धुंध इंसानों के लिए ही नहीं मवेशियों के लिए भी खतरनाक 

धुंध इंसानों के लिए ही नहीं मवेशियों के लिए भी खतरनाक मवेशियों के लिए भी ये धुंध नुकसानदायक है।

लखनऊ। धुंध का असर दिल्ली में ही नहीं बल्कि देश के कई राज्यों में दिखाई दे रहा है, धुंध के असर से इंसानों में बीमारियां तो बढ़ ही रहीं हैं साथ ही मवेशियों के लिए भी ये धुंध नुकसानदायक है।

"इस धुंध का जितना मनुष्यों पर असर है उतना ही पशुओं के ऊपर होता है। पशुओं को भी सांस लेने में दिक्क्त होगी फेफड़ों में भी परेशानी हो रही है। क्योंकि पशु बाहर ही रहते हैं। मनुष्य तो अपना बचाव कर लेता है पशु नहीं। ऐसे में पशुपालक को अपने पशुओं का ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है। अगर पशु की सांस फूल रही हो या फिर उसे बुखार लग रहा हो तो तुरंत पशुचिकित्सालय में दिखाए, "ऐसा बताते हैं, राजस्थान के अजमेर जिले के पशुचिकित्सक डॉ. संतोष सिंह।

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हमारे देश में पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय का एक बड़ा जरिया है। भारत में सबसे ज्यादा दुधारु पशु हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन भी देश में होता है। करीब 15 करोड़ टन दूध हम पैदा करते हैं।

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पंजाब के फरीदाकोट जिले में अमरिंदर की डेयरी है, जिसमें करीब 45 पशु है। अमरिंदर बताते हैं, "सर्दियों में पशुओं का दूध कम हो जाता है, लेकिन दूध अभी से ही कम हो गया है जबकि इतनी सर्दी भी नहीं पड़ रही है। इस धुंध का हमारे गाँव में भी असर है।''

अमरिंदर ने आगे बताया, " गाँव के कई लोगों ने शेड में टाट के बोरे लगाए है जिससे बाहर का धुंध अंदर न आ सके। हमारी डेयरी में प्रतिदिन 250 लीटर दूध का होता है। अभी 10 लीटर सुबह और शाम कम हुआ है।"

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19वीं पशुगणना के अनुसार भारत में कुल 51.2 करोड़ पशु है जो कि विश्व के कुल पशुओं का लगभग 20 प्रतिशत है। भारत में अभी सालाना 16 करोड़ (वर्ष 2015-16) लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इसमें 51 प्रतिशत उत्पादन भैंसों से 20 प्रतिशत देशी प्रजाति की गायों से और 25 प्रतिशत विदेशी प्रजाति की गायों से आता है। शेष हिस्सा बकरी जैसे छोटे दुधारू पशुओं से आता है। ऐसे में धुंध का असर दूध उत्पादन में भी पड़ सकता है।

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उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के कमालपुर गाँव में रहने वाले वीरेंद्र यादव बताते हैं, "इस बार जितना धुंध देखने को मिला उतना कभी नहीं मिला। हम लोगों को ही इतनी सांस की दिक्कत होती है तो पशुओं का भी यही हाल है।" वीरेंद्र पिछले कई वर्षों से डेयरी चला रहे है। इनके पास करीब 75 पशु हैं। वीरेंद्र के पास गाय-भैंस के अलावा मुर्गी पालन भी करते हैं।"

मुर्गीपालन में वैसे ही ठंड के मौसम में बहुत देखभाल की जरूरत होती है लेकिन इस धुंध से भी मृत्युदर बढ़ सकती है। ऐसे में मुर्गी के बाड़े के अंदर पर्दे लगा दें और उन्हें ऊपर की तरफ से लगभग छह इंच तक खुला छोड़ दें।" वीरेंद्र ने बताया।

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राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ पशु वैज्ञानिक डॉ. एके चक्रवर्ती बताते हैं, "इससे निपटने के लिए देश को स्वदेशी नस्लों को अपनाने की ओर बढ़ना होगा। हमारी स्वदेशी नस्लें विपरीत मौसमी परिस्थितियों को झेलने में अधिक सक्षम होती हैं। साहिवाल प्रजाति की गाय एक उदाहरण है। इस स्वदेशी प्रजाति की गाय को देश के किसी भी हिस्से में पाला जा सकता है। इसी तरह भैंसों में भी मुर्रा प्रजाति की भैंस हर राज्य में पाली जा सकती है।”

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सर्दियों के मौसम पशुओं मे अफरा, निमोनिया जैसी कई बीमारी होती हैं। खुले स्थान में बांधे जाने वाले मवेशी को निमोनिया रोग हो जाता है, जिससे उन्हें सांस लेने में कठिनाई होती है। ऐसे में पशुपालक इन बातों का रखें ध्यान-

  • पशु को सुबह और शाम अंदर बांधे।
  • अगर पशुओं के लिए शेड है तो उन पर टाट के बोरे लगा दें।
  • पशुओं को ताजा और साफ पानी दें।
  • पशुओं को सप्ताह में दो बार गुड़ जरुर खिलाएं।
  • अगर पशु की सांस फूल रहीं हो या बुखार के लक्षण दिखाई तो तुंरत पशुचिकित्सक को दिखाएं।

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