ग्रामीण भारत में कुपोषण और मोटापे की स्थिति चिंताजनक

ग्रामीणों में बढ़ता मोटापा देश में अल्प पोषण की खतरनाक स्थिति को बयान कर रहा है। दिसंबर 2020 में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़ों के अनुसार भारत के गांवों में मोटापे के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

Patralekha ChatterjeePatralekha Chatterjee   9 March 2021 12:15 PM GMT

ग्रामीण भारत में कुपोषण और मोटापे की स्थिति चिंताजनकमोटापा और कुपोषण, ग्रामीण भारत के लिए दोनों गंभीर चुनौती बन गये हैं। (Unicef India)

पूर्वी चंपारण का गांव मंगरुहा उन गांवों में से एक है जो शायद ही कभी समाचारों में आता है, लेकिन पटना में रहने वाले एक डॉक्टर जो साप्ताह के अंत में रूरल क्लिनिक चलाते हैं, ने गौर किया कि लगभग 3,500 की आबादी वाले इस गांव के लोगों में मोटापा बढ़ रहा है।

भारत में अभी भी अविकसित, कमजोर कम वजन और ज्यादा वजन वाले बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन मोटापा भी बढ़ रहा है, और यह समस्या अब बस शहरी नहीं रहा। यहां तक कि देहात में रहने वाले गरीब आदमी, महिलाएं और बच्चे भी इससे प्रभावित हैं।

प्रत्यूष कुमार ने मंगुराहा में अपने पैतृक घर के एक हिस्से को हेल्थ क्लिनिक में बदल दिया है। हर सप्ताह के अंत में वे बस में बैठते हैं और अपने गांव आ जाते हैं। हालांकि, उन्होंने गिना तो नहीं है लेकिन उनका कहना है कि हाल के वर्षों में मोटापे वाले रोगियों की संख्या बहुत बढ़ी है। वे कहते हैं, "यह समस्या बुजुर्गों के बीच सबसे ज्यादा है, लेकिन उनमें से 40 के आसपास उम्र वाले लोगों का भी वजन ज्यादा है।"

भारत में मोटापा किन कारणों से बढ़ रहा, इस पर कोई व्यवस्थित अध्ययन तो नहीं किया गया है लेकिन कुमार ने कुछ संभावित कारणों की लिस्ट बनाई है।

"जिन रोगियों को मैंने देखा है वे ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना जैसे- चावल और आलू खाते हैं। दोनों से वजन बढ़ सकता है। खासकर महिलाओं की जीवनशैली ज्यादा सुस्त हो गई है। गांवों में जंक फूड और फास्ट फूड पहुंच चुका है।" कुमार गाँव कनेक्शन को बताते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में मोटापे पर और अच्छे तरीके से काम करने की जरूरत है। फोटो- Jayanti Baruda

"एक और महत्वपूर्ण कारण है। गांवों में रहने वाले कई लोग अब क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और आर्थराइटिस से पीड़ित हैं। इस वजह से वे गहरी पीड़ा में है। इससे बचने के लिए वे कई बार डेक्सामेथासोन और बेटमेथासोन जैसे स्टेरॉयड लेना शुरू कर देते हैं। ये वे दवाएं हैं जो बिना डॉक्टरी सलाह के नहीं ली जानी चाहिए लेकिन गांवों में लोग बिना किसी डॉक्टारी सलाह के मेडिकल स्टोरी से ले लेते हैं।" कुमार कहते हैं। जब वे अपने क्लिनिक ऐसे मरीजों को देखते हैं तो उनमें इन दवाओं के दुरुपयोग के संकेत दिखते हैं जिसमें वजन का बढ़ना भी शामिल है।

मंगुराहा में जो दिखाई दे रहा है, वह भारत के गांवों की बड़ी समस्या का एक छोटा हिस्सा है।

ग्रामीण महिलाओं में तेजी से बढ़ रहा मोटापा

नये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-2020) के अनुसार, ग्रामीण बिहार में 14.2 प्रतिशत महिलाएं अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं जो की एनएफएचएस-4 (2015-2016) से (9.7 फीसदी) ज्यादा है। बिहार में मोटे और अधिक वजन वाले पुरुषों की संख्या NFHS-4 में 10.9 फीसदी थी जो NFHS-5 में बढ़कर 13.6 फीसदी पर पहुंच गई है।

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NFHS-5 से यह भी पता चलता है कि ग्रामीण बिहार में पाँच वर्ष से कम के 2.4 प्रतिशत बच्चे अधिक वजन वाले हैं। 2015-2016 में इन संख्याओं को महत्वहीन मान लिया गया और पोषण को लेकर मिले संकेत की ओर ध्यान नहीं दिया गया।

असम में पांच साल से कम उम्र के 33.6 फीसदी बच्चों का वजन कम है, लकिन नये एनएफएचएस आंकड़ों के अनुसार समान आयु वर्ग के ही 4.5 फीसदी बच्चों का वजन अधिक भी पाया गया।

राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS 2016- 2018) के आंकड़ों के अनुसार पांच से नौ वर्ष के अधिक वजन वाले बच्चे सबसे ज्यादा गोवा और नागालैंड (15 प्रतिशत) में थे, जबकि समान आयु के अधिक वजन वाले सबसे कम बच्चे झारखंड और बिहार में थे।

बच्चों की एक बड़ी आबादी को पर्याप्त खाना नहीं मिल पाता। (फोटो- नीतू सिंह)

अमेरिका की तीन शोध छात्रों नाका अय्यर, अंदलीब रहमान और प्रभु पिंगली ने विश्व विकास (विश्व विकास, खंड 138, फरवरी 2021) में भारत के ग्रामीण परिवर्तन और बढ़ते मोटापे को लेकर लिखे अपने लेख में चार महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।

ग्रामीण भारत में मोटापे का बढ़ना शहरीकरण से बहुत नजदीक से जुड़ा हुआ है। समाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में यह खतरा ज्यादा बढ़ा है, जो शहर के पास रहते हैं जहां की आबादी लगभग 50,000 की होती है और वे आर्थिक रूप से विकसित राज्यों में रहने वाले लोगों में भी मोटापे का खतरा ज्यादा है, जबकि गांवों में खाने में बहुत ज्यादा विविधिता है जो मोटापे को खतरे को कम करती है।

अय्यर, रहमान और पिंगली कहते हैं, "शहर से एक किलोमीटर की दूरी वाले ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में मोटापा 0.06 फीसदी बढ़ा है। अगर इसे और स्पष्ट रूप से देखें और दूरी को एक किलोमीटर और बढ़ा दें तो ऐसे शहरी प्रभाव वाले गांवों में लगभग 3,000 महिलाओं में मोटापा बढ़ा है।"

शोधकर्ता बताते हैं कि ग्रामीण गरीबों में मोटापे के बढ़ते खतरे का विकृत परिणाम यह है कि उन्हें इसकी वजह से गैर-संचारी बीमारियों की भयावहता का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के बीच बढ़ता मोटापा देश के किसी विशेष हिस्से तक सीमित नहीं है। यह अल्प पोषण की खतरनाक कहानी को दिखाता है।

मोटापे की चपेट में ग्रामीण आबादी

देश के पुरुषों और महिलाओं में मोटापा 1998-99 से 2015-16 तक दोगुनी हो गई है। पिछले दिसंबर में जारी भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के नये आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण और शहरी महिलाओं के बीच मोटापे का अंतर कम हो रहा है। कारण कि ग्रामीण आबादी के बीच मोटापा बहुत तेजी से बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब देश के ग्रामीण हिस्सों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है, यही कारण है कि ग्रामीण भारत में इससे जुड़ी बीमारियों बहुत तेजी से बढ़ रही हैं।

राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण 2016-2018 जिसने पूरे देश में अधिक वजन और मोटापे की समस्या को दिखाया, वह चिंता का विषय है। वयस्कों की बीमारी बचपन में ही शुरू हो जा रही है।

"गर्भाशय में अल्पपोषण या प्रारंभिक बचपन में वजन बढ़ने की आशंका ज्यादा रहती है जो वयस्कों में मधुमेह और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देता है (WHO, 2017)। बच्चों का अधकि वजन या मोटापे का संबंध उनकी मांओं के अधिक वजन से भी होता है। जीवन की शुरुआत में ही बच्चे कुपोषित या जिनका वजन बढ़ जाता है, वयस्क होने पर उनके लिए खतरा और बढ़ जाता है।"

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पोषण शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में मोटापे के कारणों का अधिक अध्ययन किया जाना चाहिए। शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में मोटापे से होने वाली बीमारियों जैसे हाई ब्लड शूगर के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारत की खाद्य प्रणालियों का पुनर्गठिन करने की आवश्यकता है। स्वस्थ भोजन न केवल उपलब्ध होना चाहिए बल्कि सभी के लिए सस्ती होनी चाहिए।

"अल्पपोषण और अतिपोषण के दोहरे बोझ से पूरी दुनिया परेशान है। हालांकि, अधिक वजन या मोटापे के कारणों की भारत में व्यवस्थित रूप से जांच नहीं की गई है। अध्ययन में पाया गया कि व्यक्तिगत स्तर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में रहने वाले लोगों में अतिपोषण की समस्या ज्यादा दिखी। हालांकि हाल ही में कम सामाजिक-आर्थिक विकास वाले राज्यों में भी अधिक वजन और मोटापे की समस्या देखी गई थी।" नवंबर 2018 में ओवरवेट/ओबेसिटी: एन इमर्जिंग एपिडेमिक इन द जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड डायग्नोस्टिक रिसर्च शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में मोहम्मद शनवाज और पेरियानायागम आरोकासामी ने इसका उल्लेख किया है।

भारत में मोटापा एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है जो अब गैर-संचारी या जीवन शैली की बीमारियों के लिए एक हॉट स्पॉट है, क्योंकि यह अन्य बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं, जैसे हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कैंसर को बढ़ाता है। मोटापे की वजह से COVID-19 का खतरा भी बढ़ जाता है। सार्वजनिक नीतियों में कुपोषण के साथ-साथ मोटापे और अल्पपोषण पर भी ध्यान देना होगा।

इस खबर को अंग्रेजी में यहां पढ़ें-

अनुवाद- संतोष कुमार

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