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कहीं बेजान पेड‍़ों में भरे जा रहे हैं रंग तो कहीं हो रहा उनकी बीमारियों का इलाज

Anusha MishraAnusha Mishra   20 May 2017 4:55 PM GMT

कहीं बेजान पेड‍़ों में भरे जा रहे हैं रंग तो कहीं हो रहा उनकी बीमारियों का इलाजट्री एंबुलेंस के सदस्य

लखनऊ। पेड़ों से प्यार करने, उनकी महत्ता की बातें तो बहुुत से लोग करते हैं लेकिन ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो इनके लिए ज़मीनी स्तर पर कुछ करें। आज हम आपको बता रहे हैं पेड़ों से प्यार करने वाले कुछ ऐसे ही लोगों की कहानियां जो आपके लिए भी प्रेरणा बन सकती हैं।

एंबुलेंस, जो पेड़ों की बीमारियों को करती है दूर

क्या होता है जब पेड़ों को कोई समस्या होती है? पेड़ किसी डॉक्टर के पास चल कर नहीं जा सकता या किसी से नहीं कह सकता कि मेरी ओर ध्यान दो मैं बीमार हूं। यह हमारी जि़म्मेदारी है कि हम पेड़ के पास जाएं उसकी समस्या को जानें और उसे दूर करने की कोशिश करें।

कई बार नए लगाने पौधे जड़ से उखड़ जाते हैं और यूं ही पड़े पड़े सूख जाते हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता, कभी पेड़ों में कीड़े लग जाते हैं, या दीमक उन्हें खोखला करना शुरू कर देती है। पेड़ों की उम्र बढ़ने के साथ भी उनमें कई समस्याएं होती हैं। पेड़ों की इन्हीं परेशानियों को दूर करने के लिए नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) ने एक एंबुलेंस सेवा शुरू की। जब भी कोई पेड़ बीमार होता है तो यह एंबुलेंस पहुंच जाती है उसकी सेवा करने।

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2009 के मानसून के बाद दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आने वाले एक क्षेत्र में लगभग 100 पेड़ जड़ से उखड़ गए। यह पेड़ लगभग 25 साल पुराने थे इसलिए तेज हवा और बारिश के सामने ज्‍़यादा देर नहीं टिक पाए। जबकि जो पेड़ लगभग एक सदी पुराने थे बारिश और तूफान भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया और वे अपनी जगह पर यूं ही डंटे रहे। इसी के कुछ महीनों बाद फरवरी 2010 में नई दिल्ली नगर निगम ने पहली 'ट्री एंबुलेंस' सेवा शुरू की जो इस क्षेत्र में पेड़ों की देखभाल करती थी।

वेबसाइट बेटर इंडिया के मुताबिक़, एनडीएमसी के असिस्टेंट डायरेक्टर जितेंद्र कौशिक कहते हैं कि लुटियन दिल्ली में लगे पेड़ों को ठीक करना नई दिल्ली नगर निगम की प्राथमिकता थी। यहां ज़्यादातर पेड़ बीसवीं सदी यानि 1911 से 1925 के बीच के लगाए हुए हैं जिनमें कई समस्याएं हो चुकी थीं। वह कहते हैं कि इन सदियों पुराने पेड़ों की अपनी कुछ स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं और इस ट्री एंबुलेस के माध्यम से इन समस्याओं को आसानी से दूर किया जा रहा है।

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इस एंबुलेंस में कीटनाशव, कवकनाशक जैसी दवाइयों के साथ एक लंबा पाइप और मोटर भी रहता है, जिसका इस्तेमाल पेड़ों को धोने में किया जाता है। इसके अलावा एक सीढ़ी भी इस एंबुलेंस में रहती है जिसकी मदद से लगभग 60 फीट ऊंचे पेड़ तक पहुंचा जा सकता है। पेड़ों को कई बीमारियां होती हैं जिनमें से ज़्यादातर कीट, कवक और कीड़ों से होती है। पेड़ों के तनों का खोखला होना ज़्यादा उम्र के पेड़ों में एक बड़ी समस्या होती है जिससे निपटना ज़रूरी होता है। एंबुलेंस में शामिल इस टीम में एक सुपरवाइज़र रोहताश शर्मा, ड्राइवर बेघराज और अनोखेलाल व सुनील हैं जो पेड़ों की देखभाल का काम करते हैं।

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चार लोगों की इस टीम को एनडीएमसी ने सिर्फ इसी काम के लिए रखा है। इन लोगों को देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान, पूसा के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और दिल्ली के पुराना क़िला स्थित स्कूल ऑफ गार्डनिंग में विशेष ट्रेनिंग दी गई है। जितेंद्र कौशिक बताते हैं कि फिलहाल दिल्ली में इस तरह की बस एक ही एंबुलेंस है लेकिन जल्द ही हम इस सेवा का विस्तार करेंगे।


पेड़ों पर संदेश लिखकर उन्हें बचाने की मुहिम

बुंदेलखंड के झांसी में कुछ सालों से सात सहेलियां पेड़ों को बचाने के लिए एक खास मुहिम चला रही हैं। ये बहनें पेड़ों पर कुछ ऐसे संदेश लिखती हैं जो बरबस ही आपका ध्यान उन पेड़ों की ओर चला जाएगा। पेड़ अपील कर रहे हैं, 'मुझे मत काटो, मैं तुम्हारा जीवन हूं, मुझे बचाओ।' पेड़ों के प्रति लोगों की लापरवाही झांसी की सात सहेलियों को खटक गई। उन्होंने महिलाओं का जेसीआई झांसी गूंज नामक संगठन बनाया और तय किया कि वे पौधे रोपेंगी, नहीं बल्कि पेड़ों को बचाने की मुहिम चलाएंगी।

जेसीआई झांसी गूंज की कार्यक्रम प्रभारी ममता दसानी ने आईएएनएस से कहा कि उन्होंने देखा है कि पौधों का रोपण होता है, मगर कुछ समय बाद ही वे मुरझाकर खत्म हो जाते हैं, लिहाजा उन्होंने अपने साथियों के साथ तय किया कि वे अब पौधे रोपेंगी नहीं, बल्कि पेड़ों को बचाने का काम करेंगी। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाने के साथ पेड़ों पर संदेश लिखेंगे ताकि आम लोगों में पेड़ों के प्रति अपनेपन का भाव विकसित हो। इसी के मद्देनजर सड़क किनारे के पेड़ों पर संदेश लिखे गए। उनकी इस मुहिम ने रंग दिखाया और अब उनकी संस्था में जुड़ने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ती जा रही है।

जो पेड़ों को दे रहीं नई ज़िंदगी

हरे-भरे पेड़ों से तो कुछ लोगों को प्यार होता है और इनकी देखभाल करने का लोग जिम्मा भी उठा लेते हैं लेकिन सूखे और बेजान यानि ठूंठ पेड़ों से प्यार करना कुछ मुश्किल है। लेकिन मुंबई की कुछ महिलाओं ने इन्हीं सूखे पेड़ों के लिए अपने दिल में प्यार जगाया है और वे मिलकर इन पेड़ों को दे रही हैं एक नई और रंगों भरी ज़िंदगी। ये महिलाओं कूची और रंगों की मदद से सूखे पेड़ों को ख़ूबसूरत बना रही हैं।

बीबीसी की ख़बर के मुताबिक, 14 सदस्यों के समूह में कोई टीचर है, तो कोई एयरहोस्टेस, कोई डिज़ाइनर है तो कोई बिजनेस वुमेन। आत्मनिर्भर महिलाओं के इस समूह ने बेजान पेड़ों को सुंदर कलाकृति बनाने के इस काम में और भी कई लोगों को जोड़ा है। इस समूह से हाल ही में बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार और उनकी पत्नी भी जुड़ी हैं।

वैसे इनके समूह में तक़रीबन 40 स्वयंसेवक हैं, जो समय-समय पर पेड़ों पर चित्रकारी करने का काम करते हैं। इस काम में आने वाले ख़र्च के बारे में समूह की सदस्या सबिषी शंकर कहती हैं, ''एक पेड़ को सुंदर बनाने में तक़रीबन पांच हज़ार तक का ख़र्च आता है। शुरू में यह ख़र्च हम सबने अपनी जेब से दिया।" लेकिन अब फ़ेसबुक, ट्विटर और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट से लोग हमसे जुड़कर हमारी मदद कर रहे हैं।''

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