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सोनभद्र: सोने की चमक के पीछे छिपी काली तस्‍वीर

Mithilesh DharMithilesh Dhar   22 Feb 2020 1:45 PM GMT

सोनभद्र: सोने की चमक के पीछे छिपी काली तस्‍वीर

"मेरी हड्डियां गल रही हैं। अब मैं बैसाखी के सहारे ही चल पाता हूं। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि मेरे पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है जिस कारण मुझे फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो गई। यहां हमारे जैसे सैकड़ों लोग आपको मिलेंगे, जो जवानी में बूढ़े हो रहे हैं।" जगत नारायण विश्वकर्मा कहते हैं।

जगत नारायण उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के म्योरपुर विकास खंड में रहते हैं। यह वही सोनभद्र है जो आजकल सोने की खदान को लेकर चर्चा में है। मीडिया में चल रही खबरों की मानें तो सोनभद्र के सोन पहाड़ी और हरदी इलाकों में सोने के भंडार हैं। इसकी नीलामी के लिए प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।

चार राज्यों की सीमा से सटा उत्तर प्रदेश का जिला सोनभद्र एक औद्योगिक क्षेत्र है। यहां की मिट्टी में बाक्साइट, चूना पत्थर, कोयला और सोना जैसे कई खनिज पदार्थ पहले से ही उपलब्ध है। यहां कई पॉवर प्लांट भी हैं जिस कारण इसीलिए लोग इसे ऊर्जाधानी के नाम से भी जानते हैं। सिंगरौली-सोनभद्र पट्टी में कोयले पर आधारित 10 पावर प्लांट हैं, जो 21,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करते हैं जो जिसकी सप्लाई नजदीकी राज्यों में होती है।

उत्तर प्रदेश सरकार को हर साल खनन से लगभग 27,198 करोड़ रुपए का राजस्व देने के बदले सोनभद्र की एक तस्वीर और है जिसकी ज्यादा बात नहीं होती, जो अक्सर छिपा दी जाती है। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) ने वर्ष 2018 में सोनभद्र-सिंगरौली के कुछ गांवों में कई तरह के नमूने लिए थे। रिपोर्ट के अनुसार 40 किमी क्षेत्र में फैले सोनभद्र-सिंगरौली के इलाके में रहने वाले लगभग 20 लाख लोग पारा (मरकरी) जनित प्रदूषण की चपेट में हैं। इसकी वजह से महिलाओं का आकस्मिक गर्भपात हो रहा, एनिमिया, बीपी जैसी बीमारियां हो रही हैं। बागों में फल नहीं आ रहे, फसल उत्पादन में गिरावट आ रही है।

नीति आयोग के लिए सामाजिक वानिकी और पर्यावरण-पुनर्वास केंद्र ने वर्ष २०१७ में जो सर्वे किया था, यह उसकी तस्वीर है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण एजेंसी ने वर्ष 2018 सोनभद्र को 22 अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों की सूची में रखा था। रिपोर्ट में बताया गया था कि धरती के छह सर्वाधिक प्रदूषण चिंताओं में शुमार पारा यहां की हवाओं में है। इसके लिए उड़न राख (फ्लाई ऐश) को जिम्मेदार बताया जाता है। पिछले साल जब दिल्ली भयंकर प्रदूषण की चपेट में था तब यहां का एयर क्वालिटी इंडेक्स दिल्ली से भी ज्यादा था, अब भी है। नीचे की रिपोर्ट 22 फरवरी 2020 की है।

दरअसल हर देश में वायु की गुणवत्ता की माप के लिए एयर क्वालिटी इंडेक्स बनाये गए हैं, जो कि हमें ये बताते हैं कि जिस हवा में हम जीवन जी रहे हैं, उसमें कितनी शुद्धता है, उसमें नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की कितनी मात्रा है।


सोनभद्र में कोयले की खदानों से निकलने वाली प्लाई ऐश से लोगों को कैंसर जैसी घातक बीमारियां हो रही हैं। देशभर में पर्यावरण संरक्षण और वनों एवं प्राकृतिक संपदाओं के संरक्षण से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए बने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम (एनजीटी) के अधिनियम के अनुसार फ्लाई ऐश में भारी धातु जैसे-आर्सेनिक, सिलिका, एल्युमिनियम, पारा और आयरन होते हैं, जो दमा, फेफड़े में तकलीफ, टीबी और यहां तक कि कैंसर तक का कारण बनते हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थिति सिंगरौली-सोनभद्र पट्टी में कोयले पर आधारित पावर प्लांट में सालभर में 10.3 करोड़ टन कोयले की खपत होती है। इतनी बड़ी मात्रा में कोयले की खपत से हर साल तकरीबन 3.5 करोड़ टन फ्लाई ऐश (राख) पैदा होती है, जिसका पर्याप्त निस्तारण हो नहीं पाता। जो वहां की हवा, पानी और मिट्टी में घुल चुकी है।


भारत के सबसे बड़ी बिजली उत्पादन संयंत्र नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) विंध्याचल का शाहपुर स्थित विशालकाय ऐश डैम (राखड़ बांध) 6 अक्टूबर, 2019 को टूट गया था। इस डैम में बिजली संयंत्रों में कोयले के जलने के बाद निकली राख (फ्लाई ऐश) को जमा किया जाता है।

एनटीपीसी संयंत्र से जो राख निकली थी वह करीब 35 मीट्रिक टन (सात करोड़ कुंतल से अधिक) थी जिसे रेणुका नदी पर बने रिहन्द बांध में बहा दिया गया। इस बांध से सोनभद्र-सिंगरौली के लगभग 20 लाख लोगों को पीने का पानी सप्लाई होता है। इतनी बड़ी लापरवाही की चर्चा कहीं नहीं हुई।

पिछले साल जब मैं सोनभद्र रिपोर्टिंग करने गया था तो वहां की सड़कों पर इतनी राख थी कि आप बिना हेलमेट लगाये, रुमाल बांधे दो-चार किलोमीटर भी नहीं चल सकते। कोयले लदे डंपर सड़कों के साथ ही आम लोगों को भी रौंद देते हैं। सोनभद्र-सिंगरौली में रिपोर्टिंग कर रहे साथी अमित पांडेय बताते हैं, " मैंने कई थानों से रिपोर्ट ली है। उसके अनुसान पिछले साल सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी में कुल 450 एक्सीडेंट हुए थे जिसमें 119 लोगों का जान गई। 474 लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए। इसमेंसे ज्यादातर दुर्घटनाओं के लिए कोल वाहन जिम्मेदार हैं।"

वर्ष २०१९ में जब रिपोर्टिंग पर सोनभद्र गया था, तस्वीर उसी समय की है।

जगतनारायण विश्वकर्मा की ही अर्जी पर अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) ने वर्ष 2018 में सिंगरौली परिक्षेत्र के पानी और मिट्टी की जांच की थी जिसके बाद ही पता चला कि सोनभद्र-सिंगरौली में रहना खतरनाक है।

वे बताते हैं, "वर्ष 2001 में मुझे पता चला कि मैं जहां रहता हूं, वहां का पानी बहुत दूषित है। लोग बड़ी तेजी से विकलांग हो रहे हैं। एक-एक के घर पांच, छह लोग विकलांग हो गये। जांच कराया तो पता चला कि यहां के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है, जिस कारण लोग फ्लोरोसिस नामक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इसके बाद से मैंने सिंगरौली परिक्षेत्र में हो रहे प्रदूषण को लेकर आवाज उठाई। लोगों को जागरूक करने की ठानी, लेकिन आज मैं खुद इसके चपेट में आ गया हूं।"

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जानेमाने डॉक्टर एके दास ने शुरू में जगतनारायण का इलाज किया था। वे बताते हैं, "जगतनारायण विश्वकर्मा की घुटने की हड्डियां गल रही हैं। ऐसा फ्लोराइड के कारण होता है। इस अवस्था को फ्लोरोसिस कहते हैं। इसमें ऑपरेशन भी नहीं हो सकता। ऐसे में जगतनारायण अब कभी बिना लाठी के सहारे चल पाएंगे, यह कहना मुश्किल है।"


वर्ष 2001 से पहले सोनभद्र जिले के लोग इस बात से अनजान थे कि जो पानी वे पीते हैं उसमें फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है। जगत नारायण ने ही म्योरपुर ब्लॉक के कुशमाहा रापहरी के दिव्यांग लोगों का जांच कराई थी। उनकी जांच के बाद ही पता चला कि सोनभद्र के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है जिससे लोगों को फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो रही है और लोग उससे विकलांग हो रहे हैं।

राम मनोहर लोहिया संस्थान, लखनऊ की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीतू बताती हैं, " फ्लोराइड वाला पानी हर किसी के लिए नुकसानदायक होता है। अगर गर्भवती महिला लगातार फ्लोराइड युक्त पानी पी रही है तो उस महिला के साथ-साथ गर्भ में पल रहे शिशु के लिये बहुत ही हानिकारक होता है। कई बार इसके दुष्प्रभाव से बच्चा अपंग भी पैदा हो जाता है। ऐसे में साफ पानी ही पीना चाहिए।"

उत्तर प्रदेश में लोगों तक पेय जल पहुंचाने के जिम्मेदार विभाग यूपी जल निगम के मुख्य अभियंता (ग्रामीण) जीपी शुक्ला गांव कनेक्शन को बताते हैं, "अत्यधिक जलदोहन की वजह से भूगर्भ जल बहुत तेजी से नीचे जा रहा है। कल कारखानों से निकलने वाली दूषित पानी नदियों में छोड़ा जा रहा है जो भूगर्भ जल को दूषित कर रहा है। प्रदेश सरकार मार्च 2021 तक फ्लोराइड प्रभावित जिलों में पाइप लाइन से पानी मुहैया कराने जा रही है। इसके लिए युद्ध स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने वर्ष 2012 में सोनभद्र-सिंगरौली में सर्वे के बाद जो रिपोर्ट तैयार की थी उसके अनुसार यहां के पानी में फ्लोराइड की मात्रा 2 मिलीग्राम से ज्यादा है। विदेश में पानी में फ्लोराइड की मात्रा 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक सामान्य मानी जाती है, जबकि भारत में यह दर 1.0 मिलीग्राम निर्धारित है।

सोनभद्र के शक्तिनगर में रहने वाले 35 वर्षीय हीरा लाल अपने अपने तीन साले के बच्चे को लेकर कई महीनों से परेशान हैं। वे बताते हैं, " मेरे बेटे की उम्र मात्र तीन साल है, उसे अस्थमा है। डॉक्टर कहते हैं, आप जिस जगह रह रहे हैं वहां के ज्यादातर बच्चों को ऐसी बीमारियां हैं। हम शाम होते ही घरों के दरवाजे बंद कर लेते हैं। छतों पर कपड़े नहीं सुखाते क्योंकि वे काले पड़ जाते हैं।"

हीरा लाल चिलकाटाड़ गाँव में रहते हैं। यह गाँव जमीन से कोयला निकालने वाली कंपनी नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) की स्थानीय साइट से कुछ ही दूरी पर स्थित है। गाँव में कई परिवार ऐसे भी हैं जिनकी कई पीढ़ियां दिव्यांग हैं।

जगतनारायण प्रदूषण के मुद्दों पर लगातार काम कर रहे हैं। इसके लिए वे सुप्रीम कोर्ट तक भी जा चुके हैं। उनकी ही याचिक को संज्ञान में लेकर एनजीटी ने वर्ष 2014 में सिंगरौली और उससे लगे सोनभद्र के प्लांटो का दौरा किया था। क्षेत्र का निरीक्षण करने के बाद एनजीटी ने पर्यावरण की दृष्टिकोण से सख्त आदेश दिए थे कि पॉवर प्लांटों से शत प्रतिशत राख का निस्तारण किया जाये। हालांकि कंपनियां आज भी इस आदेश का पालन नहीं कर रही हैं।


जगतनारायण खुद कैसे फ्लोरोसिस की चपेट में आ गये, इस बारे में वे बताते हैं, "लोगों को जागरूक करने के लिए मैं अब तक सैकड़ों गांवों में जा चुका हूं। इस दौरान जहां-जहां गया वहां का पानी पिया। मुझे पता था कि यह खतरनाक है लेकिन मेरे सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था। अब पछतावा होता है।"

जगतनारायण वनवासी सेवा आश्रम में काम करते हैं। वे बताते हैं, "वर्ष 2016 में वनवासी सेवा आश्रम ने आसपास के गांवों में सर्वे कराया था। तब हमें पता चला था कि चोपन ब्लॉक के गांव परवाकुंडवारी पिपरबां, झीरगाडंडी, ब्लॉक दुद्धी में गांव मनबसा, कठौती, मलौली, कटौली, झारोकलां, दुद्धी, म्योरपुर ब्लॉक में गांव कुसमाहा, गोविन्दपुर, खैराही, रासप्रहरी, बरवांटोला, पिपरहवा, सेवकाडांड, खामाहरैया, हरवरिया, झारा, नवाटोला, राजमिलां, दुधर, चेतवा, नेम्ना, ब्लॉक बभनी के गांव बकुलिया, बारबई, घुघरी और खैराडीह गांव के लोग फ्लोराइड की वजह से बीमार पड़ रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट में वकील और पर्यावरणविद अश्वनी कुमार दूबे गांव कनेक्शन से फोन पर कहते हैं, " देखिये, सोनभद्र-सिंगरौली की हालत पर्यावरण को लेकर पहले से ही खराब है। कोर्ट और सरकार की गाइडलाइंस का पालन होता नहीं है। अब जाहिर सी बात है कि सोने के लिए जमीन खोदी जायेगी, पेड़ भी काटे जायेंगे, इससे प्रकृति का फिर नुकसान होगा। सोना निकले लेकिन इससे प्रकृति को नुकसान नहीं होना चाहिए।"

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