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विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेष- "प्राथमिक स्वास्थ केंद्र नहीं सुधारे गए तो इलाज के लिए बिकते रहेंगे मंगलसूत्र और जमीनें"

महामारी कोरोना का मुकाबला कर रहे भारत में हर व्यक्ति का इलाज सरकार कर रही है। लेकिन क्या सामान्य दिनों में आम आदमी के लिए इलाज सुलभ है? दो कहानियों से समझिए ग्रामीण भारत में इलाज की व्यवस्था

Arvind ShuklaArvind Shukla   7 April 2020 12:45 PM GMT

विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेष- "प्राथमिक स्वास्थ केंद्र नहीं सुधारे गए तो इलाज के लिए बिकते रहेंगे मंगलसूत्र और जमीनें"दवा-इलाज भारतीय परिवारों के लिए कर्ज़ की बड़ी वजह है।

भारत में आम आदमी के लिए इलाज कराना (कोरोना से इतर) कितना मुश्किल है, दो घटनाओं से समझिए। इलाज के लिए कर्ज़, गहने बेचना, जमीन गिरवी रखना बदस्तूर जारी है, लोगों को अस्पतालों से अपने रिश्तेदारों के शव लाने के लए भी चंदा लगाना पड़ता है।

मजदूरी कर परिवार चलाने वाले 32 साल के कल्लू की इलाज के दौरान लखनऊ के एक निजी अस्पताल में मौत हो जाती है। अस्पताल में करीब पौने 2 लाख रुपए खर्च हुए। कल्लू की मां मेहरून्निशा (60 वर्ष) को बेटे का शव घर लाने के लिए मुहल्लेवालों और रिश्तेदारों से चंदे की तरह उधारी मांगी। 70 हजार रुपए देने के बाद शव मिला, लेकिन अस्पताल का एक लाख 20 हजार अभी भी बाकी है।

कल्लू के घर से करीब 300 किलोमीटर दूर बुंदेलखंड के चित्रकूट के भारतपुर गांव में रहने वाली आरती देवी (33 वर्ष) की डेढ साल की बेटी छत से गिर गई। वो खून से लथपथ बेटी को लेकर कर्वी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं, जहां से इलाहाबाद रेफर किया गया। बेटी को बचाने के लिए आरती को अपना मंगलसूत्र बेचना पड़ा। गांव के लोगों से 15 हजार का कर्ज़ भी लिया।

"बेटे का शव लाने के लिए किसी से 2000 रुपए लिए थे तो किसी से 5000 हजार। मैंने सोचा था जमीन बेचकर दे दूंगी लेकिन उसमे झंझट (कानूनी पेंच) फंसा है। कल्लू के दो नाबालिग बेटे हैं तो बिक नहीं रही। मेरा जीना मुश्किल हो गया, जिनसे पैसे लिए थे वो भी गरीब हैं, लेकिन हम वापस कहां से करें।" अपनी बात खत्म होने से पहले मेहरून्निशा (60 वर्ष) फफक पड़ती हैं।

मेहरून्निशा यूपी की राजधानी लखनऊ से 70 किलोमीटर दूर बाराबंकी के गौरा सैलख गांव में रहती हैं। विधवा मेहरून्निशा ने अपने तीनों बेटों में 10-10 विश्वा जमीन (एकड़ का 10वां हिस्सा) बांट रखी है। सबसे छोटे बेटे कल्लू की शादी छह साल पहले हुई थी, उसके भी दो बेटे हैं।

मेहरून्निशा की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती। कल्लू की पत्नी शाजिदा (30 वर्ष) को टीबी है। वो कहीं मजदूरी भी नहीं कर सकती। पति की मौत, खुद की बीमारी और कर्ज़ के बोझ ने शाजिदा को अंदर से तोड़कर रख दिया है।

"अस्पताल से अक्सर फोन आता है कि तीन महीने हो गए पैसे नहीं दिए। मैं पैसे कहां से लाऊं, मेरे अंदर तो घर में काम करने की ताब (हिम्मत) नहीं, चलने उठने में सांस फूलती है। मजदूरी भी नहीं कर सकती। मायके में पिता-भाई कोई नहीं है, ससुराल में सास (मेहरुन्निशा) के सहारे हूं,"साजिदा कहती हैं।

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मेहरूनिशा ये भी बताती हैं कि सबसे पहले उन्होंने आसपास के डॉक्टरों, फिर सरकारी अस्पताल में दिखाया लेकिन फायदा नहीं हुआ। एक अस्पताल में 30 हजार रुपए भी खर्च हुए थे।

"एक शाम को बेटे को बहुत तेज दर्द हुआ तो हम लोग फतेहपुर लेकर भागे। हमारे बड़े बेटे के नाम मोदी कार्ड (आयुष्मान भारत) है। उसमें सबके नाम हैं। लेकिन अस्पताल वालों ने तमाम कागज मांग लिए लड़का दर्द से तड़प रहा था तो हम लेकर लखनऊ (निजी अस्पताल) भाग गए वहां 2- 2 ऑपरेशन हुए लेकिन बचे नहीं।"

मेहरुन्निसा और आरती जैसे लोगों की भारत में संख्या लाखों में है। कोरोना महामारी से पहले भारत के हेल्थ सेक्टर में जिला अस्पतालों को पब्लिक प्राइवेट पार्टनर्शिप पर देने की चर्चा चल रही थी, ऐसे में मेहरून्निशा, शाजिदा और आरती के दर्द का इलाज और दुश्कर लगने लगता है।

दवा-इलाज भारतीय परिवारों के लिए कर्ज़ की बड़ी वजह है। क्योंकि सरकारी चिकित्सा तंत्र, सामाजिक स्वास्थ्य बीमा योजनाएं लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने में नाकाम हैं।

भारत में मरीजों की बढ़ती संख्या, अस्पताल और डॉक्टरों के अनुपात पर नजर डालेंगे तो समस्या और गंभीर होती नजर आती है

"भारत में लोगों का कर्ज़ बढ़ने की दूसरी सबसे बड़ी वजह इलाज है। जैसे ही कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है लोग कर्ज़ लेते हैं या फिर अपनी चल-अचल संपत्ति बेचते और गिरवीं रखते हैं। सरकारी अस्पतालों में इन लोगों का इलाज नहीं हो पाता। भारतीय रिजर्व बैंक और कई दूसरी रिपोर्ट में किसान-ग्रामीणों की आत्महत्या के पीछे इलाज के लिए लिया गया कर्ज़ वजह बताया गया है," जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ता रवी दुग्गल कहते हैं।

रवि दुग्गल दिल्ली में रहते हैं लंबे समय से यूनिवर्सल हेल्थ केयर सिस्टम, यानि सबको स्वास्थ्य को लेकर काम कर रहे हैं। जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बेहतर सरकारी सुविधाएं मुख्य मांगें हैं।

भारत में मरीजों की बढ़ती संख्या, अस्पताल और डॉक्टरों के अनुपात पर नजर डालेंगे तो समस्या और गंभीर होती नजर आती है।

देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं पर जारी होने वाली रिपोर्ट 'नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2018' के अनुसार देश में 37,725 सरकारी अस्पतालों में 7,39,024 बेड हैं। करीब 10 हजार लोगों पर सिर्फ एक एलोपैथि‍क डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार प्रति 1000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

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रिपोर्ट ये भी कहती है, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की जर्जर हालत, डॉक्टरों की कमी और खस्ताहाल स्वास्थ्य सुविदाओं के बवाजूद भारत अपनी कुल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का मात्र 1.4 फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का मानक जीडीपी का 6 फीसदी माना गया है। भारत अपने सार्वजानिक स्वास्थ्य पर अपने पड़ोसी देशों श्रीलंका-नेपाल (2.5 फीसदी) और भूटान से भी कम पैसे खर्च करता है।

जमीन के लिए लोगों के कर्ज़दार और गरीबी रेखा से नीचे जाने के पीछे रवि दुग्गल कहते हैं, "खुद नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार भारत में एक आम नागरिक साल में कम से कम 4500-5000 रुपए अपनी सेहत पर खर्च करता है जबकि सरकार अपनी तरफ से मात्र 1400-1500 रुपए खर्च करती है। देश में ऑऊट ऑफ पाकेट एक्सपेंडिचर (जेब से अधिक खर्च ) 60-70 फीसदी के आसपास है। जिसमें से बड़ा हिस्सा दवाइयां पर खर्च होता है।"

आउट ऑफ पाकेट (ओओपी) वो खर्च होता है जो केंद्र और राज्य सरकारों, बीमा कंपनियों से मिली स्वास्थ्य सुविधाओं से अलग मरीज या उसके परिजन अपनी जेब से खर्च करते हैं। सरल शब्दों में ये पैसा व्यक्ति की कमाई, गहने-जमीन और पशु जैसी चल-अचल संपत्ति से आता है।

दवाइयां भारतीय परिवारों पर सबसे बड़ा बोझ हैं ये खुद केंद्रीय मंत्रालय भी कहता रहा है। साल 2014-15 में स्वास्थ्य पर जो तीन लाख करोड़ रुपए खर्च हुए थे, उसमें से कुल आउट ऑफ पाकेट (जेब से अधिक) में लगभग 43 फीसदी की दवाइयां खरीदने में गया था। साल 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में सार्वजनिक स्वास्थ्य में नि:शुल्क दवाइयां देने की वकालत की गई है। सरकारी रिपोर्ट्स ये भी कहती हैं कि सात फीसदी भारतीय सिर्फ दवा-इलाज के चलते पहले कर्ज़ में डूबे फिर गरीबी रेखा के नीचे चले गए।

भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को स्वाथ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए अप्रैल 2018 से आयुष्यान भारत योजना या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना(PM-JAY) शुरु की गई। PM-JAY के तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवार के करीब 50 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य सुरक्षा कवर दिया जा रहा है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता लगातार पूरे देश में नि:शुल्क दवा योजना की मांग करते रहे हैं।

इन 10 करोड़ परिवारों में कल्लू और चित्रकूट की आरती की बेटी भी आती है लेकिन ऐसे हजारों लोगों को संस्थागत खामियों, जागरुकता के अभाव आदि के चलते लाभ नहीं मिल पाता।

इस बारे में स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रही देश की जानी-मानी पत्रकार पत्रलेखा चटर्जी कहती हैं, "आयुष्मान योजना लाई ही इसलिए गई थी कि बढ़ते स्वास्थ्य खर्च की समस्या कम हो, लेकिन कुछ जगहों को छोड़कर ऐसा कहीं नहीं दिखता। यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में बहुत समस्याएं हैं। जहां ये योजना कामयाब हुई वो दक्षिण भारत के राज्य पहले से अपनी सेहत पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। योजना के तहत 2022 तक देश में डेढ लाख हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर बनाए जाने थे, जो अभी बने हैं (38187 सात अप्रैल 2020 तक) जो बदहाल हैं।"

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सभी को एक समान और प्राथमिक स्तर पर बेहतर चिकित्सा सुविधा की वकालत करते हुए पत्रलेखा चटर्जी कहती हैं, "देखिए सेहत के साथ बहुत कुछ जुड़ा है। अगर कोई परिवार सेहत पर ज्यादा पैसे खर्च करेगा, तो वो शिक्षा और पोषण पर समझौता करेगा। अगर ज्यादा खर्च हुआ और उसने अपनी कोई संपत्ति बेची तो गरीब परिवार और असहाय हो जाएगा।"

राजस्थान में इन दिनों "राइट टू हेल्थ" बिल की चर्चा जोरों पर है। अगर ऐसा होता है तो वो देश का पहला राज्य बनेगा। राजस्थान में जारी मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना की पहले ही सराहना होती रही है। राजस्थान में कैंसर और किडनी समेत 712 तरह की दवाएं मुफ्त में मिल रही हैं। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणापत्र में इसका का जिक्र किया था। "राइट टू हेल्थ" की मांग और बिल का ड्राफ्ट बनाने में जुड़ी रहीं राजस्थान की हेल्थ एक्टिविस्ट छाया पचौली 'गांव कनेक्शन' को फोन पर बताती हैं, "देश में एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसे 2000-5000 तक के इलाज के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ता है। जेवर और पशु बेचने पड़ते हैं। बड़ी घोषणाओं और बीमा योजनाओं की बात होती है। लेकिन प्राथमिक स्तर पर किसी का ध्यान नहीं है। बीमा योजना का मतलब है कि लोग इतने बीमार पड़ें कि उन्हें भर्ती कराना पड़े, लेकिन अगर प्राथमिक स्तर पर गांव के पास ही इलाज मिल जाए तो लोग बीमार ही कम पड़ेंगे।"

स्वास्थ्य कार्यकर्ता लगातार पूरे देश में नि:शुल्क दवा योजना की मांग करते रहे हैं। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री जन औषधि योजना 2015 से लागू है, जिसके तहत चुनिंदा दवा बिक्री केंद्रों पर जेनरिक दवाएं सस्ती दरों पर मिलती हैं, लेकिन स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसे नाकाफी बताते हैं।

"जेनेरिक दवाएं सस्ती हैं लेकिन 'सस्ती' के लिए सबके मायने अलग हैं। हमारे देश में बहुत सारे परिवार दिन में 200-300 रुपए कमा पाते हैं, उनके लिए तो जेनरिक दवाएं भी महंगी होंगी, दूसरे डॉक्टर इन दवाओं को पर्चे में लिखते ही कितनी हैं, इसलिए जरूरी है इसे राष्ट्रीय योजना बनाकर सभी के लिए नि:शुल्क बनाया जाना चाहिए,' छाया पचौली आगे जोड़ती हैं।

भारत में कुछ राज्य जन स्वास्थ्य को लेकर बेहतरीन काम कर रहे हैं। इनमें मिजोरम, केरल, गोवा और तमिलानाडु जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में ज्यादातर इलाज संस्थागत होता है।

जन स्वास्थ्य अभियान के रवि दुग्गल कहते हैं, "हमें विदेशों की बीमा आधारित योजनाओं को मॉडल अपनाने के बजाए अपने देश के सफल मॉडल देखने चाहिए। हम लोगों ने नीति आयोग और सरकार दोनों को पीपीपी मॉडल को लिखकर विरोध जताया है। सरकार का माइंडसेट है कि सरकारी अस्पतालों को चलाने का ही नहीं है। लेकिन आम लोगों का हित इसमें है कि जन स्वास्थ्य बीमा पर निर्भर न होकर अस्पतालों पर हो। अस्पतालों में 70-80 फीसदी खाली पड़े पदों को भकर वहां संसाधन देने की जरुरत है। वर्ना लोग निजी अस्पातलों में फंसकर कर्जदार बनते रहेंगे।"

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भारत में स्वास्थ्य राज्य का विषय है। संविधान में इलाज को लेकर कानूनी बाध्यता नहीं है। साथ ही,निजी अस्पतालों रेग्युलेट करने के लिए कड़े प्रावधान भी नहीं है। रवि दुग्गल कहते हैं, "संविधान में स्वास्थ्य Directive Principles (निर्देशक सिद्धांत) है, तो उसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी सकती, लेकिन संविधान में ही राइट टू लाइफ, जिसके तहत कई केस हुए हैं। खुद सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि एक्सीडेंट आदि के दौरान कोई अस्पताल प्राथमिक इलाज से मना नहीं कर सकता है। जैसे आर्टिकल 21ए के तहत शिक्षा का अधिकार है वैसी अगर आर्टिकल 21बी में अमेंडमेट कर कड़े प्रावधान किया जाएं तो अच्छा हो सकता है।

भारत में प्राइवेट सेक्टर रेग्युलेट करने के लिए मनमोहन सरकार में 2010 में क्लीनिकल स्टैब्लिशमेंट एक्ट लाया गया था लेकिन इसे सिर्फ 7-8 राज्यों ने ही लागू किया। इसके अंतर्गत रजिस्ट्रेशन कराने पर हर राज्य को अस्पतालों में न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

रवि दुग्गल कहते हैं, "ये कानून अच्छा है लेकिन इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है। जिन राज्यों में प्राइवेट सेक्टर मजबूत था उसने लागू नहीं किया। जरुरत है कि सरकार ऐसे एक्ट में सुधार करे।

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