नहाने में इतना पानी बर्बाद न करिए कि कल हाथ धोने को भी न मिले

नहाने में इतना पानी बर्बाद न करिए कि कल हाथ धोने को भी न मिलेशहरों की 30 पर्सेंट और गांवों की 70 पर्सेंट पानी की जरूरतें भूमिगत जल से ही पूरी होती हैं

आप बरसों से सुनते आ रहे होंगे कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। आपने गलत सुना था, पानी के लिए होने वाली यह जंग कबकी शुरू हो चुकी है। भारत के 29 में से 11 राज्य सूखाग्रस्त हैं, हर साल महोबा, लातूर, टीकमगढ़, भोपाल, जैसे शहरों, इलाकों से खबरें आती हैं कि प्यासी भीड़ ने पानी के टैंकर पर हमला करके पानी लूट लिया। यहां तक की देश की राजधानी दिल्ली और साबइर सिटी गुरुग्राम से भी पानी के त्राहिमाम वाली ख़बरें लगातार चलती हैं।

दुनिया के नक्शे पर नजर डालें तो पता चलेगा कि पाकिस्तान, ईरान, चीन, अफगानिस्तान, इथोपिया, इरीट्रिया, सोमालिया, सूडान, यूगांडा, मोरक्को, केन्या, कोलंबिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, फिलिपींस, थाइलैंड, साउथ अफ्रीका, यमन, लीबिया, जॉर्डन, जिबूती जैसे तमाम देश हैं जो सूखे के भयानक संकट से गुजर रहे हैं। इनमें पिछले कुछ बरसों से लगातार ऐसा सूखा पड़ रहा है जैसा पिछले 80 बरसों में नहीं पड़ा था।

इसके अलावा यूरोप और अमेरिका के कई इलाकों में भी सूखे की मार पड़ती रहती है। दिलचस्प बात यह है कि सूखाग्रस्त ब्राजील, भारत और चीन दुनिया के ऐसे टॉप 10 देशों में शामिल हैं जिनमें ताजे पानी के सबसे बड़े भंडार हैं। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में पानी के प्रति हमारे नजरिए में कुछ गड़बड़ है।

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केपटाउन की कयामत की घड़ी

अभी सर्दी पूरी तरह से विदा नहीं हुई है लेकिन पानी की कमी दुनिया भर में सताने लगी है। जनवरी के आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात के सरदार सरोवर बांध के जल स्तर में रिकॉर्ड गिरावट आई है। इसमें पूरी क्षमता का महज एक तिहाई पानी रह गया है। यह जानकारी भी गुजरात के उप मुख्यमंत्री ने एक सवाल के जवाब में दी। पिछली सर्दियों में एक और जुमला चर्चा में आया डे जीरो। यानि ऐसा दिन जब नल की टोंटियां सूख जाएंगी। मतलब एक तरह की कयामत का दिन। साउथ अफ्रीका का एक शहर है केपटाउन। यह शहर अपने हरे-भरे बागों, स्विमिंग पूल और वॉटर पार्कों के लिए दुनिया भर में मशहूर रहा है। दुनिया भर से ढेरों पर्यटक हर साल यहां खिंचे चले आते हैं। 2014 में यहां भयानक सूखा पड़ा जो तीन वर्षों तक चला। उस समय इसके छह बांध ऊपर तक भरे हुए थे। आज हालात ये हैं कि पानी का भंडार महज 26 फीसदी रह गया है। ऐसे खतरनाक हालात देखते हुए शहर के प्रशासन ने फैसला लिया कि जब जल भंडार 13.5 पर्सेंट रह जाएगा तो शहर में पानी की सप्लाई बंद कर दी जाएगी। यही दिन डे जीरो कहलाएगा।

केपटाउन में पानी की कटौती के बाद लोग प्राकृतिक स्रोतों के पास लाइन लगाकर पानी भर रहे हैं

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क्या होगा डे जीरो के बाद

डे जीरो का ऐलान होते ही 40 लाख केपटाउन वासियों को शहर के 200 इमरजेंसी पानी के नलकों के सामने लाइन लगा कर पानी भरना होगा। एक नलके से 20 हजार लोग पानी भरेंगे। हर शख्स को दिन भर के लिए सिर्फ 25 लीटर पानी मिलेगा।नहाने के लिए फव्वारे के नीचे खड़ा हुआ जाए तो चार मिनट में 25 लीटर पानी बह जाता है। पानी भरते समय मार-पीट, भगदड़, और पानी की चोरी जैसी घटनाओं को रोकने के लिए हथियारबंद गार्ड लगाए जाएंगे। ऐसा तबतक होगा जबतक हालात सुधर नहीं जाते।

केपटाउन की जनता ने पानी के इस्तेमाल में कटौती करनी शुरू की। इसके अच्छे नतीजे आए, पहले डे जीरो की तारीख 12 फिर 16 अप्रैल तय की गई बाद में यह खिसककर 27 अगस्त हो गई। हाल ही में प्रशासन ने ऐलान किया है कि अगर इस साल समय पर बारिश हो गई तो डे जीरो अगले साल तक के लिए टाला जा सकता है। तब तक लोगों को रोजाना 50 लीटर पानी दिया जा रहा है। इसी पानी में केपटाउन के नागरिक नहाते हैं, टॉयलेट जाते हैं, हाथ-मुंह धोते हैं, ब्रश करते हैं, बर्तन धोते हैं, खाना बनाते हैं, खुद पानी पीते हैं और पालतू जानवरों को पानी देते हैं।

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साओ पाउलो का सूखा

2014-15 में ब्राजील के शहर साओ पाउलो के 1 करोड़ 20 लाख निवासियों के सिर पर भी डे जीरो का काला साया मंडराने लगा था। जिस बांध से पानी सप्लाई होता था उसमें पानी का स्तर इतना ज्यादा गिर गया कि घरों में कीचड़ आने लगा, इमरजेंसी वॉटर सप्लाई के टैंकर लूटे जाने लगे, किसी तरह घरों में एक हफ्ते में दो बार महज कुछ घंटों के लिए पानी की सप्लाई चालू की गई। शहर के पास केवल 20 दिनों का पानी बचा था कि चमत्कार हुआ और बारिश होने लगी। यह सब तब हुआ जब ब्राजील में पीने योग्य ताजा पानी दुनिया में सबसे ज्यादा है, यानि दुनिया भर में कुल ताजे पानी का 12-16 फीसदी।

2014-15 में साओ पाउलो के पास केवल 20 दिनों का पानी बचा था

रोम में पानी की त्राहि-त्राहि

सितंबर 2017 में रोम के स्थानीय प्रशासन ने शहर में पानी की राशनिंग करने का ऐलान कर दिया। इटली भी सूखे की चपेट में है, पिछले तीन साल में यहां बारिश में 70 फीसदी की कमी आई है। इस हालात को और खराब किया पानी की सप्लाई करने वाले पाइपों में होने वाली बेतहाशा लीकेज ने। शहर को सप्लाई होने वाले पानी का 40 फीसदी इसी वजह से बर्बाद हो जाता था। लीकेज को काफी हद तक सही कर लिया गया है साथ ही रोम के निवासियों को पानी में कटौती के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

2017 में रोम के स्थानीय प्रशासन ने शहर में पानी की राशनिंग करने का ऐलान कर दिया था

भारत के लिए डे जीरो नया नहीं

भारत के लिए डे जीरो कोई नई बात नहीं है। बस फर्क इतना ही है कि इसकी चर्चा केपटाउन की तरह जोर-शोर से नहीं होती। यहां लगभग हर गर्मियों में देश के किसी न किसी हिस्से में पानी की कटौती होती है, पानी ट्रेन, टैंकरों और दूसरे साधनों से हफ्ते के गिनेचुने दिनों में पहुंचाया जाता है, पानी के लिए मारपीट-फौजदारी तक होती है। देश के कुछ इलाके इससे भी ज्यादा बदनसीब हैं जिनकी चर्चा तक नहीं होती, यहां कोई पानी पहुंचाने नहीं आता। लोग और उनके जानवर गड्ढों, तालाबों का गंदा पानी पीने को मजबूर होते हैं, बीमार होते हैं, मरते हैं। जो जिंदा बचते हैं वे कहीं दूर… जहां पीने भर का पानी मिले वहां जाकर मजदूरी करने लगते हैं। इस दौरान केंद्र व राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन दूसरी और ज्यादा गंभीर समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त रहते हैं। जिन शहरों की दहलीज के पास ये सूखा-पीड़ित इलाके होते हैं उनमें रहने वाला मध्यम वर्ग अक्सर इससे अनजान होता है, उसे तभी तकलीफ होती है जब उसके आरओ में पानी की सप्लाई बंद हो जाती है।

केपटाउन, साओ पाउलो और रोम में जिन वजहों से पानी का अकाल पड़ा भारत में उन वजहों के साथ ढेरों दूसरी वजहें भी हैं। केपटाउन में सूखे के लिए बढ़ती जनसंख्या का दबाव जिम्मेदार था, साओ पाउलो में जंगलों की अंधाधुंध कटाई से धीरे-धीरे बारिश कम होती गई और उसके पानी के भंडार सूखते गए, जो बचे थे उनमें शहरों की गंदगी मिलती गई और वे किसी लायक नहीं बचे। रोम में पानी की सप्लाई करने वाली पाइपलाइनों में भारी लीकेज प्रमुख वजह थी।

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इन तीनों जगहों में जो आम कारण था वह था लगातार कई बरसों से बारिश का ना होना। भारत में भी यही कारण हैं साथ में बड़ी वजह है पानी की बर्बादी के बारे में जागरूकता की कमी। यह वजह दूसरी ढेरों वजहों को जन्म देती है जैसे, पानी के उपयोग पर कोई नियंत्रण न होना, सिंचाई के लिए जमीन के नीचे मौजूद सीमित पानी के भंडारों का अंधाधुंध दोहन, वर्षाजल को बचाने के लिए कोई ठोस उपाय न होना, नदी थालों में रेत का अवैध खनन, नदी के किनारों को सीमेंट से पक्के बना देना, नदी की राह में बस्तियां बसाना वगैरह वगैरह।

भारत में ऐसे ढेरों शहर और कस्बे हैं जहां पानी के टैंकर प्यास बुझाने का एकमात्र जरिया हैं

भारत में पानी का जल संकट

आइए भारत के जल की उपलब्धता के बारे में कुछ मूल तथ्यों को जान लें

- भारत में 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5200 क्यूबिक मीटर थी जो 59 साल बाद 2010 में घटकर 1588 क्यूबिक मीटर रह गई। अंदाजा है कि यह 2025 में घटकर 1401 और 2050 में 1191 क्यूबिक मीटर रह जाएगी

- अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से जिस देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1700 क्यूबिक मीटर से कम हो उन देशों को जल संकटग्रस्त देशों का दर्जा दिया गया है। जब यह उपलब्धता 1000 क्यूबिक मीटर से कम हो जाएगी तो इस स्थिति में माना जाएगा कि संबंधित देश में पानी दुर्लभ हो चुका है। इस हिसाब से भारत जल संकटग्रस्त देश है। अगर भारतीय जनता नहीं संभली तो वह दिन दूर नहीं जब हम जल दुर्लभ देशों की सूची में शामिल हो जाएं।

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- शहरों की 30 पर्सेंट और गांवों की 70 पर्सेंट पानी की जरूरतें भूमिगत जल से ही पूरी होती हैं।

- विश्व बैंक की 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूमिगत जल का इस्तेमाल करता है। हर साल भारत की भूमिगत जल की खपत 230 क्यूबिक किलोमीटर है जो पूरी दुनिया की खपत का एक चौथाई है। विश्व बैंक ने आगाह किया है कि अगर इसी रफ्तार से भारत अपने भूमिगत जल का दोहन करता रहा तो 2032 तक भारत अपने भूमिगत जल का 60 फीसदी भंडार खत्म कर देगा।

- अंत में यह बताना बेहद जरूरी है कि आम धारणा के विपरीत ताजे पानी के भूमिगत भंडार पूरी तरह खत्म हो सकते हैं। उनके फिर से भरने की स्वाभाविक प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि उसमें लाखों साल लग जाएंगे।

नोट- आंकड़े भारत सरकार, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों से लिए गए हैं

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