मैला साफ़ करने वाली ये महिला 80 लाख की मालकिन है, हर महीने 45 हजार रुपए कमाती है 

मैला साफ़ करने वाली ये महिला 80 लाख की मालकिन है, हर महीने 45 हजार रुपए कमाती है आंध्र प्रदेश राज्य की रहने वाली पक्की रम्मा देश में हर किसी के लिए उदाहरण हैं। 

मदर्स डे स्पेशल: सलाम पक्की रम्मा नाम की इस महिला को, जिसनें 20 साल से ज्यादा मैला ढोया है। विपरीत परस्थितियों में इन्होंने अपने बेटे को एमबीए और बेटी को टीचर ट्रेनिंग की शिक्षा पूरी कराई। आप भी पढ़ें इनके संघर्ष की दिलचस्प कहानी...

रांची (झारखण्ड)। बड़ी सी मुस्कान चेहरे पर लिए, सिल्क की साड़ी लपेटे आंध्र प्रदेश के गाँव की जो महिला आपके सामने खड़ी हैं, ये सब्जी और फल बेच कर हर महीने 45,000 रुपए कमाती हैं और इनका बेटा एमबीए है, बेटी टीचिंग की पढ़ाई कर रही है। अपनी मातृभाषा तेलुगु के अलावा इन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भी सीखी, और अब देश और विदेश में जा कर अपनी सफलता की कहानी सुनाती हैं।

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि पक्की रम्मा नाम की ये महिला कभी सर पर मैला ढोती थी? जी हाँ ये सच है, मैला ढोना इनका पुश्तैनी काम था। "लोग दूर से पानी पीने को देते, हम चुल्लू बनाकर उसे पीते थे, हम किसी के घर नहीं जा सकते थे, कोई हमें छूता नहीं था, लोग दुत्कार कर बात करते थे, ये सब सुनकर बहुत बुरा लगता था।" ये बताते हुए पक्की रम्मा (55 वर्ष) के चेहरे पर आज भी उदासी थी। उन्होंने कहा, "जब-जब हमारे साथ भेदभाव और छुआछूत होता, तब-तब मैं यही सोचती थी कि अपने बच्चों को इसका सामना नहीं करने दूंगी। उन्हें अच्छी पढ़ाई कराउंगी, जिससे वो नौकरी कर सकें और सम्मान की जिंदगी जी सकें।"

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झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने आजीविका दिवस पर पक्की रम्मा को सम्मानित किया।

आंध्रप्रदेश की एक साधारण सी ग्रामीण महिला पक्की रम्मा अपने पीढ़ियों से चले आ रहे मैला ढोने का काम करते-करते बड़ी हुई। ससुराल में भी यही काम जीविका चलाने का मुख्य साधन था। पति-पत्नी 23 साल पहले तक दोनों मिलकर दिन के 30 रुपए मैला साफ़ करके कमाते थे। पक्की रम्मा कभी नहीं चाहती थी कि उसके बच्चे बड़े होकर यही काम करें और छुआछूत के शिकार हों। पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले मैला फेकने के अपने पुश्तैनी काम को छोड़ना पक्की रम्मा के लिए इतना आसान नहीं था।

गरीबी में पली बढ़ी पक्की रम्मा की शादी 11 साल की उम्र में हो गयी। पढ़ाई करने के लिए इन्हें स्कूल जाने का कभी मौका नहीं मिला। गरीबी का आलम ये था कि ये अपनी शादी में 40 रुपए की साड़ी पहनकर ससुराल आयीं थीं। दक्षिण भारत की रहने वाली पक्की रम्मा के लिए छुआछूत को खत्म करना और सम्मान से जिन्दगी जीकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना किसी सपने जैसा था। लेकिन इन्होंने अपने बुलंद हौसले से न सिर्फ अपने सपनों को हकीक़त में बदला बल्कि देश की लाखों महिलाओं की प्रेरणाश्रोत भी बनी। स्वयं सहायता समूह में हफ़्ते में 10 रुपए बचत करने वाली पक्की रम्मा ने कभी नहीं सोचा था कि वो समूह से कम ब्याज दर पर 12 लाख रुपए लोन ले पाएंगी और 80 लाख सम्पत्ति की मालकिन बन पाएंगी।

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रांची में आजीविका एवं कौशल विकास मेला में मंच पर अपना अनुभव साझा करती पक्की रम्मा।

पक्की रम्मा मूल रूप से आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर हुसैनापुरम गाँव की रहने वाली हैं। इनके गाँव में इनकी बिरादरी के लगभग 100 घर हैं। देश के कई हिस्सों में अपने सफलता की कहानी साझा करने वाली पक्की रम्मा में अब आत्मविश्वास तो था पर जब वह अपने पुराने दिनों को याद करतीं तो आज भी उनके चेहरे पर एक मायूसी आ जाती, पक्की रम्मा ने कहा, "हम कुछ काम करना चाहते थे जिससे हमारी गरीब दूर हो जाए, पर हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। समूह में जुड़कर 10 रुपए हफ्ते की बचत करना शुरू किया। पहली बार 500 रुपए का सब्जी खरीदकर बेचनें के लिए कर्ज लिया।वो कर्ज लेने का मेरा पहला दिन था, मैंने 23 साल में 12 लाख रुपए समूह से कर्ज लिए और पूरा कर्ज चुकाया।"

हर सप्ताह 10 रुपए बचत करने वाली पक्की रम्मा अब महीने में एक हजार रुपए बचत करती हैं।पक्की रम्मा के लिए ये सब बदलना इतना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने समाज से लड़ाई लड़ी और आज देश की हर महिला के लिए उदाहरण हैं। इन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "आज मैं खुश हूँ कि मेरा बेटा एमबीए की पढ़ाई पूरी कर चुका है और बेटी टीचर ट्रेनिंग कर रही है। मैं और मेरे पति हर रोज सब्जी और फल बेचकर महीनें के 45 हजार रुपए आसानी से कमा लेते हैं।"

देखें वीडियो: पक्की रम्मा बता रहीं अपने संघर्ष की कहानी

देश भर में सरकार द्वारा चलाई जा रही योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का उद्देश्य भी गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को स्वयं सहायता समूहों के लिए प्रोत्साहित करना था। वर्ष 2011-12 के मुताबिक भारत में लगभग 61 लाख स्वयं सहायता समूह है, जिसमें लाखों की संख्या में महिलाएं जुड़ी हैं। जिसमें पक्की रम्मा एक हैं।

गाँव की एक साधारण महिला पक्की रम्मा केवल अपनी मातृभाषा तेलुगु ही जानती थी। स्वयं सहायता समूह से जुड़कर इनकी जिंदगी आख़िर कैसे बदली ये जानने के लिए हर कोई उत्सुक था। एक साल हिन्दी भाषा सीखने के बाद ये बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल, जम्मू जैसी कई जगहों की हजारों महिलाओं को ये सिखाने गईं कि वो भी स्वयं सहायता समूह में जुड़कर छोटी बचत से कैसे अपनी जिंदगी बदल सकती हैं। कुछ समय बाद इनकी चर्चा देश के साथ-साथ विदेशों में भी होने लगी। पक्की रम्मा ने फिर कई महीनें अंग्रेजी भाषा सीखी इसके बाद ये नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश जैसे कई देशों में जाकर महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के फायदे बताए।

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स्वयं सहायता समूह में जुड़ने के बाद बदली इनकी जिंदगी

पक्की रम्मा की जिंदगी में बदलाव की शुरुआत वर्ष 1995 से स्वयं सहायता समूह में जुड़ने के बाद हुई। बचत करने के कुछ दिन बाद पक्की रम्मा ने समूह से पहली बार 500 रुपए कर्ज लिए और सब्जी खरीदकर बेचने गईं। भेदभाव और छुआछूत की मानसिकता वाले समाज को उनसे सब्जी खरीदना मंजूर नहीं था। अगले दिन ये अपने क्षेत्र से दूर दूसरे कस्बे में सब्जी बेचने गईं जहाँ किसी को ये पता नहीं था कि ये किस जाति की हैं और इनका काम क्या है। उस अजनबी कस्बे में जब इनकी पहले दिन सब्जी बिक गयी तो इन्होंने उसी दिन फैसला लिया कि अब कभी मैला ढोने का काम नहीं करेंगी।

पक्की रम्मा बताती हैं, "जितना समूह से कर्ज लेती सब्जी बेचकर हुए मुनाफ़े से उसे वापस कर देती। धीरे-धीरे करके मैंने 12 लाख रुपए कर्ज लिया और पूरा चुका दिया। बच्चों को अच्छी शिक्षा दी, 6 एकड़ जमीन खरीदी, 5 बीघा का प्लाट खरीदा और कच्ची झोपड़ी से पक्का मकान बनवाया।"

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पक्की रम्मा 20 रुपए में रोज छह लोगों का खर्चा चलाती थीं

पक्की रम्मा की ससुराल में जमीन नहीं थी, 23 साल पहले जो इन्हें दिन के 30 रुपए शौचालय साफ़ करने के बाद मिलते उसमें 10 रुपए की इनके पति शराब पी जाते। इन्हें 20 रुपए में अपने परिवार के छह लोगों का खर्चा चलाना होता था। पक्की रम्मा के लिए गरीबी का वो एक दौर था जिसका उन्होंने सामना किया, और आज एक सफल उद्यमी बन गईं।

ये हर दिन किसानों से सब्जी खरीदतीं हैं और होटल में सीधे बेचती हैं। हर दिन सब्जी खरीदने और बेचने में ये एक हजार रुपए दो तीन घंटे काम करने के बाद आसानी से बचत कर लेती हैं।

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