अजंता एलोरा के मूर्तिकारों के वंशज मजदूरी करने को मजबूर

अजंता एलोरा के मूर्तिकारों के वंशज मजदूरी करने को मजबूरइन मूर्तियों को गढ़ते हैं कृष्णपाल और उनके परिजन।

विकास यादव, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

मेरठ। जिन मूर्तिकारों ने कभी अजंता एलोरा की ऐतिहासिक मूर्तियों को बनाया था, उन्हीं मूर्तिकारों के वंशज आज मजदूरी करने को मजबूर हैं।

मेरठ जिले में करीब 40 परिवार ऐसे हैं जो मूर्ति बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं। बाजार में चायनीज मूर्तियों के आ जाने से इनके सामने रोजी-रोजी की समस्या खड़ी हो गई है। पूरा मार्केट चायनीज मूर्तियों से पटा पड़ा है। चायनीज मूर्तियों का दाम कम होता है, इसलिए लोग इन्हें ज्यादा खरीदना पसंद करते हैं।

चाइनीज़ मूर्तियों की चमक को देख लोग अपनी प्राचीन कला से मुंह फेर रहे हैं। चाईना से आयीं मूर्ति सस्ते दामों में ही मिल जाती हैं, इसलिए लोग यहां की मूर्ति नहीं खरीदना पसंद नहीं करते हैं। कृष्ण पाल (40 वर्ष) जिनके जिनके पिता ने 60 साल पहले मेरठ में अजंता कला का प्रचलन किया। उन्होंने इस कला का प्रचलन करने के बाद अनेकों गरीबों को रोजगार दिया, लेकिन आज उनके परिवार के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई है।

पत्थर को तराशता मूर्तिकार।

कृष्ण पाल बताते हैं, "अजंता-एलोरा और ख़ज़ुराहो की कला को आज भी हमने जीवित राखा है। विदेशी लोगों को यहां की मूर्तियों काफी पसंद हैं। वे हमारे यहां से मूर्ति खरीदकर ले जाते हैं, जिससे भारत सरकार के खजाने में राजस्व आता है। बावजूद इसके भारत सरकार हमसे सैातेला व्यवहार कर रही है। हम अपना काम भी उधार की जमीन पर ही करने को मज़बूर है।

रोड के सहारे कोई अपनी कला कैसे निखार सकती है। कला के लिए तो एकांत की जरुरत होती है। लेकिन क्या करें हमारे सामने मजबूरियां बहुत हैं। हमारे आधे से काम कर्ज ले कर ही होते हैं।

कृष्ण पाल आगे कहते हैं, "हमने अपने पास 15 कलाकार लगाये हुए हैं, लेकिन किसी का भी पैसे हम टाइम पर नहीं दे पाते, क्योंकि हम जो मुर्तियां बना कर बहार भेजते हैं वो बिक ही नहीं पाती। बिकती भी हैं तो हमारे पास इतना पैसा भी नहीं आता की हम अपने कलाकारों की मेहनताना भी दे पाएं। कलाकारों को मजबूरी में मजदूरी भी करनी पड़ती है, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।"

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