पैर में गोली मार देते, कट जाता, लेकिन जान तो बच जाती : मृत किसान की मां ने कहा

कन्हैयालाल पाटीदार के साथ उस दिन छह किसानों की मध्य प्रदेश के मंदसौर में मौत हुई थी। लेकिन कई किसान ऐसे थे, जिन्हें भी गोली लगी थी, गनीमत रही कि उनकी जान बच गई लेकिन जिंदगी कहीं ठहर सी गई है।

मंदसौर (मध्य प्रदेश)। "हाथ पैर में गोली मार देते.. हाथ कट जाता, पैर कट जाता लेकिन मेरे बेटे की जान तो बच जाती। लेकिन यहां (पेट दिखाते हुए) गोली मारी थी।" किसान आंदोलन में पुलिस की गोली से मृत किसान कन्हैयालाल पाटीदार की बुजुर्ग मां कहती हैं। अपने बेटे और उस दिन की कहानी बताते हुए वो कभी गुस्से से भर जाती हैं तो मायूस हो जाती हैं।

कन्हैयालाल पाटीदार के साथ उस दिन छह किसानों की मध्य प्रदेश के मंदसौर में मौत हुई थी। लेकिन कई किसान ऐसे थे, जिन्हें भी गोली लगी थी, गनीमत रही कि उनकी जान बच गई लेकिन जिंदगी कहीं ठहर सी गई है। कन्हैयालाल के गांव चिल्लौद पिपलिया से कुछ किलोमीटर आगे रोड सिंह का गांव है। रोड सिंह अभी सिर्फ 19 साल का है। पिछले साल ही उसे वोट डालने का अधिकार मिला था। इसी साल वो अपने किसान पिता की मांगों के समर्थन में किसान आंदोलन शामिल था। उसकी कमर में पीठ की तरफ से गोली लगी थी जो पेट को चीरते हुए बाहर निकल गई थी।

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"मंगलवार का दिन था, इसी तरह गर्मी खूब पड़ रही थी, नाराज किसानों ने नीमच हाईवे पर जाम लगा रखा था, एक तरफ किसान थे दूसरी तरफ हजारों की संख्या में पुलिस थी, अचानक गोली चली कुछ किसानों को लगी, मैं उन्हें बचाने उन्हें उठाने के लिए दौड़ा, अचानक एक गोली मेरे भी लगी मैं वहीं गिर गया।" रोड सिंह (19 वर्ष) ने बताया।

रोड सिंह 6 जून, 2017 से पहले एक छात्र था, जो पढ़ाई करने के साथ रोजाना दो से ढाई किलोमीटर की दौड़ लगाता था, ताकि सेना में उसकी भर्ती हो जाए, लेकिन अब उसके पेट में बड़ा आपरेशन हुआ है। राइफल की गोली से कमर में पीछे की तरफ दो इंच का गड्ढा हो गया है। पुलिस की लाठी मार अक्सर उसे लड़खड़ाने पर मजबूर करती है। रोड सिंह के मुताबिक बस जिंदा बच गया, उम्मीद तो नहीं थी।

मध्य प्रदेश में पिछले वर्ष 1 जून से शुरु हुए किसानों के गांव बंद के आंदोलन ने 6 जून को मंदसौर जिले के पिपलिया मंडी में हिसक रूप ले लिया था, जिसमें 6 की किसानों की पुलिस और सुरक्षाबलों की गोली से मौत हो गई थी। मरने वालों में कन्हैयालाल पाटीदार, अभिषेक, सत्यनारायण मांगीलाल धनगर, चैनाम गनपत, पूनमचंद पाटीदार उर्फ बबूल शामिल थे। जबकि रोड सिंह समेत दर्जनों किसान घायल हुए थे, रोड सिंह को गोली लगी थी, ढाई महीने अस्पताल भर्ती रहने के बाद वो जिंदा घर लौट पाया।

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रोड सिंह से तीन साल बड़ा उनका भाई नरेंद्र सिंह बताता है, " गोली लगने की खबर के बाद मैं मंदसौर पहुंचा तो इसकी हालत देखकर चक्कर आ गया, पूरा शरीर खून से लथपथ था.. मंदसौर में डाक्टरों ने ठीक से इलाज न कर इंदौर रेफर कर दिया, पूरे रास्ते खून बहता रहा, उसे रोकने के लिए मैंने अपने सारे कपड़े उतार कर उसके गांवों पर बांध दिया। गोली एक जगह लगी थी, बाकी पुलिसवालों ने मारा बहुत था।"

रोड सिंह का गांव हादसे वाली जगह से करीब 22 किलोमीटर दूर है। रोड सिंह के घर में खेती होती है, पढ़ाई के अलावा वो भी खेती में हाथ बटाता था तो किसान के आंदोलन में शामिल हुआ। रोड सिहं बताता है, गोली लगने के बाद पुलिसवालों ने मुझे लाठियों से मारा, घसीटते हुए थाने ले गए। वो कह रहे थे, तू मरेगा.. लेकिन एक महिला सिपाही ने कहा- बच्चे की जानं न लो। उसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं, मेरे जैसे किसान किसान वहां घायल पड़े थे।"

इस आंदोलन में सबसे पहले चिल्लौद पिपलिया के किसान कन्हैयाटीदार की मौत हुई थी। कन्हैया के गांव में उनकी मूर्ति लगाई गई है। किसान संगठनों ने शहीद का दर्जा दिया है, मूर्ति वाली जगह से कुछ दूरी पर ही कन्हैया लाल का घर है। मायूसी से भर घर में उनकी पत्नी और बूढ़ी मां मिलीं।

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कन्हैया के बड़े भाई जदगीश पाटीदार भी आंदोलन में शामिल थे, लेकिन वो कन्हैया की जहां मौत हुई उससे कुछ दूर थे। किसानों के आंदोलन में खूनखराबा आगजनी कैसे हुई पूछने पर जगदीश बताते है,किसान की मांगे थी फसलों का सही रेट और कर्जमाफी, इसे लेकर एक जून के बाद किसान कई बाद मंदसौर में कलेक्टर और दूसरे अधिकारियों के ज्ञापन देने जा चुके थे, कोई सुनवाई नहीं हो रही थी, तो किसानों ने तय किया का बाजार बंद कराएंगे। सारे किसान 5 जून को पिपलिया मंडी (गांधी चौराहा) पहुंचे और व्यापारियों से दुकाने बंद करने को कहा, काफी मान गए लेकिन कुछ अड़ गए, उसमें एक व्यापारी नें कई किसानों को बहुत मारा, इसी जगह से बवाल हो गया। किसान भिड़ गए।"

जगदीश के मुताबिक वो घी का कारोबारी था और उसकी हरकत ने आंदोलन में घी का काम किया, जिस गांव के किसान को व्यापारियों ने मारा था वो वहां के किसानों ने दुकानवाले से मारपीटanकी, लेकिन पुलिस कुछ नहीं बोली, कुछ लोग कहते है पुलिस ने व्यापारियों से कहा कि मेरे हाथ बंधे तुम लोग निपट लो.. जिसके बाद हंगामा हो गया। किसानों ज्यादा हुए तो पुलिस ने लाठीचार्च किया और लोगों को भगा दिया।

लेकिन एक किसान, जिसे सरिया से मारा गया था उसका वीडियो वायरल होने के बाद पूरे इलाके आसपास के 50-80 गांवों के किसानों के किसान नें नीमच हाईवे जाम कर दिया। इसी दौरान कुछ लोग पता नहीं कहां से आए उन्होंने दुकानों में तोड़फोड की, और किसानों को भड़काया.. जिसके बाद और मामला बढ़ गया।

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मंगलवार 6 जून को नीमच हाईवे पर कई किलोमीटर तक ट्रकों की लाइन लग गई थी.. दूसरे शहरों से पुलिस और सुरक्षाबल आए। रोड सिंह के मुताबिक अटल चौराहे के पास (जहां से कुछ दूर राहुल गांधी की रैली हुई) और थाने के पास हंगामा जारी थी, किसान सड़क पर जमे थे, तभी गोली चली और तीन किसान मौके पर मर गए। उन्हें बचाने के चक्कर में कई घायल हुए। थाने के सामने भी दो किसानों की गोली लगी, एक किसान बबलू पाटीदार को सीने पर गोली मारी गई थी।

छह किसानों की मौत के बाद मंदसौर का आंदोलन ठंड़ा पड़ गया था, लेकिन पूरे देश में किसान उठ खड़े हुए थे। वादे के मुताबिक शिवराज सिंह ने मृत किसानों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपए दिए। कुछ के परिजनों को नौकरी भी मिली। लेकिन इनके परिजन इंसाफ मांगते हैं।

आंखों में नमी लिए कन्हैयालाल पाटीदार की पत्नी सुमित्रा कहती हैं, "एक साल हो गया, अभी तक किसी दोषी पर कोई कार्रवाई नहीं। उस वक्त सबने बड़ी-बड़ी बातें की थी, लेकिन आज तक रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई। जब तक दोषियों को फांसी नहीं मिलेगी मैं चुप नहीं रहूंगी. पैसे तो आज नहीं तो कल खर्च हो जाएगा. मैं अपने दो बच्चों का पिता कहां से लाऊंगी… ?"

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