर दिया है। ये देखना सुखद है कि अब लड़कियां भी इससे धीरे धीरे जुड़ रहीं हैं। इसके लिए मुझे जहाँ जहाँ मौका मिल रहा है वहां वहां मैं वर्कशॉप भी कर रही हूँ ।

ख़ुशी देने वाला पल

फौज़िया बताती हैं,"मुझे तब बहुत अच्छा लगता है, जब लोग उन्हें असली दिल्लीवाली कहते हैं। इसका कारण है कि पुरानी दिल्ली के कई लहज़े ख़त्म हो रहे हैं, क्यूंकि लोगों को अपनी बोलियों का इस्तेमाल करने में शर्म आती है। जब लोग कहते हैं,"फौज़िया हमें फ़ख्र है कि तुम हमारी धरोहर को संजोकर रख रही हो" या "ये असली दिल्लीवाली है", ये सुनकर मेरा दिन बन जाता है।

फौज़िया आगे बताती हैं, भविष्य में वह उर्दू के नए लेखकों की भी कहानियाँ सुनाना चाहती हैं। साथ ही यह भी कहती हैं कि कहानियाँ लिखने में अपना हाथ कभी नहीं आजमाएंगी। मैं कहानियाँ सुनाती हूँ, लिखती नहीं हूँ । मैंने कई बार ये देखा है कि लोग सोचते हैं कि हम एक्टर हैं, तो डायरेक्टर भी बन जाएं। पर मैं मानती हूँ की लोग अच्छा लिख रहे हैं और मैं उनके लिखे को सुनाना पसंद करुँगी ।

फौज़िया अपनी दास्तानों में साहस, जादू और लड़ाई की कहानियां शामिल करती रहना चाहती हैं।

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