उज्जैन : एक नगरी जहां के राजा का न्याय विश्व भर में प्रसिद्ध है

उज्जैन : एक नगरी जहां के राजा का न्याय विश्व भर में प्रसिद्ध हैपढ़िए उज्जैन की यात्रा रिपोर्टर डायरी में।

घण्टे घड़ियालों की आवाज से गूंजता है, ये शहर माथे पर त्रिपुंड लगाए लोग गली गली दिख जाते हैं यहां की सुबह मंत्रोच्चार से शुरू होती है और शाम आरती की घंटियों से गूंजती है , गली ,सड़क पर साफ सफाई देखने लायक है वही यहां हर घर ,व्यवसायिक प्रतिष्ठान में महाकाल का चित्र सुशोभित है। गांव कनेक्शन के ऑफिसियल टूर पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आठ सौ पंद्रह किमी की यात्रा कर उज्जैन उतरते ही कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला जितना सुना था उज्जैन को उससे कही ज्यादा पाया आइये आज आप को ले चलते हैं विश्वप्रसिद्ध नगरी अवंतिका की यात्रा पर..

उज्जैन नगरी को अवंतिका भी कहते हैं, भारतवर्ष के मध्य प्रदेश राज्य में बसी यह नगरी धरती के इतिहास की प्राचीनतम नगरी है। उज्जैन को अवंतिका के साथ-साथ प्राचीनकाल में कनकश्रृंगा के नाम से भी जाना है। आज से लाखों वर्ष पूर्व लिखे गए भगवान महाकाल के 12 ज्योतिर्लिंगों
में भी उज्जैन नगरी का वर्णन किया गया है कहते है कि समय काल की गणना विक्रमी संवत की शुरुआत भी उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा की गई थी। द्वापर युग में भी भारतीय धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण व बलराम की उज्जैन में महर्षि से संदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने का उल्लेख मिलता हैं।

भारत वर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य में गंगा नदी के तट पर बसी नगरी काशी और उज्जैन को समकक्ष माना जाता है। क्षिप्रा नदी के तट पर बसा उज्जैन सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए आस्था का केंद्र है।
उज्जैन के दर्शनीय स्थल में महाकाल ज्योतिर्लिंग के दर्शन भूतभावत महाकाल प्रधान है आज भी उज्जयिनी के राजा महाराजाधिराज भगवान महाकाल को ही माना जाता है। हर वर्ष सावन के महीने में महाकाल की शाही सवारी निकाली जाती हैं।

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उज्जैन मंदिरों की नगरी।

हरसिद्धि का मंदिर

महाकाल मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित है माता हरसिद्धि मंदिर इन्हें विक्रमादित्य की आराध्य देवी कहा जाता है शाम को आरती के समय मंदिर प्रांगण में स्थित दो बड़े ज्योति स्तंभ जिनकी ऊंचाई करीब 25 फ़ीट है आकर्षण के प्रमुख केंद्र है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह स्थान 52 शक्तिपीठों में से एक है । जनश्रुतियों के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने यहा 11 बार अपना मस्तक काटकर देवी को अर्पण किया था।इसी मंदिर के प्रांगण में चिंताहरण गणेश जी का मंदिर स्थित है।

चारधाम मंदिर

मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध संत स्वामी शांतिस्वरूपानंद परमानंदजी महाराज द्वारा वर्ष 1992 में श्रीचारधाम मंदिर की स्थापना की गई है। यहां पर श्री द्वारिकधाम,श्री जगन्नाथ धाम, श्री रामेश्वर धाम, एवम बद्री विशाल की प्रतिमाएं स्थापित है।यहां पर चारों धामों के एक साथ दर्शन हो जाते है।

गोपाल मंदिर

उज्जैन में स्थित गोपाल मंदिर आकर्षण का केंद्र है इस मंदिर का निर्माण महाराजा दौलत राव सिंधिया की महारानी बायजाबाई द्वारा करवाया गया था यहाँ पर स्थित गोपालकृष्ण का विग्रह मनोहारी है व मंदिर का सौंदर्य अनुपम है।

चौबीस खम्भा मंदिर

चौबीस खम्भा मंदिर महाकाल मंदिर से यही कोई आधा किमी की दूरी पर स्थित है । इस मंदिर को एक हजार साल पुराना माना जाता है ,चौबीस खम्भा मंदिर सिर्फ चौबीस खंभों से जुड़कर बना है इसकी निर्माण कलां अद्वितीय है, जन श्रुतियों के अनुसार पूर्व काल मे चौबीस खम्बा मंदिर ही उज्जयिनी में प्रवेश का मुख्य द्वार था।

महाराजा विक्रमादित्य का मंदिर।

सांदीपनि आश्रम

अवंतिका में ही महर्षि सांदीपनि का गुरुकुल आज भी विद्यमान है आज से 5 हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ,बलराम,और सुदामा के यहाँ शिक्षा ग्रहण करने का उल्लेख भारतीय धर्मग्रंथों में मिलता है सांदीपनि आश्रम में विद्यमान शिवलिग 6हजार वर्षो से भी पुराना माना जाता है भारतीय गुरुकुल परम्परा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने यहा सभी 14 विद्याएं एवं चौसठ कलाओं का ज्ञान यहा प्राप्त किया ।

विक्रमादित्य के न्याय सिंघासन और बत्तीस पुतलियों की कहानी तो सुनी होगी।
महाकाल मंदिर के ठीक पीछे विक्रमादित्य का टीला स्थित है जनश्रुतियों के अनुसार यही बैठकर राजा विक्रमादित्य न्याय करते थे तीन तरफ से सरोवर से घिरा हुआ यह टीला उज्जैन का इतिहास समेटे हुए है। इस टीले पर महाराज विक्रमादित्य की भव्य प्रतिमा स्थापित है साथ ही राजा विक्रमादित्य के नौ रत्नों धन्वंतरि वैद्य,क्षपणक,अमरसिंह,शंकु,खटकपारा, कालिदास ,बेताल भट्ट,वररुचि,और महान गणतिज्ञ व खगोल शास्त्री वराहमिहिर की प्रतिमाओं के साथ बत्तीस पुतलियों की प्रतिमाएं स्थापित है।

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श्री मंगलनाथ मंदिर

उज्जैन में ही मंगलनाथ का मंदिर स्थित है मत्स्य पुराण के अनुसार मंगलग्रह का जन्म पृथ्वी से ही हुआ है। पूरे विश्व मे मंगल रेखा पृथ्वी को सिर्फ यही पर स्पर्श करती है ऐसी मान्यता है काल शर्प दोष की पूजा भारत मे इसी स्थान पर की जाती है,ज्योतिष और खगोल की दृष्टि से भी यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पीर मत्स्येन्द्र नाथ मंदिर

मत्स्येन्द्र नाथ का भारत के प्राचीनतम योगियों के महत्वपूर्ण स्थान है भारतीय योग में मत्स्येन्द्र नाथ के नाम पर मत्स्येन्द्र आसन का उल्लेख है। इस स्थान को सिद्ध भूमि माना जाता है कहते है इसी स्थान पर राजा विक्रमादित्य ने अगिया बैताल से सिद्धि प्राप्त की थी यहां पर स्थित सिद्ववट की मान्यता है कि इसी वट के नीचे माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को भोजन कराया था।भारत सहित अन्य देशों स्व ऋषि मुनि इस स्थान पर अनुष्ठान व तांत्रिक साधना के लिए इस स्थान पर आते है।

कहते है उज्जैन की यात्रा उज्जैन के कोतवाल काल भैरव की यात्रा के बिना पूरी नही होती ।
उज्जैन नगरी में भैरव गढ़ में काल भैरव का मंदिर श्रद्धालुओं सहित वैज्ञानिकों के लिए भी कौतूहल का विषय है यह स्थान बहुत जागृत व चमत्कारिक माना जाता है। इस मंदिर में कालभैरव को मदिरा का भोग अर्पित किया जाता है। यहाँ की विशेषता यह है कि कालभैरव के मूर्ति में कोई छेद नहीं है फिर भी मदिरा से भरा बर्तन उनके मुंह में लगाते ही वह बर्तन खाली हो जाता है मंदिर के बाहर करीब 4 पीढ़ियों से प्रसाद की दुकान लगाने वाले श्रीकेश बताते हैं कि पूर्वजों से सुना है कि ब्रिटिश शाशनकाल में अंग्रेजो ने इस पर काफी शोध कराया पर कालभैरब की मूर्ति में मदिरा का पात्र लगाने के बाद मदिरा कहा जाती है इसका पता नहीं लगा पाए।

गढ कालिका मंदिर

आपने कालिदास की कहानी तो जरूर सुनी होगी कहा जाता है कि कालिदास इतने मूर्ख थे कि वो जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे कालिदास को अल्पज्ञानी से महाज्ञानी बनने के पीछे देवी गढकलिका का आशीर्वाद माना जाता है। देवी गढ़ कालिया महाकवि कालिदास की आराध्य देवी थी त्रिपुरा महात्यम के अनुसार देश के बारह शक्तिपीठों में से गढ़ कालिका का स्थान छठे नम्बर पर है।यह मंदिर पुरानी अवंतिका में स्थित है।

वेधशाला यंत्र महल

खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण यह वेधशाला वैज्ञानिक तकनीक से बनी हुई है। इस वेधशाला का निर्माण सं 730 में राजा जयसिंह के द्वारा करवाया गया था। इस तरह की वेधशाला दिल्ली,मथुरा,काशी,और जयपुर में भी थी किन्तु अब भारतवर्ष में सिर्फ यही वेधशाला सुचारू रूप से संचालित है।

चिंतामन गणेश मंदिर

चिंतामन गणेश का मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है पिछले 1500 वर्षो में तत्कालीन राजाओं द्वारा इसका जिर्णोध्यार कराया गया राजा प्रथा में इसका अंतिम जीर्णोद्धार महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया। इस मंदिर में विराजमान गणेश जी का सिंदूरी विग्रह को स्वयंभू माना जाता है ।

इस्कान का राधा मदनमोहन मंदिर

इस मंदिर का निर्माण इस्कान संस्था द्वारा वर्ष 2010 में कराया गया जिंसमे राधा मोहन की प्रतिमाएं व मंदिर निर्माण कला देखने योग्य है। भारत की राजधानी दिल्ली से यह स्थान 846 किमी की दूरी पर स्थित है यहा जाने के लिए रेल मार्ग ,सड़क परिवहन व वायु मार्ग की भी व्यवस्था है।यह स्थान मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 190 किमी की दूरी पर स्थित है।

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