जब मंटो ने शुरू किया था ड्रामेटिक क्लब, पिता ने तोड़-फोड़ दिए थे हारमोनियम और तबले

जब मंटो ने शुरू किया था ड्रामेटिक क्लब, पिता ने तोड़-फोड़ दिए थे हारमोनियम और तबलेसआदत हसन मंटो

सआदत हसन मंटो की गिनती ऐसे साहित्यकारों में की जाती है जिनकी कलम ने अपने वक़्त से आगे की ऐसी रचनाएं लिख डालीं जिनकी गहराई को समझने की दुनिया आज भी कोशिश कर रही है। उनके पिता ग़ुलाम हसन नामी बैरिस्टर और सेशन जज थे। उनकी माता का नाम सरदार बेगम था, और मंटो उन्हें बीबीजान कहते थे।

एक बार मंटो ने अपने तीन-चार दोस्तों के साथ मिलकर एक ड्रामेटिक क्लब की शुरुआत की थी और आग़ा हश्र का एक नाटक प्रस्तुत करने का इरादा किया था। लेकिन यह क्लब सिर्फ 15-20 दिन ही चल सका क्योंकि मंटो के पिता ने एक दिन हारमोनियम और तबले सब तोड़-फोड़ दिए थे और कह दिया था, कि ऐसे वाहियात काम उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं।

जलियांवाला बाग की घटना से निकली मंटो की पहली कहानी 'तमाशा'

सआदत हसन के क्रांतिकारी दिमाग़ और अतिसंवेदनशील हृदय ने उन्हें मंटो बना दिया और तब जलियांवाला बाग की घटना से निकल कर कहानी 'तमाशा' आई। यह मंटो की पहली कहानी थी। क्रांतिकारी गतिविधियां बराबर चल रही थीं और गली-गली में 'इंक़लाब ज़िदाबाद' के नारे सुनाई पड़ते थे। दूसरे नौजवानों की तरह मंटो भी चाहते थे कि जुलूसों और जलसों में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले और नारे लगाए, लेकिन पिता की सख़्ती के सामने वह मन मसोसकर रह जाते। आख़िरकार उनका यह रुझान अदब से मुख़ातिब हो गया। उन्होंने पहली रचना लिखी “तमाशा”, जिसमें जलियांवाला नरसंहार को एक सात साल के बच्चे की नज़र से देखा गया है। इसके बाद कुछ और रचनाएँ भी उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के असर में लिखी।

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1932 में मंटो के पिता का देहांत हो गया। भगत सिंह को उससे पहले फाँसी दी जा चुकी थी। मंटो ने अपने कमरे में पिता के फ़ोटो के नीचे भगत सिंह की मूर्ति रखी और कमरे के बाहर एक तख़्ती पर लिखा-“लाल कमरा।”

मंटो के 19 साल के साहित्यिक जीवन से 230 कहानियां, 67 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेख मिले। तमाम ज़िल्लतें और परेशानियां उठाने के बाद 18 जनवरी, 1955 में मंटो ने अपने उन्हीं तेवरों के साथ, इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

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