सिहद्दा का नाम सुना है क्या, आखिर क्यों गांव-गांव खाक छान रहे अधिकारी

सिहद्दा का नाम सुना है क्या, आखिर क्यों गांव-गांव खाक छान रहे अधिकारीसिहद्दा पत्थर।

उत्तर प्रदेश में आजकल राजस्व विभाग के अधिकारी गांव-गांव में सिहदा पत्थर ढूंढ रहे हैं। कई जगह तो अधिकारियों को ये पत्थर ढूंढे भी नहीं मिल रहे हैं।

असल में ढाई से तीन फीट लंबे भारीभरकम चौकोरनुमा इन सिहद्दा पत्थरों को उत्तर प्रदेश में चकबंदी के दौरान उन स्थानों पर स्थापित किया गया था, जहां तीन गांवों की सीमाएं मिलती हैं। इन सिहद्दा पत्थरों से गांवों की सीमाएं निर्धारित होती हैं और ये पत्थर जमीनों की नपाई के लिए आधार बिंदु होते हैं। ऐसे में किसी ग्राम पंचायत के चारों तरफ जुड़ने वाले तीन-तीन गांवों की हदों पर ये पत्थर स्थापित किए गए थे। इनके बिना जमींन की पैमाइश कर पाना संभव नही है।

ऐसी स्थिति में गांवों में जमीनों को लेकर विवाद पैदा होने शुरू हो गए। जैसे-जैसे शहर बढ़ता गया, जमीनों की कीमतें भी बढ़ती गई। भूमाफिया और प्रॉपर्टी डीलरों ने जमीन हड़पने के लिए इन सिहद्दा पत्थरों को गायब कराना शुरू कर दिया। ऐसे में गाँवों में लोगों के बीच सीमा विवाद लगातार बढ़ता चला गया।

इस पत्थर के बिना जमीनों की पैमाइश न हो पाने के चलते कुतुबुन्निशा नाम की महिला ने हाई कोर्ट ने इस सन्दर्भ में एक जनहित याचिका दायर की थी। यह मुकदमा कुतुबुन्निशा बनाम राजशेखर जिलाधिकारी लखनऊ के मध्य चला, जिसमें हाई कोर्ट लखनऊ पीठ ने अक्टूबर 2017 में उत्तर प्रदेश के सभी ग्राम पंचायतों में राजस्व गांवों में सीमा स्तंभ के पुन: स्थापना करने के निर्देश सरकार को दिए।

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इसके बाद आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद् ने 10 अक्टूबर 2017 को प्रदेश के समस्त मंडलायुक्त और जिलाधिकारियों शासनादेश जारी कर गांवों में सीमा स्तम्भों की कोडिंग, भौतिक सत्यापन, कोडिंग पुनर्स्थापना सम्बन्धी कार्य जल्द से जल्द कराए जाने के निर्देश दिए।

इस बारे में लखनऊ जिले की बीकेटी तहसील के गड़रिया पुरवा निवासी ख़ुशी राम ‘गाँव कनेक्शन’ से बताते हैं, “हमने तीन बरस पहले तहसील में जमींन के नपाई की अर्जी दी थी, उस समय लेखपाल छोटेलाल रावत ने रिपोर्ट में यह लिखकर भेज दिया था कि जमींन के आस-पास कालोनिया बस चुकी हैं, कोई पहचान का चिन्ह नहीं बचा, ऐसे में नपाई नहीं हो सकती।“

उस दौरान बीकेटी के एसडीएम सीएल मिश्रा ने लेखपाल को आदेश देकर अन्य सिहद्दा से आधार लेकर नपाई कराई थी। खुशी राम आगे बताते हैं, “जैसे-जैसे लखनऊ बढ़ता गया, बाहर से आए प्रॉपर्टी डीलरों ने जानबूझकर सिहद्दा गायब करा दिए और ये काम स्थानीय राजस्वकर्मियों की मिलीभगत से हुआ, जिन गावों के आस-पास कालोनिया बस गई हैं, वहा सिहद्दा खोज पाना अब लेखपालों के लिए भी आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में गांवों में भूमि विवाद तेजी से बढ़ रहे हैं।“

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दूसरी ओर बीकेटी की ही ग्राम पंचायत जमखनवा के प्रधान सौरभ गुप्ता बताते हैं, “हमारे गांवों की सरहद पर चारों तरफ कहीं सिहद्दा नहीं बचा है, ऐसे में 20 साल से पास की ग्राम पंचायत बगहा से सीमा विवाद चल रहा है। कई बार दोनों पंचायतों के लोग जमीन विवाद को लेकर आमने-सामने हो चुके हैं। अभी हमारे यहां पर चकबंदी चल रही है। इससे पहले चकबंदी को लेकर भी गांव वालों ने सीमा निर्धारण न किए जाने पर विरोध जताया था।

अब हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को गांवों में सीमा निर्धारण के लिए सिहद्दा पत्थरों के चिन्हीकरण और गायब हो चुके पत्थरों को पुन:स्थापित किए जाने के आदेश दिए हैं।

इस बारे में सीतापुर जिलाधिकारी शीतल वर्मा गाँव कनेक्शन से बताती हैं, “शासनादेश के बाद अब तक सीतापुर में सीमा स्तंभों की कोडिंग हो गई और भौतिक सत्यापन भी हो चुका है। इतना ही नहीं, जिन गाँवों में सिहद्दा पत्थर गायब हो गए हैं, उन गांवों में भी सिहद्दा स्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है। इन पत्थरों की पुन:स्थापना के बाद गांवों की सीमांकन की समस्या दूर होगी।“

दूसरी ओर जनपद ललितपुर के जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह बताते हैं, “गांवों में कोडिंग और भौतिक सत्यापन का लगभग पूरा हो चुका है। शेष भी जल्द ही पूरा हो जाएगा।“

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