छोटी नदियां, बड़ी कहानियां, छिंदवाड़ा की लाइफ लाइन कुलबहरा नदी 

छोटी नदियां, बड़ी कहानियां, छिंदवाड़ा की लाइफ लाइन कुलबहरा नदी छोटी नदियों की कहानियां

अमिताभ अरुण दुबे

लखनऊ। ‘छोटी नदियों की अहमियत को कम आंकनें की भूल ‘नदी संरक्षण’ की तमाम कोशिश को पीछे कर सकती है। ‘कुलबेहरा की कहानी’ इस बात पर मुहर लगाती है। हमें हमारे परिवेश में मौजूद छोटी नदियों के प्रति अपना नज़रिया बदलना होगा। बड़ी नदियों की तरह इन्हें भी बड़ा मानना होगा। मध्यप्रदेश में देश की सबसे ज्यादा नदियां बहती है। लेकिन अफ़सोस मध्यप्रदेश में ‘नदी संरक्षण’ की बात केवल ‘नर्मदा’ तक ही सीमित है। छोटी नदियों को बचाने की कोई गंभीर कोशिश दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। हालांकि कभी कभार छोटी नदियों को बचाने के अभियान स्थानीय स्तर पर चलाये तो जाते हैं। लेकिन वो मौसमी खुमार से ज्यादा कुछ नहीं होते। दरअसल, स्वच्छता के संकल्प को नदियों की सफाई से जोड़ने की ज़रूरत भी है। छोटी नदियां, बड़ी कहानियां’ सीरीज़ की इस कड़ी में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले की कुलबहरा नदी की कहानी का पहला भाग।

कुलबहरा छिंदवाड़ा की लाइफ लाइन कहलाती है। हालांकि खुद इसकी ज़िंदगी ख़तरे में है। कुलबहरा पर्यावरण के बड़े सवालों से जूझती भी नज़र आती है। देखा जाए तो बीते दशकों में कुलबहरा उन सभी बातों का शिकार बनी। जिनसे किसी भी नदी का वज़ूद ख़तरें में पड़ता है। अवैध रेत खनन, इसकी सहायक नदी बोदरी (शहर के लोगों ने बोदरी को अब गंदा नाला बना दिया है) के जरिये शहर की गंदगी का इसमें मिलना, इसके किनारे बसे लोगों का असंवेदी रवैया कुलबहरा पर कहर ढा रहा है। लेकिन इस सबके बावज़ूद कराहते हुए ही सही कुलबहरा बहती है। पेंच कन्हान जैसी बड़ी नदियों को ताक़त भी देती है।

अवैध रेत खनन से कुलबहरा की गहराई बढ़ गई है। नतीज़तन बीते तीन दशकों से नदी के सहारे पेट पालने वालों की रोज़ी रोटी तक छिन गई। पानी गंदा हुआ तो,पनघट पर सुनाई देने वाले लोकगीत भी थम गए। दरअसल, बीते डेढ़ दशक में मध्यप्रदेश में अवैध रेत खनन सियासी मुद्दा तो बन गया है। लेकिन जैसे राज्य में इसे पर्यावरण से जुड़ी गंभीर समस्या माना ही नहीं जा रहा है। अवैध रेत खनन से नदी पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे नतीज़ों को लेकर आम जनता में भी जागरूकता नहीं दिखती।

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उमरेठ से उद्गम

दक्षिण-पूर्व ,दक्षिण और पूर्व दिशा में बहने वाली कुलबहरा ज़िले के उमरेठ से निकलती है और ज़िले के चांद में पेंच नदी से मिल जाती है। करीब 80 किलोमीटर लंबी ये नदी पेंच में मिलकर ये आगे की यात्रा तय करती है। आगे जाकरपेंच नदी कन्हान में मिल जाती है। कुलबहरा के किनारे बसे ज्यादातर गांव कृषि प्रधान हैं। कुलबहरा को पवित्र नदी माना जाता है। क्योंकि इसके तट पर कई गांवों में मंदिर और मठ हैं। ज़िले के ज्यादातर लोग दाह संस्कार के बाद लिंगा में खारी(राख) का विसर्जन भी कुलबहरा में करते हैं।

नदी के किनारे इकट्ठा गंदगी।

यही नहीं किसी वक़्त ज़िले में मशहूर रहा कालीरात का मेला भी कुलबहरा के तट पर लगता है। इसके तट पर कभी सागौन के बहुत ज्यादा पेड़ थे।

शहरीकरण का सितम झेलता सर्रा

शहर से नज़दीकी ‘नदी और गांव’ की सेहत के लियेहानिकारक भी हो सकती है। कुलबहरा और सर्रा गांव इसकी तस्दीक करते है। सर्रा मेंछिंदवाड़ा-नागपुर स्टेट हाइवे पर कुलबहरा का एक बड़ा पुल है। कुलबहरा यहां प्रदूषण की सबसे ज्यादा शिकार नज़र आती है। हाइवे पर आने जाने वाली ट्रक बड़ी गाड़ियों की धुलाई से लेकर, शहर की गंदगी के निशान यहां देखे जा सकते हैं। सर्रा में पहले ग्राम पंचायत थी। लेकिन करीब तीन साल पहले जब छिंदवाड़ा नगर निगम बना। तो गांव शहरी क्षेत्र में शामिल हो गया। सर्रा अब वार्ड नंबर 35 कहलाता है। शहर से करीब होने के वजह से यहां बड़ी कार कंपनियों के शो रूम्स, सर्विस सेंटर, होटल्सबार खुल गये हैं। नये मकान तेज़ी से बन रहे हैं और धीरे-धीरे इसकी ग्रामीण पहचान अब खोती जा रही है। जबकि कुछ अर्सा पहले तक चंदनगांव पावर हाउस से सर्रा तक रोड के आसपास खेत खलिहान नज़र आते थे।

नदी किनारे रहने वाले परिवार का दर्द

कुलबहरा पुल से होते हुए नागपुर से छिंदवाड़ा जाने पर रिवारे परिवार का घर सर्रा का सबसे पहला मकान है। ये मकान नदी के सबसे नज़दीक है। इसकी सबसे बुजुर्ग सदस्य सुशीला रिवारे बताती हैं “जाति से ढीमर(मछुआरा) होने की वजह से उनके परिवार का कुलबहरा नदी से हमेशा गहरा नाता रहा। उनके पूर्वज कुलबहरा की मछली पकड़ कर, या कभी तरबूज-खरबूज की बाड़ी (जिसे स्थानीय भाषा में डंगरवाड़ी भी कहते हैं) लगाकर गुज़र बसर चलाते थे।”उनके दादा ससुर ने करीब चार दशकपहले नदी के पास राम मंदिर भी बनवाया। रामनवमीं दशहरा पर इसमें विशेष आयोजन होते हैं। रिवारे परिवार ही इस मंदिर की देखरेख करता है।

सुशीला कहती हैं कि “सर्रा गांव में ज्यादातर लोग उनकी बिरादरी के हैं। करीब 20 साल पहले तक बाक़ी लोग भी डंगरवाड़ी, मछली पकड़ कर जीवनयापन करते थे। लेकिन अवैध रेत खनन और ख़ास तौर पर सर्रा में नदी में बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों का ये काम अब बंद हो गया। आजकल ज्यादातर लोग ईंट-भट्टे, खेतों में मज़दूरी करने जाते हैं। गाय-भैंस पालकर रोटी रोजी चलाते हैं। बारिश के मौसम में कभी-कभार मछली पकड़ कर बेंचते हैं। लेकिन नदी में गंदगी के कारण मछलियां मुश्किल से ही मिल पाती है।”

नदी के किनारे रहने वाला रिवारे परिवार।

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सुशीला के पास कुलबहरा की कई कहानियां हैं। वो बताती है कि इसके तरबूज-खरबूज दूर दूर तक मशहूर थे। उनका स्वाद भी बहुत अच्छा होता था। गांव के लोग नदी से पीने और रोजमर्रा की ज़रूरत का पानी लेकर आते थे। नदी के तट पर अखाड़ी जैसे तीज-त्योहार मनाये जाते थे। हालांकि आज भी तीज त्योहार के मौके पर शहर के लोग यहां आते हैं। और नदी में पूजापाठ की सामग्री, मूर्तियां विसर्जन करके जाते हैं।

घर में शौचालय लेकिन नदी किनारे शौच

रिवारे परिवार की बहू सपना रिवारे के मुताबिक केवल शहर के लोग ही नहीं, सर्रा गांव के लोग भी कुलबहरा में गंदगी में बराबर के भागीदार हैं। सपना कहती हैं, “सर्रा में सभी के घरों में शौचालय बन गये हैं। लेकिन गांव के ज्यादातर पुरूष घर में शौच के लिये नहीं जाते। वो सब सुबह-शाम नदी के किनारे गंदगी करने आ जाते हैं। उनका घर नदी के सबसे पास है। इसलिए उनके परिवार के लोगों को इससे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है।” सपना के पति अजय रिवारे बताते हैं, “बार-बार शिकायत करने पर लोगों पर असर नहीं पड़ता। सड़क से गुज़रने वाली बड़ी गाड़ियों के चालक भी शौच कर नदी के आस-पास गंदगी फैलाते हैं।” अजय का कहना है कि कुलबहरा की सफाई की कोशिश भी हुई। लेकिन सफाई की बात अभियान जब तक चला तब तक ही रही। उसके बाद कुलबहरा के हालात पहले जैसे हो गये।

सर्रा में हर सिद्धि देवी का मंदिर

राम मंदिर से छिंदवाड़ा की ओर आगे बढ़ने पर हर सिद्धि देवी और हनुमान जी के मंदिर है।ये मंदिर कुलबहरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 1956-57 में स्वामी गणेशानंद फलाहारी ने इन मंदिरों और मठ की स्थापना की थी। स्वामी गणेशानंद का कुलबहरा नदी से गहराजुड़ाव था। वो इसके जल से ही त्रिकाल संध्या और साधना करते थे। मठ में स्वामी जी के सबसे पुराने सेवक महादेवराव फलाहारी भी कुलबहरा के सुनहरे दौर की बातें कहते हैं। वहीं इस मंदिर के मुख्य कर्ताधर्ता प्रेमानंद ब्रह्मचारी बताते हैं कि “राजनीतिक संरक्षण के चलते रेत और भू माफियाओं के हौसले बुलंद होते रहे। अवैध रेत खनन के कारण कुलबहरा का नैसर्गिक सौंदर्य, पानी की गुणवत्ता सब बर्बाद हो गई।” प्रेमानंद ब्रह्मचारी कहते हैं नदी मानव को पानी देती है। लेकिन मानव उसे गंदगी देता है। वो बताते हैं कि नर्मदा मिशन से जुड़े संत भैयाजी सरकार ने कुलबहरा के धार्मिक महत्व को देखते हुये इसे ‘कुलधारा’ कहा है।

आखिर मध्यप्रदेश में राजनीतिक मुद्दा बन चुका अवैध रेत खनन, पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा क्यों नहीं बन पा रहा है। और कालीरात के रात के मेले की चमक क्यों फ़ीकी पड़ गई।‘कुलबहरा की कहानी’ की अगली कड़ी में हम इसकी पड़ताल करेंगे। पढ़ते रहिये हमारी स्पेशल सीरीज़ ‘छोटी नदियां बड़ी कहानियां’।

हनुमान मंदिर।

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