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सेक्स वर्कर : "अगर हम कोरोना से डरेंगे तो खाएंगे क्या"?

राजस्थान की राजधानी जयपुर की गुलाबी चकाचौंध से दूर घुमंतू समुदाय के लोगों का एक तबका ऐसा भी है जिनकी रोजमर्रा ज़िन्दगी में पैसा और पेट की भूख एक स्याह हकीकत है।

हम बात कर रहे हैं जयपुर से NH-48 हाईवे पर सड़क किनारे 45 किलोमीटर दूर बसे गांव भोजपुरा की, जहां नट समुदाय की महिलाएं सालों से देह व्यापार में शामिल है।

जयपुर जिले की फागी तहसील के इस गांव की पहचान समय के साथ देह व्यापार में शामिल इन महिलाओं के नाम पर ऐसी बनी कि वर्तमान में स्थापित हो गयी है।

गौरतलब है कि लगभग 2000 लोगों की आबादी वाले इस गांव भोजपुरा में नट समुदाय के 15-20 घरों की महिलाएं सालों से देह व्यापार कर ही गुजारा कर रही है।

गांव की कच्ची पगडंडियों से गुजरते हुए जब हम भोजपुरा पहुंचे तो पहली मुलाकात रेणु (बदला हुआ नाम) से हुई। रेणु राजनट समुदाय से आती हैं और महज 14 साल की उम्र से ही देह व्यापार में शामिल है।

कारवां की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में लगभग 52 घुमंतु समुदाय रहते हैं और इनकी आबादी 70 लाख से भी ज्यादा है।

कोविड-19 में सेक्स वर्कर रेणु राजनट (बदला हुआ नाम) की मुश्किलें बढ़ीं.

राजनट समुदाय

देश की आज़ादी से पहले रियासतों के जमाने से नट समुदाय के लोग परंपरागत रूप से नाच गाने और करतब कलाबाजी दिखाने का काम किया करते थे। कुछ महिलाएं राजघरानों में विशेष नृत्यांगना हुआ करती थी।

लेकिन रियासतों के विघटन के बाद नए भारत में इन पारंपरिक कार्यों से आवाम ने रूख मोड़ लिया और समय के साथ नट समुदाय हाशिए पर जाता रहा।

धीरे-धीरे इनके पारंपरिक कामों की जगह छोटे-मोटे धंधों ने ली और इस समुदाय के लोग सड़कों पर करतब, मेलों में नाटक, जड़ी-बूंटी बेचकर इत्यादि कामों से गुजारा करने लगे।

रेणु बताती हैं कि "हमें इसी काम में रहना होता है। अगर कोई पढ़ लिख ले तो बाहर भी निकल आए। किसी दूसरी जाति के लड़के से प्रेम विवाह कर ले तो भी इस काम से निकला जा सकता है"

जातिगत भेदभाव

हमेशा से ही यह समुदाय सामाजिक भेदभाव का सामना करता आया है। गांव के स्थानीय लोग वर्तमान में नट समुदाय की महिलाओं के इस काम को हेय दृष्टि से देखते हैं और कहते हैं कि, हम तो यह चाहते हैं कि इनका ये काम बंद हो जाए।

कुछ बुजुर्ग इसे गंदगी का धंधा बताते हुए कहते हैं कि हमारे गांव से ये महिलाएं जितनी जल्दी चली जाए हम यही चाहते हैं लेकिन दूसरी तरफ इन महिलाओं के पुनर्वास के लिए वह क्या सोचते हैं यह सवाल पूछने पर हर किसी की जुबां सिल जाती है।

रेणु आगे कहती हैं कि "कौन कहता है आजकल छुआछूत खत्म हो चुकी है?

आज भी लोग हमारे साथ छुआछूत करते हैं। अगर किसी दुकान पर कोई सामान लेने चले गए और दुकानदार को पता चलता है कि वो नट समाज से है इतने में ही उनके हाव भाव बदल जाते हैं"

आगे रेणु जोर देकर कहती हैं कि "यह भेदभाव उनके घर के पुरूषों को भी झेलना पड़ता है। उनको जाति के कारण कई बार काम नहीं दिया जाता और थक हार कर उन्हें पत्थर तोड़ने का काम करना पड़ता है। यहां तक कि काम के लालच में कई बार उन्हें अपनी पहचान तक छिपानी पड़ती है".

वहां की महिलाओं से पता चला कि एक एनजीओ वहां काम करता है जो इन महिलाओं हाइजीन और सेफ्टी संबंधित चीजें उपलब्ध करवाता है और साल में एक बार एक कैंप के द्वारा एचआईवी की जांच भी करवा दी जाती है। हमने एनजीओ से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो पाई।

रेणु फिलहाल चल रहे कोरोना संक्रमण को लेकर भी चिंतित हैं। रेणु ने लॉकडाउन के वक्त के बारे में भी बात की। उन्होंने बताया कि "लॉकडाउन में हमारा काम ठप पड़ चुका था और खाने तक के पैसे नहीं थे लेकिन इस दौरान सरकारी अनाज हमें मिलता रहा जो अब बंद हो गया है लेकिन अब आगे का रास्ता काफी भयानक है। यह कोरोना वायरस हमारे काम के बिल्कुल उलट है"

इस मुद्दे पर हमने राजस्थान से सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी से बात की। उन्होंने कहा कि राजस्थान में ऐसे घुमंतू सामुदाय राज्य के अलग अलग जगहों पर रहते हैं। और इनमें कई समुदाय के लोग देह व्यापार में भी लिप्त हैं। भंवर मेघवंशी आगे कहते हैं कि हमारे समाज का किसी तबके को देखने का नजरिया महिलाओं की "शुद्धता" पर टिका हुआ है। हम देह व्यापार को अनैतिक समझते हैं लेकिन हमें इसे उन समुदायों के नजरिए से भी देखने की जरूरत है कि क्या यह उनके लिए भी अनैतिक है?

और जहां तक बात है सामाजिक भेदभाव की तो अगर नट समुदाय के लोग देह व्यापार से बाहर भी निकल जाए तो भी उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना ही पड़ेगा।

रेणु के घर का रास्ता.

भंवर मेघवशी ने आगे कहा कि सरकारी तंत्र इनके पुनर्वास में बुरी तरह फेल हुआ। कई एनजीओ इनके लिए काम जरूर करते हैं लेकिन वो भी सीमित ही होता है इसलिए सरकार को चाहिए कि इनके वैकल्पिक पुनर्वास में बड़े फैसले ले।

नट समाज के अलावा कई और घुमंतू समुदाय भी हैं जो राजस्थान के अलग अलग इलाकों में देह व्यापार में लिप्त हैं।

रेणु पढ़ना चाहती थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ने उसे बहुत कम उम्र में इस काम में लगना पड़ा। उनकी एक छोटी बहन भी है उनको डर है अगर वो पढ़ी लिख नहीं पाएगी तो जल्द ही उसे भी इसी काम में शामिल होना पड़ेगा।

बहरहाल कोरोना की मार ने कई लोगों को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ एक बड़ा मजदूर वर्ग इससे अभी भी प्रताड़ित हो रहा है दूसरी ओर देह व्यापार में लिप्त महिलाएं भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं।

रिपोर्ट: अनीश, फ्रीलांस जर्नलिस्ट, राजस्थान


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