भारत में रहते हैं इतने देशों के शरणार्थी , लाखों में है संख्या 

Anusha MishraAnusha Mishra   30 Sep 2017 2:20 PM GMT

भारत में रहते हैं इतने देशों के शरणार्थी , लाखों में है संख्या भारत में शरणार्थी

लखनऊ। शरणार्थियों को शरण देने के मामले में भारत हमेशा से मशहूर रहा है। ऐसा कहा जाता है कि जब किसी को कहीं ठिकाना नहीं मिलता तो हमारा देश उसे सहारा देता है। लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत में रहते हैं।

इस समय पूरी दुनिया में रोहिंग्या मुसलमानों का शरणार्थी संकट चर्चा का विषय बना हुआ है। 25 अगस्त को रोहिंग्या चरमपंथियों ने म्यामांर के उत्तर रखाइन में पुलिस पोस्ट पर हमला कर 12 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया था। इस हमले के बाद सेना ने अपना क्रूर अभियान चलाया और तब से ही म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है। आरोप है कि सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों को वहां से खदेड़ने के मक़सद से उनके गांव जला दिए और नागरिकों पर हमले किए।

पिछले महीने शुरू हुई हिंसा के बाद से अब तक करीब 3,79,000 रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। शरणार्थियों की अंतराष्ट्रीय संस्था के मुताबिक, अक्टूबर 2016 से जुलाई 2017 तक 87,000 रोहिंग्या म्यांमार से बांग्लादेश जा चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने कहा कि म्यांमार के राखिने प्रांत में 25 अगस्त को भड़की हिसा के बाद पलायन कर बांग्लादेश पहुंचे रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या 4,80,000 तक पहुंच गई है और इस तरह बांग्लादेश में मौजूद रोहिंग्या शरणार्थियों की कुल संख्या सात लाख के ऊपर हो गई है।

पारसी शरणार्थी

हमारे देश में सबसे पहले जो शरणार्थी आए वो पारसी थे। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, 9वीं - 10वीं सदी में पारसी भारत आए थे और उन्होंने गुजरात के सूरत शहर में अपना डेरा जमाया। पारसी इतिहास के अनुसार, तुर्कमेनिस्तान के सांजन से माइग्रेट होकर वे भारत आए थे। आंकड़ों के अनुसार पारसियों की आबादी बहुत तेज़ी से घट रही है। साल 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से देश में 69 हज़ार से कम पारसी बचे थे। 'पारसी वेलफ़ेयर स्टेट' के आंकड़ों के हिसाब से अब ये आंकड़ा 60 हज़ार के क़रीब आ चुका है।

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तिब्बती शरणार्थी

14वें दलाई लामा के आदेश का पालन करते हुए 150,000 से ज़्यादा तिब्बती रिफ्यूजी पिछले 50 सालों में भारत आ चुके हैं। 1959 में तिब्बती विद्रोह निष्फल होने के बाद दलाईलामा भारत आ गए थे। उस समय वो 80,000 तिब्बती शरणार्थियों को लेकर भारत आए थे। तत्कालीन राष्ट्रपति जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें यहां रहने की इजाज़त दी थी। फिलहाल भारत में 1,20,000 शरणार्थी रह रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के मैकलोडगंज से तिब्बती सरकार के निर्वासन कार्य होते हैं।

1960 में मैसूर की सरकार ने (तब कर्नाटक को मैसूर कहते थे) तिब्बती शरणार्थियों के लिए 3,000 एकड़ ज़मीन दी थी। यह ज़मीन कर्नाटक के मैसूर जिले में बालाकूप्पे में दी गई। इसे लुगसुंग समदुपलिंग नाम दिया गया और यह 1961 में अस्तित्व में आया। इसके कुछ साल बात एक और निवार्सन तिब्बती डिकी लार्सो उन्हें दिया गया। कर्नाटक में इसके बाद तीन और निवार्सन तिब्बती शरणार्थियों को दिए गए। इसके बाद बिर तिब्बती कॉलोनी का हिमाचल प्रदेश में निर्माण हुआ। ओडिशा के गजपति ज़िले में भी भारी संख्या में तिब्बती शरणार्थी रहते हैं और उत्तारखंड की राजधानी देहरादून में भी तिब्बतियों की एक कॉलोनी है जिसका नाम है क्लैमेंटाउन।

भारत सरकार देती है ये सुविधाएं

भारत सरकार ने तिब्बतियों के लिए विशेष स्कूल खुलवाए हैं जहां उन्हें मुफ्त शिक्षा मिलती है, साथ ही उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं और छात्रवृत्ति भी मिलती है। कुछ मेडिकल और सिविल इंजीनियरिंग की सीटें भी तिब्बतियों के लिए आरक्षित हैं। तिब्बती भारत में एक स्टे परमिट के साथ रहते हैं जिसे रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट कहा जाता है। यह साल रिन्यू कराना पड़ता है, कुछ जगह छह महीनों में भी। 16 साल की उम्र से अधिक के हर तिब्बती को स्टे परमिट लेना पड़ता है। भारत सरकार रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की तरह एक यलो बुक भी तिब्बती शरणार्थियों लिए इशू करती है जिसे तिब्बतियों की विदेश यात्रा के दौरान पहचान पत्र माना जाता है।

बांग्लादेश के शरणार्थी

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान, बांग्लादेश-भारत की सीमा को पाकिस्तान सेना की एसएसजी इकाइयों से सुरक्षित आश्रय देने के लिए व उनके द्वारा किए जा रहे नरसंहार से बचने के लिए खोल दिया गया था। पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय और त्रिपुरा की राज्य सरकारों ने सीमा पर शरणार्थी कैंप लगवाए थे। 1971 के खूनी संघर्ष में दस लाख से ज्यादा बांग्लादेशी शरणार्थियों ने भारत में शरण ली थी। 2001 की एक रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में दमन से बचने के लिए कई बांग्लादेशी हिंदू परिवार सीमा पार कर भारत आ गए। 2012 में आई केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 83,438 बांग्लादेशी नागरिक शरणार्थी बनकर रह रहे हैं।

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अफगानिस्तान के रिफ्यूजी

सोवियत अफगान युद्ध के दौरान 1979 से 1989 के बीच 60,000 से ज़्यादा अफगानी नागरिकों ने भारत में शरण ली। हालांकि भारत सरकार अफगानियों को आधिकारिक तौर पर शरणार्थी नहीं मानती लेकिन भारत की यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी संस्था को यह आदेश दिया गया है कि वो इनके लिए कार्यक्रम चलाए।

पाकिस्तान के शरणार्थी

भारत सरकार ने 2015 में 4,300 पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थियों को भारत में शरण दी। पाकिस्तान से आए शरणार्थी गुजरात के अहमदाबाद और सूरत, राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और जयपुर में रह रहे हैं।

श्रीलंका के तमिल शरणार्थी

भारत में श्रीलंका के 100,000 से ज़्यादा तमिल रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर 1970 में श्रीलंका में चरमपंथ की शुरुआत के समय भारत आ गए थे। ये लोग भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के चेन्नई, तिरुचापल्ली और कोयंबटूर में, कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में वह केरला में रह रहे हैं।

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