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नेताओं को जवाब देने पर इन अधिकारियों को मिली ‘सजा’, लेकिन जनता ने बनाया हीरो

नेताओं को जवाब देने पर इन अधिकारियों को मिली ‘सजा’, लेकिन जनता ने बनाया हीरोबाएं से, अशोक खेमका, दुर्गा शक्ति नागपाल और श्रेष्ठा ठाकुर।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पुलिस अधिकारी श्रेष्ठा सिंह इन दिनों चर्चा में हैं। सपा सरकार में गौतमबुद्धनगर की तत्कालीन एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल चर्चा में रही थीं। दोनों की वजह लगभग एक जैसी हैं। दुर्गा स्थानीय नेताओं को जवाब देकर सुर्खियों में आई थीं। जिसकी उन्हें कथित ‘सजा’ तबादले के रूप में मिली थी। मगर बात जब सोशल मीडिया तक पहुंचीं तब इन अफसरों को न्याय के लिए एक मंच मिला। सरकार में भले हाशिए पर गए हों लेकिन जनता के लिए ये सारे अधिकारी हीरो बन गए।

उत्तर प्रदेश ही नहीं कई राज्यों के ऐसे अधिकारियों को जनता ने सराहा है। सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा की जमीन जांच को लेकर सुर्खियों में आए आईएएस अशोक खेमका हों या हरिणाणा में ही अपने विभाग के कई अधिकारियों को जेल की हवा खिलाने वाले आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी, इनके बार-बार तबादले किए गए। सरकार उसे रुटीन बताती रही लेकिन जनता देश भर की जनता खेमका को लेकर इतने सवाल पूछे की हरियाणा में तत्कालीन हुड्डा सरकार को जवाब देते नहीं बना। जनता ने इन तबादलों और हाशिए ढकेलनो को सियासी सजा बताते हुए इऩ्हें अपना हीरो माना। सोशल मीडिया से चर्चा में रहे।

यूपी में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर भी पिछली सरकार पर लगातार ‘दबाव’ बनाने का आरोप लगाते रहे। मुलायम के टेप केस के बाद उन पर रेप तक के आरोप लगे और कुछ दिन घर में बिताने पड़े। हरियाणा से लेकर यूपी तक इन अधिकारियों के खुद के विभाग कभी ज्यादा खुलकर कुछ नहीं बोले, लेकिन चर्चा इस बात की जरुर रही कि नेताओं को सबक सिखाने पर तबादले की मार अधिकारियों का मनोबल तोड़ती है।

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श्रेष्ठा ठाकुर।

ताजा मामला बुलंदशहर की सीओ रहीं श्रेष्ठा ठाकुर का है, जहां बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कानून का पालन करवाने की कीमत लेडी सिंघम को अपना तबादला करवा कर चुकाना पड़ा। इस तबादले को शासन में बैठे अधिकारी रूटीन ट्रांसफर बता रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया से लेकर राजनैतिक गलियारों में अचानक हुए इस तबादले पर सवालियां निशान उठने लगे हैं। सीओ श्रेष्ठा ठाकुर ने बीते दिनों वाहन चेकिंग के दौरान बीजेपी के नेताओं पर ट्रैफिक नियमों का उल्लघंन करने पर कार्रवाई की थी, जिस पर बीजेपी नेताओं की महिला अधिकारी से घंटों बहस करने लगे।

देखिए उस दिन का वीडियो

इस बहस का वीडियो सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ था। उनका तबादला बहराइच हो गया। जिस पर श्रेया ने अपने फेसबुक पर जो लिखा, वो वायरल हो गया। सोशल मीडिया पर बीजेपी सरकार निशाने पर है। खबर है कि मामला यहां तक पहुंच गया है कि पीपीएस अधिकारियों का संगठन जल्द इस मामले में मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी सुब्रत त्रिपाठी कहते हैं, “मौजूदा वक्त में पुलिस का मनोबल बढ़ाने जैसी कोई चीज रह ही नहीं गई। कई वर्षों से जिस तरह राजनीतिक पार्टियों का हस्ताक्षेप विभाग में बढ़ है तब से कोई भी अधिकारी अपराधियों पर कार्रवाई करने से हिचकता है।”

पुलिस विभाग इस मामले को रुटीन बता रहा है लेकिन पूर्व अधिकारी इसे अधिकारियों को मनोबल तोड़ने वाला फैसला बता रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी सुब्रत त्रिपाठी कहते हैं, “मौजूदा वक्त में पुलिस का मनोबल बढ़ाने जैसी कोई चीज रह ही नहीं गई। कई वर्षों से जिस तरह राजनीतिक पार्टियों का हस्ताक्षेप विभाग में बढ़ है तब से कोई भी अधिकारी अपराधियों पर कार्रवाई करने से हिचकता है। क्योंकि उसे यह अभास हो जाता है कि अपराध करने वाला कहीं न कहीं किसी राजैतिक दल से जुड़ा है, और कार्रवाई करने पर तबादला तय है।”

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आईपीएस अमिताभ ठाकुर वैसे तो इसे रूटीन ट्रांसफर मानते हैं लेकिन ट्रांसफर नीति में पारदर्शिता की बात कहते हैं। वो बताते हैं, ट्रांसफर नीति में पारदर्शिता न होने के चलते इस ट्रांसफर पर सवाल उठेंगे, अगर कोई अधिकारी अपने जिले में बेहतर काम कर रहा है तो उसे जनहित में नहीं हटाना चाहिए।” वहीं एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि श्रेष्ठा ठाकुर कोई पहला मामला नहीं है, जब किसी अधिकारी ने सत्ता या विपक्ष के किसी बड़े नेता पर कार्रवाई की है, उसे तबादले की मार झेलनी पड़ी है। इसलिए लिए ज्यादातर अधिकारी प्रतिनियुक्ति में केंद्र जाने के फिराक में रहते हैं।”

ज्यादातर आईपीएस और पीपीएस अधिकारी केंद्र में प्रतिनियुक्त करवा कर केंद्र सरकार जाने की वजह एक ऐते तबादले को बताते हुए एक और अधिकारी ने कहा, “केंद्र सरकार में नौकरी का यह लाभ होता है कि एक किनारे चुपचाप पड़े रहिए जब आपके मन-मुताबिक राज्य में सरकार आ जाएं तो दोबारा से प्रतिनियुक्त पूरी कर अपने कॉडर वाले राज्य में वापस लौट बगैर किसी छोटे राजनैतिक हस्ताक्षेप के नौकरी करें।”

पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों पर तानाशाही का आरोप

अधिकारियों और नेताओं की भिड़ंत की वजह अधिकारियों की तानाशाही भी बताई जाती है। आम लोग अक्सर अधिकारियों पर दफ्तरों में न मिलने और बात पर गौर न करने की शिकायत करते हैं। गाजीपुर जिले में योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने जिलाधिकारी के तबादले को लेकर धरने पर बैठने का ऐलान किया है। उनका आरोप है कि डीएम संजय कुमार खत्री कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न कर रहे हैं। ओमप्रकाश ने तो जिलाधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने पर योगी कैबिनेट से इस्तीफा देने की भी धमकी दी है।

योगी सरकार बनने के बाद से अधिकारियों पर कार्रवाई

प्रदेश में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के तीन बाद ही हरदोई के सवायजपुर से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) विधायक कुंवर माधवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ रानू का एक विवादित आडियो उस समय चर्चा का केंद्र बना हुआ था। जिसमें विधायक जिले के शाहाबाद सीओ पर रौब गांठते हुए दिख रहे थे। एक मामले में कार्रवाई को लेकर दोनों में जमकर नोंकझोंक हुई थी।

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सीएम के गुह जनपद में गोरखपुर से विधायक राधा मोहन अग्रवाल और नई आईपीएस अधिकारी चारू निगम की सरेआम बहस खूब चर्चा में रही थी। सहारनपुर जिले के सांसद राघव लखनपाल तो शहर के कप्तान आवास पर ही अपने समर्थकों के साथ मिलकर हमला बोल दिया था, जिसके बाद सांसद पर कार्रवाई न होकर एसएसपी लव कुमार का ही सरकार ने तबादला कर दिया। हालांकि सरकार ने इसे भी रुटीन टांसफर बताया था। आईपीएस हिमांशु कुमार ने मौजूदा योगी सरकार पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी कर दी थी, जिससे नाराज प्रदेश सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया था।

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