चौंकाने वाली रिपोर्ट : किसानों के कर्ज में डूबने की वजह सिर्फ खेती नहीं

चौंकाने वाली रिपोर्ट : किसानों के कर्ज में डूबने की वजह सिर्फ खेती नहींइलाज के लिए पैसा उधार लेने के साथ जमीन बेचने की नौबत आ जाती है (फोटो: गांव कनेक्शन)

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। देश में कर्ज़ को लेकर मुद्दा गर्माया है। आंदोलनों का दौर चल रहा है, इसी बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट बताती है कि किसानों के कर्ज में दबे होने की वजह सिर्फ खेती नहीं। 70 फीसदी किसान आमदनी से ज्यादा इलाज में खर्च करते हैं।

किसानों की आमदनी का बड़ा भाग कैसे दवा इलाज में खर्च होकर किसानों का दर्द बढ़ा रहा है, ये दिल्ली में करीब 250 किलोमीटर दूर बरेली के किसान जबरपाल से समझते हैं। 26 एकड़ जमीन के मालिक जबरपाल उन्नत किसान हैं, लेकिन पिछले तीन वर्षों में उनकी माली हालत कमज़ोर हो गई है। वो बताते हैं, 'पिता जी को ब्लड कैंसर हो गया था, करीब 12 लाख रुपए खर्च हुए।'

जबरपाल किसी तरह पिता का गम और दवाई का खर्च सह पाए लेकिन बाराबंकी जिले के टांडपुर में रहने वाले बीपत शाह अपने-अपने भाई के इलाज में बर्बाद हो गए हैं। कुछ समय पहले उनके विकलांग भाई कीढ़ी को कोई बीमारी हो गई थी। स्थानीय स्तर पर दवा इलाज के बाद वो शहर के बड़े नर्सिंग होम में गए जहां करीब 60-70 हजार खर्ज हो गए। पहले से कर्ज में डूबे बीपत ने ये पैसा स्थानीय लोगों उधार लिया और अब उनकी जमीन बिकना तय है। ये समस्या सिर्फ जबरपाल या बीपत की नहीं देश के ज्यादातर किसानों इलाज के खर्च से परेशान हैं। पीलीभीत में मरौरी ब्लॉक के गांव कैंच निवासी माखन लाल (60 वर्ष) बताते हैं, "हमारी आमदनी का बहुत पैसा दवाई पर इसलिए खर्च हो जाता है क्योंकि गांव के आसपास बेहतर सुविधाएं नहीं है शहर आने-जाने में ही बहुत पैसा खर्च हो जाता है।"

हमारी आमदनी का बहुत पैसा दवाई पर इसलिए खर्च हो जाता है क्योंकि गांव के आसपास बेहतर सुविधाएं नहीं है शहर आने-जाने में ही बहुत पैसा खर्च हो जाता है।
माखनलाल, ग्रामीण, कैंच गांव, पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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आत्महत्या करने वाले जिन परिवारों से मैं मिला हूं,वहां परिवार के कर्ज का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य खर्च की लागत है।
पी साइनाथ, रमन मैगसेसे पुरस्कार ग्रामीण मामलों के पत्रकार

इंडिया स्पेंड ने किसान की आमदनी और खर्च को लेकर विभिन्न सरकारी आंकड़ों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की है जिसके मुताबिक भारत के नौ करोड़ कृषि परिवारों में से करीब 70 फीसदी औसतन हर महीने अपनी वाली आय से ज्यादा खर्च करते हैं। ये किसान स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कर्ज लेने के लिए मजबूर हैं। इलाज में बढ़ते खर्च के चलते खेती में निवेश करने की उनकी क्षमता कम हो जाती है। भारत में किसानों की आत्महत्या पर लगातार रिपोर्टिंग करने वाले और रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता पी साइनाथ कहते हैं, "आत्महत्या करने वाले जिन परिवारों से मैं मिला हूं,वहां परिवार के कर्ज का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य खर्च की लागत है। "

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रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बढ़ती मृत्यु दर का सबसे बड़ा कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। जिला अस्पतालों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किए गए सीएचसी और पीएचसी में अच्छा इलाज न मिल पाने के कारण लोगों को दूसरे जिलों के बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। इसमें काफी समय बर्बाद हो जाता है और लोगों को बेहतर इलाज भी नहीं मिल पाता है।

इंडिया स्पेंड के विश्लेषण के अनुसार, 'उत्तर प्रदेश,बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तराखंड और असम राज्यों में 13 फीसदी सीएचसी की कमी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर अकाउन्टबिलिटी इनिशियेटिव संस्था के बजट सार के अनुसार, 'मार्च 2016 में बिहार में, सीएचसी में 93 फीसदी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी थी तो उत्तर प्रदेश में ये आकंड़ा 84 फीसदी थी। स्थानीय सरकारी डॉक्टरों कैसे इलाज होता होगा ये समझने के लिए लखनऊ का ग्रामीण इलाका एक उदाहरण है, यहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इटौंजा, बीकेटी और काकोरी में अल्ट्रासाउंड कराने का जिम्मा एक ही डॉक्टर पर है जो हर दिन के हिसाब से अपनी ड्यूटी करता है। सरकारी अस्पतालों में ये मुफ्त है तो लेकिन निजी क्लीनिकों में 400 से 900 रुपए देने पड़ते हैं।

प्रदेश में अच्छे संस्थानों और डॉक्टरों की भारी कमी होने के कारण कुछ स्वास्थ्य संस्थानों पर दबाव पड़ता है। जब इन संस्थानों पर व्यक्ति को इलाज नहीं मिलता है तो वह प्राइवेट अस्पालों की तरफ जाता है, जहां इलाज बहुत महंगा है।
डॉ. वेद प्रकाश, उप चिकित्सा अधीक्षक, केजीएमसी

खुद किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वेद प्रकाश ने गांव कनेक्शन को बताया, "प्रदेश में चिकित्सा में अच्छे संस्थानों और डॉक्टरों की भारी कमी होने के कारण कुछ स्वास्थ्य संस्थानों पर दबाव पड़ता है। जब इन संस्थानों पर व्यक्ति को इलाज नहीं मिलता है तो वह प्राइवेट अस्पालों की तरफ जाता है, जहां इलाज बहुत महंगा है, जो गरीबों की और गरीब कर देता है।'

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उत्तर प्रदेश भी उन सरकारी आंकड़ों में उन हाई फोकस राज्यों में रखा गया है जहां सेहत की तरफ अतिरिक्त संसाधन जुटाए जाने पर जोर देने की वकालत की जाती है। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार सबसे 7500 डॉक्टरों की कमी है, जिसका सीधा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। शहर और कस्बों में तेजी से बढ़ते नर्सिंग होम और निजी क्लीनिक इसका उदाहरण हैं, जहां एक बार मरीज की फीस ही 300-500 रुपए हैं, जबकि दवाएं अलग से होती हैं। इनमें कई सरकारी डॉक्टर भी शामिल हैं। पिछले दिनों लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में एक समारोह के दौरान यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने डॉक्टरों को उनका फर्ज याद दिलाते हुए निजी प्रैक्टिस न करने की सलाह दी थी।

लखनऊ के राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक दीपक मालवीय बताते कहते हैं, 'गाँवों में आज भी लोगों में स्वास्थ्य बीमा को लेकर जागरुकता कम है इसलिए उनका इलाज करवाने में काफी पैसा खर्च हो जाता है। सरकार को गाँवों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य बीमा के बारे में जागरूक करने की बेहद ज़रूरत है।'

गाँवों में स्वास्थ्य बीमा को लेकर जागरुकता कम है इसलिए उनका इलाज करवाने में काफी पैसा खर्च हो जाता है। सरकार को गाँवों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य बीमा के बारे में जागरूक करने की बेहद ज़रूरत है।
दीपक मालवीय, निदेशक, राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान

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उन्होंने आगे बताया कि सरकार बीपीएल श्रेणी में अंतर्गत आने वाले परिवारों के लिए सभी मेडिकल कॉलेजों और बड़े अस्पतालों में मुफ्त इलाज दे रही है। सामान्य श्रेणी में आने वाले गरीब परिवारों को भी मुफ्त इलाज दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपना आय प्रमाण पत्र दिखाना होता है। 35,000 रुपए से कम की वार्षिक आय होने पर ही मुफ्त इलाज का प्रावधान है।

सिर्फ कर्ज माफी नहीं है समाधान

हाल ही में, उत्तर प्रदेश ने 36,359 करोड़ रुपए और महाराष्ट्र ने 30,000 करोड़ रुपए का ऋण माफ किया है। यह रकम भारत 3.1 लाख करोड़ रुपए (49.1 बिलियन डॉलर) या वर्ष 2016-17 में देश के सकल घरेलू उत्पाद के 2.6 फीसदी हिस्से के बराबर की राशि का कर्ज माफ करने के लिए जूझ रहा है। जानकार बताते हैं, 'जब तक ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य दूसरी सुविधाएं नहीं दी जाएंगी, किसान कर्ज के दलदल से नहीं निकल पाएंगे।'

उन्नाव का जिला अस्पताल

जानिए, गांव के लोग क्या कह रहे हैं

मेरा सबसे ज़्यादा पैसा परिवार की दवाई पर खर्चा होता है। बच्चों की पढ़ाई पर भी बहुत पैसा खर्च हो रहा है आजकल और खेती में तो आप जानते ही हैं कितना खर्चा होता है। खेती में लागत, मेहनत ज़्यादा लगती है और मुनाफा कम होता है। परिवार की बीमारियों के इलाज में भी खर्च काफी हो जाता है।-

रामलखन, किसान, रम्पुरा गाँव, मरौरी ब्लॉक, पीलीभीत

किसान खाने के लिए खुद अपने खेतों पर निर्भर होता है, लेकिन हमारा सबसे अधिक खर्च परिवार के बच्चों की पढ़ाई पर आता है। जेब खर्च की दिक्कत तब और बढ़ जाती है जब परिवार का कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है। उस दौरान डॉक्टर की फीस से लेकर दवाई तक का खर्च अधिक हो जाता है।

विपलव तिवारी, किसान, मुईनुद्दीनपुर गाँव, निधौलीकलां ब्लॉक, एटा

हमारी आमदनी तो कम है, जब भी खेती करता हूं तो रिस्क पर ही करता हूं। परिवार का खर्चा खाने-पीने से लेकर पढ़ाई और दवाओं पर ही आता है, हां सबसे अधिक खर्चा पढ़ाई पर ही आता है।

भरत सिंह, किसान, गाँव सुल्तानपुर, मारहरा ब्लॉक, एटा

मैं लगभग छह एकड़ में खेती करता हूं। मेरा सबसे ज्यादा पैसा बीमारी में चला जाता है। परिवार में किसी न किसी की तबीयत खराब ही रहती है। दूसरे नम्बर पर खेती-किसानी में और फिर अन्य दैनिक खर्चे होते हैं।

पुनीत तिवारी, किसान, संडीला ब्लाक, हरदोई

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खर्च तो लगभग सब पर अपने बजट के हिसाब से करता हूं पर दवाओं के खर्च का किसी को अंदाज नहीं होता, सब ठीक रहा तब तो कोई बात नहीं पर अगर परिवार का कोई सदस्य बीमार हो गया तो दवा खर्च सारे खर्चों पर भारी पड़ जाता है।

दिनेश कुमार, किसान, भदेसुवा, मोहनलाल गंज, लखनऊ

वैसे तो ज्यादा खर्च पढ़ाई पर ही आता है पर दवाई पर आने वाला अकस्मिक खर्च तकलीफ दायक होता है इसे टाल भी नहीं सकते।

राजकुमार अवस्थी, किसान, भेलमपुर, माल ब्लॉक, लखनऊ

सबसे ज्यादा पैसा खाद व उर्वरक में खर्च होता है। फसलों में कई प्रकार के खाद व दवा लगती है, जिससे फसल ठीक रहे। दवा इतनी महंगी आती है कि छोटे तबके के किसान नहीं लगा पाते।

धर्मेंद्र प्रजापति, किसान, बागपत

छोटे किसान अब खेती से हटते जा रहे हैं, कोई सिलाई का काम सीख रहा है तो कोई आपने गाँव-मोहल्ले में परचून की दुकान चला रहा है। खेतों में लगाने के लिए रुपए चाहिए अब वो कहां से आए या तो बैंक से कर्जा लो या फिर किसी और से। फसल उतने रुपए की होती नहीं है क्या करें महंगाई इतनी हो गई है। फसल में खाद और दवाई सबसे महंगा पड़ता है।

हरपाल खोखर, किसान, बागपत

रायबरेली के बछरावां ब्लॉक के जलालपुर गांव निवासी पचपन वर्षीय चंद्र किशोर 7 बीघा के कास्तकार हैं और अपनी आय का बड़ा हिस्सा एक बेटे और दो बेटियों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं। शिवगढ़ के किसान सुजीत सिंह की आय का भी एक बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होता है।वहीं हरचंद पुर ब्लॉक के किसान बंधु आलोक द्विवेदी और विनोद द्विवेदी की काफी खेती है पर आमदनी का अच्छा खासा हिस्सा मुकदमे बाजी में चला जाता है। पत्नी की बीमारी में ही आधी आमदनी चली जाती है। बाकी बच्चों की पढ़ाई और खेती में लगा देते हैं। खेती के सहारे घर चलाना मुश्किल हो रहा है।

जमीन पर प्रसूता

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बेटा दिल्ली यूनिवर्सिटी में एलएलबी कर रहा है। ज्यादा कमाई उसकी पढ़ाई में खर्च होता है। बाकि बुनियादी जरूरतें तो मुंह ताकती रह जाती हैं।

रविन्द्र भड़ाना, किसान, नरहैडा, मेरठ ब्लॉक, मेरठ

बेटा दिल्ली में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है। 10 हजार रुपए माह का खर्चा है। बाकी खेती-बाड़ी में खाद्य पानी पर खर्च हो जाता है।

बीरसिंह, किसान, दांदूपुर, फलावदा ब्लॉक, मेरठ

हम लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं इसलिए पढ़ाने में ज्यादा खर्च नहीं होता है, लेकिन दवाई में ज्यादा खर्च हो जाता है।

कंचन सिंह, किसान, ढिल्लियाभूड़, कन्नौज

रिपोर्टिंग टीम- लखनऊ से देवांशुमणि तिवारी और दिपांशु मिश्रा, पीलीभीत- अनिल चौधरी, कन्नौज- अजय मिश्रा, मेरठ-सुंदर चंदेल, बहराइच- रोहित श्रीवास्तव, रायबेरली- किशन कुमार, कानपुर- राजीव शुक्ला, ऐटा- बासु जैन

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