सेहतमंद खाना छोड़िए, सूखी रोटी खाकर ये महिलाएं देती हैं बच्चों को जन्म...

सेहतमंद खाना छोड़िए, सूखी रोटी खाकर ये महिलाएं देती हैं बच्चों को जन्म...ये वो सच है जो भारत को पता होना चाहिए.... फोटो नीतू सिंह

लखनऊ। अगर आप गांव में रहते हैं तो शायद सुना हो गर्भवती महिला से दादी नानी कहा करती थीं, अरे कुछ खाया पिया करो बच्चे को जन्म देना है.. सिर्फ दादी नानी नहीं डॉक्टर भी कहते हैं की गर्भावस्था में महिला को अच्छा और पौष्टिक खाना चाहिए।

सरकार भी यही कहती है और कई योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन क्या महिलाओं को इन दिनों में अच्छा पौष्टिक खाना मिलता है, दूध दही, विटामिन जैसा कुछ... नहीं, गांवों में रहने वाली एक बड़ी आबादी सूखी रोटी, कभी सब्जी तो कभी सिर्फ दाल खाकर बच्चे को जन्म देती है..

छह महीने की गर्भवती संतोषी देवी ने बताया, “घर और खेत में काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। जब दस ग्यारह बजे खेत में काम करके आते हैं तब खाना खाते हैं। गाँव में दाल सब्जी एक साथ दोनों चीजें नहीं बनती। फल इतने महंगे हैं रोज खा पाना मुश्किल है। हमेशा की तरह इन नौ महीनों में भी हमारे लिए घर और खेत में काम करना कोई नई बात नहीं है।”

देश की ज्यादातर ग्रामीण गर्भवती महिलाओं की दिनचर्या और खानपान संतोषी देवी से मिलता-जुलता है। इनके घरों में आज भी दाल और हरी सब्जी एक साथ नहीं बनती। नौ महीने गर्भ के दौरान ये दो तीन किलो फल खा लें बड़ी बात है। दिन में तीन बार खाना और बीच-बीच में कुछ हल्का-फुल्का खाते रहना इनके लिए मुश्किल होता है।

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सामान्य दिन की अपेक्षा गर्भावस्था के दौरान इनकी दिनचर्या, इनका काम, इनके खानपान में कोई ख़ास अंतर नजर नहीं है। यही वजह है देश में बच्चे को जन्म देने के दौरान हर पांच मिनट में एक गर्भवती महिला की मौत हो जाती है।

संतोषी देवी लखनऊ जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर माल ब्लाक के रामपुर गाँव की रहने वाली हैं। इस गाँव में इस समय 14 महिलाएं गर्भवती हैं जिनकी दिनचर्या संतोषी से लगभग मिलती जुलती है। इनके साथ दो तीन घंटे वक़्त बिताने के बाद हमें ये पता चला कि स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इतने गंभीर क्यों हैं।ये गर्भवती महिलाएं सुबह पांच बजे से लेकर से लेकर रात नौ बजे तक घर से लेकर खेत-खलिहान तक खटती रहती हैं।

इन गर्भवती महिलाओं ने बताया, ‘अगर घर और खेत में काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा’

खाने ने नाम पर इन्हें जो रूखा-सूखा मिलता है ये खा लेती हैं यही वजह है भारत देश में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार बच्चे को जन्म देने के दौरान हर पांच मिनट में एक गर्भवती महिला की मौत हो जाती है। ओनली माई हेल्थ वेबसाइट के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि हर साल बच्चे के जन्म से जुड़ी पांच लाख 29 हजार महिलाओं की मौत होती है। जिनमें एक लाख 36 हजार यानि 25.7 फीसदी महिलाएं केवल भारत में मरती हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के आंकड़ों के अनुसार देश में 83 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं और 70 फीसदी शहरी महिलाएं प्रसव पूर्व देखभाल के चारो चरण पूरे नहीं करती। गर्भवती महिलाओं के प्रति ये स्थिति चिंताजनक है।

एएनएम और आशा बहु गाँव की गर्भवती महिलाओं के साथ बैठक करती हुई

ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट 2017 के आंकड़े के अनुसार प्रजनन क्षमता वाली उम्र की 51 फीसदी महिलाएं अभी भी एनिमिक है। ये चिंताजनक आंकड़े समाज की सोच और सिस्टम दोनों को जिम्मेदार मानते हैं। देश में आज भी गर्भवती महिला की सेहत और खानपान को पति और परिवार गम्भीरता से नहीं लेते हैं।

उत्तर प्रदेश महिला एवम परिवार कल्याण विभाग की महानिदेशक डॉ नीना गुप्ता का कहना है, “ग्रामीण क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को हर महीने की नौ तारीख को पूरी जांच की जाती है। एक गर्भवती महिला को 2200 कैलोरी प्रतिदिन लेना चाहिए जिसमें दाल, प्रोटीन, मौसमी फल, हरी सब्जियां, मिनरल, कैल्शियम, आयरन और एक गिलास दूध जरुर शामिल हो। अगर गर्भवती महिलाएं ये चीजें नहीं खा पाती हैं तो एनिमिया की शिकार हो जाती हैं।”

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ये हैं पांच महीने की गर्भवती लक्ष्मी, जो घर और खेत में काम करती हैं पर खाने के नाम पर सब्जी रोटी, कभी-कभार दाल रोटी खा लेती हैं

वो आगे बताती हैं, “इनका खानपान पैसे के अभाव में रुके नहीं इसके लिए पिछले साल से जननी सुरक्षा मातृत्व वंदना योजना के तहत पहले बच्चे के गर्भवती होने पर महिला को पंजीकरण के दौरान एक हजार रुपए, छह महीने होने पर दो हजार रुपए, बच्चे के जन्म के बाद दो हजार दिए जाते हैं। कुल मिलाकर इस योजना के तहत पांच हजार रुपए दिए जाते हैं जिससे महिला अपना खानपान बेहतर रख सके।”

डॉ के सुझाव चाहें जितने हो लेकिन गर्भवती महिलाओं की स्थिति में कोई ख़ास बदलाव नहीं हुआ है। रामपुर की पांच महीने के गर्भवती पिंकी (22 वर्ष) ने बताया, “घर पर दूध नहीं होता है इसलिए दूध नहीं पी पाते हैं। अनार, सेव, संतरा इतने महंगे मिलते हैं जो खरीदना मुश्किल होता है। दो तीन महीने में एक किलो खरीद भी लिए तो परिवार में मिल बाँट कर खाना पड़ता है।”

ये बताते हुए पिंकी के चेहरे पर एक उदासी थी, “हमें पता है इस समय हमें क्या खाना है पर गाँव में रहकर हर चीज खाना मुश्किल है। खेती किसानी वाले लोगों के लिए दूध, दाल, सब्जी फल और सलाद हर दिन खाना सम्भव नहीं है। ये चीजें महीने में एक बार भी खाने को मिल जाए तो ये हमारे लिए बहुत बड़ी बात है।”

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अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है। इसका लाभ करीब 18 लाख कामकाजी महिलाओं को मिलेगा। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को प्रधानमंत्री की इस घोषणा से कोई सरोकार नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की अलग तरह की मजबूरियां है जिसका सरकारी योजनायें बनते समय कभी जिक्र नहीं होता। यही वजह है सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है।

रामपुर गाँव की आशा बहु कंचन लता ने बताया, “गाँव में आज भी घर और खेत में काम करना महिलाओं की जिम्मेदारी होती है, वो गर्भवती है इससे परिवार में ज्यादा किसी को कोई लेना-देना नहीं होता है। काम के बोझ की वजह से महिलाओं ने जल्दी-जल्दी रुखा सूखा खाया और काम में लग गयी। चक्कर आना, हाथ-पाँव में दर्द होना, जी मिचलाना इसे ये सामान्य मानती हैं।”

वो आगे बताती हैं, “एक महिला को बच्चा कब पैदा करना है, कितने पैदा करना है ये उस महिला के परिवार वाले निश्चित करते हैं। मेरी भी शादी चौदह साल में हो गयी थी, घर में ज्यादा बच्चे हों इसका दबाव परिवार वालों ने बनाया। आठ बच्चे हुए जिसमें तीन मिसकरेज हो गये।”

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एएनएम कल्पना देवी ने कहा, “सरकार से जो पैसों की मदद मिलती भी है गाँव की महिला उन पैसों से भी कुछ खा नहीं पाती हैं क्योंकि ये पैसे भी घर के कामों में खर्च हो जाते हैं। हम लोग महिलाओं को जागरूक तो करते हैं कि अगर वो फल नहीं खा सकती तो चने और गुड़ खाएं लेकिन काम के आगे ये दवाई खाना तक भूल जाती हैं। ये किसी एक महिला की समस्या नहीं है, गाँव में रहने वाली हर महिला रूखा-सूखा खाकर ही बच्चे को जन्मे देती है जिससे जच्चा और बच्चा दोनों के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।”

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