स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को डिजिटल मार्केटिंग सिखा रही है 'सोशल सहेली'

स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के सामने चुनौती थी अपने उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का। उनकी इस चुनौती को आसान करने और उनके संघर्ष की कहानी को सामने लाने की कोशिश कर रहा है ये प्लेटफॉर्म।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   11 March 2021 1:30 PM GMT

women entrepreneurs, social saheli, SHG, Self help groupस्वयं सहायता समूह की महिलाओं को सिखाया जा रहा कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से अपने व्यवसाय को कैसे बढ़ा सकती हैं। (सभी तस्वीरें साभार- सोशल सहेली)

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। हिना एक महिला स्वयं सहायता समूह चलाती हैं और समय मिलने पर यूट्यूब पर क्रोशिया चलाना सिखाती हैं, लेकिन वीडियो में सिर्फ उनके हाथ ही दिखते हैं। "मैं कैमरे पर चेहरा दिखाकर बोल नहीं पाती। फिर सोचा कि यह तरीका सही है। यह भी सोचती थी कि लोग वीडियो देखेंगे तो क्या कहेंगे। लेकिन अब सब ठीक है। अब मैं बड़ी आसानी से कैमरे का सामना कर लेती हूं और अब ऐसा वीडियो बनाना सीख रही हूं जिसमें मेरा चेहरा भी दिखेगा।" 27 साल की हिना कहती हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चिनहट के गांव घैला में रहने वाली हिना के रानी लक्ष्मी बाई महिला आजीविका स्वयं सहायता समूह से 12 महिलाएं जुड़ी हैं और उनका समूह अभी हर महीने से पांच से छह हजार रुपए की कमाई कर रहा है। कोई मसाला बनाता है तो सिलाई का काम करता है। हिना को क्रोशिया से लगाव था और वे अपने काम को ज्यादा से ज्यादा महिलाओं तक ले जाना चाहती थीं।

"मैं अपने गांव की महिलाओं को रोजगार देना चाहती थी। इसलिए स्वयं सहायता समूह बनाया। पहले हमने पैसे जुटाए, फिर काम शुरू किया, लेकिन हमारे प्रोडक्ट को पहचान नहीं मिल पा रही थी। उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था, समूह की ज्यादातर महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं हैं। ऐसे में हमारे गांव में आई सोशल सहेली की टीम ने हमारी बहुत मदद की। हमें वीडियो बनाना सिखाया। हमें कैमरे पर बोलना सिखाया। अब समूह की महिलाएं फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपने प्रोडक्ट के बारे में खुद लोगों को बताती हैं।" हिना कहती हैं।

मोबाइल से वीडियो से बनातीं समूह की महिलाएं।

लखनऊ जिले में ही चिनहट ब्लॉक के गांव लौलाई में रहने वाली विभा आनंद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। लॉकडाउन में बुटीक स्टोर की नौकरी चली गई। जहां उन्हें महीने के 4,000 से 5,000 रुपए मिल जाते थे (काम के अनुसार)। नौकरी छूटने के बाद चिंता थी कि परिवार कैसे पलेगा, फिर समूह बनाया लेकिन मुश्किलें आसान नहीं हुईं। वे बताती हैं, "हिम्मत करके समूह बनाया और काम शुरू किया। सरकारी मदद भी मिली जिससे काम और आसान हो गया। इसके बाद चुनौती थी कि अपने प्रोडक्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं कैसे? हमारे पास मोबाइल तो था लेकिन हमें यह नहीं पता था उसके माध्यम से हम भी अपने बनाये सामान को भी बेच सकते हैं। सोशल सहेली की टीम ने हमारी यह मुश्किल आसान कर दी।"

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विभा अपने गांव में लीड इंडिया महिला आजीविका स्वयं सहायता समूह चलाती हैं जिससे कुल 85 महिलाएं जुड़ी हैं। वे खुद समूह सखी भी हैं। "लॉकडाउन के दौरान मैंने सुना था कि उत्तर प्रदेश सरकार प्रवासियों को काम देने वालों समूहों की मदद कर रही है, तो मैं लखनऊ के ग्रामीण आजीविका मिशन कार्यालय गई। उनकी मदद से समूह की महिलाओं को सिलाई की ट्रेनिंग दिलाई। लॉकडाउन में सरकार की ओर से हमारे गांव की समूहों को 40,000 मास्क का ऑर्डर मिला था, जिसमें से मेरे समूह ने 1300 मास्क बनाये थे और हमें एक मास्क के बदले पांच रुपए मिले थे।अब हम दलिया, सत्तू और मसाला भी बना रहे हैं।"

स्वयं सहायता समूह (SHG) उन महिलाओं का समूह होता है जो आपस में छोटी-छोटी बचत करके एक दूसरी की मदद करते हैं। इन पैसों से खुद का या समूह के बाकी सदस्यों के साथ मिलकर व्यवसाय किया जा सकता। देश में साल 2011 को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को की आजीविका में वृद्धि कर उन्हें मुख्य धारा में लाना और वित्तीय सेवाओं को उन तक पहुंचाना है।

समूह की महिलाएं सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक अपनी स्टोरी पहुंचा रही हैं।

हिना हों और विभा की तरह स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कई और महिला उद्यमी 'सोशल सहेली' ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम और तकनीकी मदद (ट्रेनिंग) से अपनी आवाज को लोगों तक पहुंचा रही हैं। सोशल सहेली की टीम समूह से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण दे रहा है। महिला उद्यमियों को प्रशिक्षण में सोशल मीडिया की बारीकियां बताई जा रही हैं कि ताकि उनका प्रोडक्ट ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।

उत्तर प्रदेश में ही गोरखपुर के बसंतपुर की रहने वाली गायत्री चंद्रवार का समूह गीता स्वयं सहायता समूह जूट का बैग और पापड़ बना रहा है। एक साल से चल रहे इस समूह में अभी 10 सक्रिय महिलाएं हैं। कभी वीडियो कॉलिंग पर भी बात करने में शरमाने वाली गायत्री का इंस्टाग्राम पर सक्रिय अकाउंट भी है।

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गीता गांव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं, " पहले अपने बनाये सामान आसपास के बाजारों में बेचा करती थी। काम को बढ़ाने की सोच रही थी लेकिन व्यवसाय का दायरा नहीं बढ़ रहा था। फिर सोशल सहेली की टीम जब हमारे यहां आई तो उन लोगों ने हमें ट्रेनिंग दी। मोबाइल कैसे पकड़ते हैं, पोस्ट पर रीच कैसे बढ़ाते हैं और सबसे बड़ी बात कि कैमरे पर बोलना कैसे है। सब कुछ सिखाया। अभी ऑर्डर तो बहुत ज्यादा नहीं बढ़े हैं लेकिन अब दूर-दूर के लोग हमारे प्रोडक्ट के बारे में पूछते हैं।"

सोशल मीडिया के जरिए गीता को प्रचार का सुलभ साधन मिल गया है। जो न सिर्फ उनके व्यापार को बढ़ा रहा बल्कि उन्हें अपने आसपास पहचान भी दे रहा है। गीता बताती हैं, " अभी तो हमारा समूह महीने में छह से सात हजार रुपए की ही कमाई कर रहा, लेकिन हमें उम्मीद है कि आगे हमारा व्यापार बढ़ेगा।"


'सोशल सहेली' प्रोजेक्‍ट को लीड कर रहीं शमिता हर्ष गांव कनेक्शन को बताती हैं, "सोशल सहेली People Like Us Create (Pluc) की एक सामाजिक पहल है जिसके माध्यम से हम स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को मोबाइल के जरिये स्टोरीटेलिंग सिखा रहे हैं। महिलाओं को ट्रेनिंग देने की शुरुआत हमने दिसंबर 2020 में गोरखपुर से की थी।"

"जो महिलाएं समूह बनाकर अपना व्यापार चलाना चाहती हैं, हम उन महिलाओं को ट्रेनिंग दे रहे हैं। हम उन्हें मार्केटिंग स्किल सिखा रहे हैं। महिलाएं स्टोरी टेलिंग के माध्यम से कैसे अपनी आवाज दूर-दूर तक पहुंचा सकती हैं, मोबाइल और सोशल मीडिया का बेहतर प्रयोग कैसे किया जा सकता है, हम यह सब सिखा रहे हैं। पिछले तीन महीने में हम 115 महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुके हैं। प्रोग्राम के पहले भाग में हम उत्तर प्रदेश स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को ट्रेनिंग दे रहे हैं, आगे दूसरे राज्यों को भी शामिल करेंगे।" शमिता बताती हैं।

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स्वयं सहायता समूह की ही महिलाओं को क्यों प्रशिक्षित किया जा रहा? क्या सोशल सहेली आजीविका मिशन के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है? इस सवाल के जवाब में शमिता कहती हैं, " हम आजीविका मिशन के साथ मिलकर काम नहीं कर रहे हैं। स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षित इसलिए कर रहे हैं कि क्योंकि वे महिलाएं व्यापार करना चाहती हैं, इसीलिए तो समूह बनाती हैं और हमें पंजीकृत समूहों की जानकारी आजीविका मिशन से मिल जाती है। इसलिए हम अभी समूह की महिलाओं को ही प्रशिक्षित कर रहे हैं और उनकी स्टोरी को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।"

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