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सूख रही हैं जल-स्रोतों से निकलने वाली नदियां

आज ये नदियां ख़तरे में हैं और हमारी हरकतें ही इसके लिये ज़िम्मेदार हैं। विकास की अनियोजित दौड़ और जंगलों का अंधाधुंध कटान। पहले खेती, फल उत्पादन और चरागाह के लिये जंगल कटे फिर सड़कों और बड़े-बड़े बांधों के साथ घर बनाने के लिये।

Hridayesh JoshiHridayesh Joshi   5 Feb 2019 7:59 AM GMT

सूख रही हैं जल-स्रोतों से निकलने वाली नदियां


गगास घाटी का एक दृश्य, सैकड़ों हेक्टेयर में फैले उपजाऊ तट पर गगास नदी के जरिए सिंचाई की जाती है। फोटो: हृदयेश जोशी


पहाड़ की चोटी से एक समृद्ध हरी-भरी घाटी दिखती है। गेहूं, सरसों, बाजरा और तरह-तरह की सब्ज़ियों से भरे खेत नज़र आते हैं। खेतों की ओर इशारा करते 27 साल के भूपेंद्र सिंह बिष्ट की आंखों में एक चमक दिखती है।

हम हिमालय की गगास घाटी में हैं।"गगास नदी हमारे लिये बहुत महत्व रखती है। यह हमें पीने और सिंचाई के लिये पानी देती है," भूपेंद्र कहते हैं।

पहाड़ में ज़िंदगी कठिन है। खेती करना तो बिल्कुल भी आसान नहीं। लेकिन खुशकिस्मती से नदियों का एक विशाल जाल इन पहाड़ी बाशिंदों की मदद करता है। जंगल में कई स्रोतों से निकलने वाली ये नदियां कुमाऊं और गढ़वाल के इलाके में बिखरी हुई हैं।

"जंगल में जल स्रोतों से निकलने वाली नदियां उत्तराखंड के लोगों के लिये जीवनरेखा जैसी हैं। बड़ी नदियां तो बहुत नीचे घाटी में बहती हैं और गाँव के लोग उसके पानी का इस्तेमाल नहीं कर पाते। चाहे सवाल पीने के पानी का हो या फिर सिंचाई की सुविधा का। पहाड़ों में गूल (छोटी-छोटी नहरें) का सिस्टम बहुत अच्छा होता है। उसी का फायदा हिमाचल और उत्तराखंड के लोगों के पास है और जल स्रोतों से निकलने वाली नदियां काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं,"दिल्ली स्थित दि एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्ट्टियूट (टैरी) के योगेश गोखले कहते हैं।

रावलसेरा गाँव के भूपेन्द्र हमें एक स्थानीय जल स्रोत दिखाते हैं जो गगास से पानी ला रहा है। यह पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई के लिए सबसे प्रभावी है। फोटो: हृदयेश जोशी


गगास नदी उन हज़ारों नदियों में से एक है जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु की तरह नामचीन और विशाल भले ही न हो, लेकिन ऐसी नदियों के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। गगास उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले में भटकोटके जंगलों में एक जलस्रोत से निकलती है। करीब सवा सौ किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए यह नदी रानीखेत से महज़ 50 किलोमीटर दूर भिकियासैंण में रामगंगा (पश्चिम) से मिलती है। रास्ते में करीब सत्तर जलधारायें आकर गगास में मिल जाती हैं। यहां पहुंचते-पहुंचते गगास नदी करीब 6 दर्जन गाँवों के 1 लाख लोगों को खेती और पीने के लिये पानी देती आती है।

नदियों का विशाल जाल

रामगंगा (पश्चिम) और गगास जैसी नदियां भागीरथी, अलकनन्दा, यमुना और मंदाकिनी की तरह ग्लेशियर से नहीं निकलती। इनके अलावा गोमती, गरुड़गंगा, पनार, कोसी, बिनो और गौला जैसी कई नदियां हैं जो ग्लेशियर से नहीं, बल्कि घने जंगलों से आती हैं। ऐसी हज़ारों नदियों को 'फॉरेस्टरिवर' भी कहा जाता है और ये गंगा रिवर सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इन नदियों का धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। मिसाल के तौर पर जंगल से निकलने वाली दो बड़ी नदियां गोमती और गरूड़गंगा धार्मिक नगरी बैजनाथ में मिलती हैं जो कभी कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी। कत्यूरी साम्राज्य कुमाऊं का पहला संगठित राजवंश था।

उत्तराखंड में रानीखेत के पास बुद्ध केदार में रामगंगा (पश्चिम) और बिनो का संगम, रामगंगा उत्तराखंड की सबसे प्रमुख वन नदियों में से एक है। फोटो: हृदयेश जोशी

बर्बाद होता जलागम क्षेत्र, ख़तरे में पड़ी नदियां

आज ये नदियां ख़तरे में हैं और हमारी हरकतें ही इसके लिये ज़िम्मेदार हैं। विकास की अनियोजित दौड़ और जंगलों का अंधाधुंध कटान। पहले खेती, फल उत्पादन और चरागाह के लिये जंगल कटे फिर सड़कों और बड़े-बड़े बांधों के साथ घर बनाने के लिये। वर्ष 1980 से आज तक करीब 45000 हेक्टेयर वन भूमि इन कामों के लिये दी गई है। साल 2000 तक इसमें से 60 प्रतिशत के जंगल कट चुके थे। चूंकि यही जंगल पानी को संरक्षित करते हैं लिहाजा नदियां सूखती गईं।

जनगणना बताती है कि बीते दो दशकों में उत्तराखंड की शहरी आबादी दो गुना हो गई। वर्ष 2001 में 16.3 लाख से 2011 में करीब 31 लाख। इस बीच हरिद्वार और उधम सिंह नगर की आबादी 30.63% और 33.45% बढ़ी जबकि पहाड़ी ज़िलों नैनीताल, चम्पावत और उत्तरकाशी की आबादी 25.13%, 15.63% और 11.89% बढ़ी।

पिथौरागढ़ का एक दृश्य, जहां जनसंख्या के बढ़ते दबाव और अनियोजित निर्माण से पहाड़ियों में जल बहाव प्रभावित हुआ है। फोटो: विपिन गुप्ता


"गाँव खाली हो रहे हैं। लोग दूर दराज के इलाकों से पलायन कर रहे हैं। वह केवल मैदानी इलाकों में ही नहीं, बल्कि पहाड़ के बड़े कस्बों की ओर आ रहे हैं। पिथौरागढ़ जैसे बड़े पहाड़ी शहरों के अलावा डीडीहाट और बेरीनाग जैसे छोटे कस्बों में भी आबादी बढ़ रही है। पिछले 20 साल में यह चलन तेज़ी से बढ़ा है,"पिथौरागढ़ में रह रहे 39 साल के कोमल सिंह मेहता कहते हैं।

ज़ाहिर है आबादी बढ़ी तो घरों को बनाने के लिये जंगल कटे। फिर टूरिज्म के लिये होटल और रिसोर्ट बने। जंगल कटते गये। लेकिन कोई योजनाबद्ध तरीके से यह सब नहीं हुआ। पर्यावरण नियमों की ताबड़तोड़ अनदेखी हुई और जलागम क्षेत्र नष्ट होता गया।

अल्मोड़ा स्थित जीबी पन्त हिमालयन संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. जीसीएस नेगी कहते हैं, "आबादी बेतहाशा बढ़ी और सब कुछ अनियोजित हुआ है। पिछले पचास साल में अल्मोड़ा जैसे शहर 5 गुना बड़े हो गये। सारा निर्माण ऐसी जगहों में हुआ जहां कुएं हुआ करते थे। उन पर इमारतें बन गईं और वह नष्ट हो गये। इससे जलागम क्षेत्र बरबाद हुआ है।"

गोमती नदी उत्तराखंड के ऐतिहासिक शहर बैजनाथ में एक अन्य महत्वपूर्ण वन नदी गरुड़गंगा से मिलती है, इन जल धाराओं के साथ कई पौराणिक और धार्मिक कहानियां जुड़ी हुई हैं। फोटो: हृदयेश जोशी

भू-जल का दोहन

जंगल से आने वाली इन नदियों की सेहत पहाड़ के छोटे-छोटे नालों और गधेरों (छोटी जलधारायें) से भी तय होती है। नदियों की जान कहे जाने वाले ऐसे गधेरे अब सूख रहे हैं।

51 साल के राम सिंह भंडारी याद करते हैं कि 25 साल पहले जितनी बरसात होती थी वैसी बारिश अब नहीं होती। सो बरसाती गधेरे तो वैसे ही सूख रहे हैं। लेकिन जल निगम जैसे विभाग जो पानी पहुंचाने का काम करते हैं उन्होंने भी पानी की योजनाओं के लिये ग़लत रास्ते अख़्तियार किये। नदी से पाइपलाइन बिछाने की बजाय विभाग के लोगों ने भूजल के दोहन के लिये बोरिंग शुरू करवा दी।

जलधारा का विनाश: ऐसे स्थानीय नाले कभी जीवित थे और जिन्होंने वन नदियों को ताकत दी। फोटो: हृदयेश जोशी


आज पहाड़ में सड़क किनारे कई हैंडपम्प दिखते हैं। गाँवों में भी इनकी संख्या अच्छी खासी है। उत्तराखंड में कई आंदोलनों को हिस्सा रहे चारु तिवारी बताते हैं, "इन हैंडपम्पों से पानी निकालना समस्या को हल करने का एक आसान तरीका ज़रूर था, लेकिन पहाड़ में पानी के प्राकृतिक स्रोत नौले (छोटे कुएं) सूखते गये। ये नौले छोटी नदियों और गधेरों को जीवित रखने के लिये ज़रूरी हैं।"

तिवारी हमें कई गाँवों में ले गये जहां नौलों के पास ही हैंडपम्प बने दिखे। ज़्यादातर नौले सूखे थे और हैंडपम्पों में भी पानी बहुत कम था। वह कहते हैं कि पानी की सप्लाई का सही तरीका है नदियों से पाइपलाइन बिछाना न कि भू-जल का शोषण। तिवारी ने हमें एक नाला दिखाया जो सूख चुका था।

"इसे दोसाध का गधेरा कहा जाता है। 25 साल पहले जब हम छोटे थे तो बरसात के दिनों में इसमें इतना पानी होता कि इसे पार कर पाना मुश्किल था। ऐसे गधेरे नदियों के जीवन और भू-जल संरक्षण के लिये ज़रूरी हैं लेकिन हैंडपम्प इन्हें सुखा रहे हैं," तिवारी कहते हैं।

दोषपूर्ण जल योजनाएं, हैंडपंपों का उपयोग कई गुना बढ़ गया है और इसने पहाड़ियों में भूजल को सूखा दिया है। फोटो: हृदयेश जोशी

उधर हिमालय के पर्यावरण के जानकार डॉ. शेखर पाठक कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के नज़रिये को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिये। लंबे वक्त तक बारिश न होना और फिर थोड़े से वक्त में मूसलाधार बरसात का कहर यह अब लगातार होने लगा है। डॉ. पाठक कहते हैं कि हिमालय के ऊंचे इलाकों में जहां ग्लेशियर हैं वहां तो ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों का अध्ययन हुआ है और यह ग्लोशियरों के पिघलने के रूप में दिखता है लेकिन जिस क्षेत्र में जल स्रोतों से आने वाली नदियां बहती हैं वहां जलवायु परिवर्तन का असर अलग है।

डॉ. पाठक कहते हैं,"पिछले 30-40 सालों में मौसम बिल्कुल बदल गया है। कहीं भी यह प्राकृतिक नहीं लगता। या तो बहुत पानी बरस रहा है या फिर सूखा पड़ जाता है। वृहद हिमालयी क्षेत्र में कई बार सितम्बर से लेकर अगली जून तक पानी बिल्कुल ही नहीं बरसता और न बर्फ गिरती है।"

लोगों की ताकत और कोशिश

वर्ष 1960 और 1970 के दशक में पहाड़ के लोगों ने जंगलों को बचाने के लिये कई वन आंदोलन किये। चिपको आन्दोलन के बारे में कौन नहीं जानता जिसमें महिलाओं की काफी सक्रिय भूमिका रही। आज जब जलस्रोतों से आने वाली नदियां खत्म हो रही हैं तो एक बार फिर से महिलायें अहम रोल में हैं।

बग्वालीपोखर के पास हम दो किलोमीटर लम्बा पैदल रास्ता पहाड़ पर चढ़कर थामण गाँव पहुंचते हैं। यहां महिलाओं ने जंगलों की नमी और भूजल को जागृत करने का बीड़ा उठा लिया है।

अल्मोड़ा जिले के थम्मन गाँव की महिलाओं ने बड़ी संख्या में पेड़ लगाने और खाइयाँ बनाने के लिए एक साथ काम किया है जिससे उन्हें मृत कुओं को पुनर्जीवित करने और पानी की समस्या को हल करने में मदद मिली है। फोटो: हृदयेश जोशी

महिला मंगल दल की हेमा देवी कहती हैं, "हमने यहां करीब 800 पेड़ लगाये हैं। जिनमें बांज, बुरांश, आंवला और तुलसी के पेड़ लगाये जिनसे पानी का स्तर सुधरता है। चाल-खाल बनाकर बरसात का पानी भी इकट्ठा किया। धीरे-धीरे हालात सुधर रहे हैं।"

जंगल का कायाकल्प करने के लिए ग्रामीणों के साथ कड़ी मेहनत करने के बाद, मनोज पांडे ने हमें अपने गाँव पनेरगाँव में पुनर्जीवित जलधारा दिखाई। फोटो: हृदयेश जोशी

धीरे-धीरे ही सही पर हालात सुधर रहे हैं। नौला फाउंडेशन जैसी कोशिशें रंग ला रही हैं। 52 साल के मनोज पांडे हमें धनखल और पनेरगाँव में लगाये पेड़ दिखाते हैं। उनकी कई साल की मेहनत रंग लाई है और अब पानी का स्तर सुधरा है।

"मैंने 1998 में यहां पेड़ लगाना शुरू किया। तब यह ज़मीन बंजर हो चुकी थी। लोग मुझसे कहते थे कि यहां कुछ हो नहीं सकता। अपना वक्त बर्बाद मत करो लेकिन मैंने जंगल को पुनर्जीवित करने की ठानी। आप बदलाव देख सकते हैं," मनोज पांडे कहते हैं।

(पहली बार यह रिपोर्ट इंडिया क्लाइमेटडायलॉग में प्रकाशित हुई। यह उस रिपोर्ट का संपादित रूप है)

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