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मुश्किल में फ़िल्मी दुनिया में काम करने वाले स्पॉट बॉय, प्रोडक्शन बॉय, मनरेगा में काम करने को मजबूर

कोरोना मरीजों के मामले बढ़ने के साथ हॉटस्पॉट बने मुंबई में अभी भी फिल्म इंडस्ट्री का काम पटरी पर नहीं लौट सका है। ऐसे में इसका सीधा असर उन हजारों मजदूरों पर पड़ा है जो इस फ़िल्मी दुनिया में सालों से काम करते आये हैं।

Kushal MishraKushal Mishra   23 Jun 2020 1:14 PM GMT

मुश्किल में फ़िल्मी दुनिया में काम करने वाले स्पॉट बॉय, प्रोडक्शन बॉय, मनरेगा में काम करने को मजबूरफिल्म इंडस्ट्री में बतौर स्पॉट बॉय का काम करने वाले जगदीश प्रजापति इन दिनों अपने गाँव में मनरेगा में काम कर रहे। फोटो : गाँव कनेक्शन

बॉलीवुड की फ़िल्मी दुनिया में लॉकडाउन के तीन महीनों बाद भी 'लाइट, कैमरा, एक्शन' का काम लगभग बंद है। कुछ एक टीवी सीरियल की शूटिंग लम्बे समय बाद शुरू हुई हैं, मगर वो भी कड़ी शर्तों के साथ। कोरोना मरीजों के मामले बढ़ने के साथ हॉटस्पॉट बने मुंबई में अभी भी फिल्म इंडस्ट्री का काम पटरी पर नहीं लौट सका है। ऐसे में इसका सीधा असर उन हजारों मजदूरों पर पड़ा है जो इस फ़िल्मी दुनिया में सालों से काम करते आये हैं।

बॉलीवुड के सितारों के साथ काम करने वाले स्पॉट बॉय, प्रोडक्शन बॉय, पर्सनल बॉय जैसे फ़िल्मी दुनिया के मजदूरों में कई लॉकडाउन में ही और प्रवासी मजदूरों की तरह अपने गांवों को लौट आये तो कई मुंबई में ही फँसे रह गए हैं।

तीन महीनों बाद भी काम न मिलने पर ये मजदूर पैसों और राशन की कमी से अभी भी जूझ रहे हैं। जो अपने गांवों को लौट आये, वो अपने परिवार का पेट पालने के लिए या तो अब मनरेगा में काम कर रहे हैं या तो खेती करने के लिए मजबूर नजर आते हैं।

"क्या करते, कोई काम नहीं था और बिना काम के कब तक रह पाता मुंबई में, इसलिए मजबूरी में गाँव वापस आ गया, ट्रक से किसी तरह वापस लौटा, इस उम्मीद से कि घर पर ही कुछ किया जाएगा, मगर यहाँ भी कोई काम नहीं है, खाली बैठे हैं, तो गाँव में जो थोड़ी जमीन है मजबूरी में उसी में ही मकई (मक्का) लगाया है," मुंबई से झारखण्ड के गिरिडीह जिले के डुमरी प्रखंड में अपने गाँव खाकीखुर्द लौटे मो. इस्राइल अंसारी बताते हैं।

फिल्म इंडस्ट्री में बालाजी प्रोडक्शन के साथ प्रोडक्शन बॉय के तौर पर काम करते थे मो. इस्राइल, काम न मिलने से आज झारखण्ड में अपने गाँव में कर रहे खेती।

इस्राइल बालाजी प्रोडक्शन के साथ पिछले पांच सालों से प्रोडक्शन बॉय के तौर पर काम कर रहे हैं। इस्राइल बताते हैं, "हम लोगों को भी हर दिन के हिसाब से काम का पैसा मिलता है तो खर्चा चलाते हैं, जब हाथ में कुछ पैसा नहीं बचा तो मेरे जैसे कई साथी भी अपने गाँव को चले आये, क्या करते, अभी तो शूटिंग कब शुरू होगी यह भी नहीं पता, शुरू भी हो जाए तो लोकल ट्रेन चले बिना भी काम नहीं चलेगा, तीन महीनों से कोई काम नहीं है, आगे का क्या होगा, यह भी नहीं पता।"

तीन महीनों बाद फिल्म इंडस्ट्री में कुछ जगह शिफ्ट में काम शुरू हुआ है, मगर सख्त शर्तों के साथ। दस साल तक के बच्चों और 60 साल तक के बुजुर्गों का शूटिंग के दौरान आने पर प्रतिबन्ध है। इसके अलावा कोरोना संक्रमण के बढ़ते खतरे को देखते हुए कम लोगों में ही काम शुरू किया गया है।

इस्राइल की तरह फ़िल्मी दुनिया में स्पॉट बॉय का काम करने वाले जगदीश प्रजापति भी (45 वर्ष) लॉकडाउन के दौरान अप्रैल महीने में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में अपने गाँव हरिहरपुर लौट आये। ट्रक से 4500 रुपए का किराया खर्च कर लौटे जगदीश करीब 20 सालों से बॉलीवुड से जुड़े हुए हैं।

जगदीश बताते हैं, "कभी सोचा नहीं था कि गाँव में आकर काम करना पड़ेगा, मुंबई में ही रहता था, कभी कभार गाँव भी आ जाता था, मगर अब तो पैसे के लिए मनरेगा में भी काम करना पड़ रहा है। इतने दिनों में जो पैसा था वो भी खर्च हो गया, मनरेगा में काम किया तो छह दिन काम का 1000 रुपया मिला। और भला गाँव में क्या काम मिलेगा।"

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फ़िल्मी दुनिया में स्पॉट बॉय का काम करने वाले जगदीश प्रजापति भी लॉकडाउन में गाँव लौट आये, इन दिनों मनरेगा में कर रहे काम।

"खेती-बाड़ी कुछ है नहीं अपने पास, पांच बच्चे हैं, उनको पढ़ाना-लिखाना, परिवार का पेट पालना, सभी कुछ देखना पड़ता है, तो खाली बैठना भी मुश्किल है। गाँव में कम से कम सरकारी राशन मिला, इधर-उधर से भी थोड़ा बहुत अनाज मिल जाता है तो कम से कम खाने को तो है, अभी तो ऐसा समय चल रहा है पता नहीं कब सब सही होगा," जगदीश कहते हैं।

बॉलीवुड में काम करने वाले इन मजदूरों की एक यूनियन भी है, फिल्म स्टूडियोज सेटिंग एंड अलाइड मजदूर यूनियन। इस यूनियन में बॉलीवुड में काम करने वाले ऐसे 45,000 से ज्यादा मजदूर इस यूनियन से जुड़े हुए हैं। इस फिल्म स्टूडियो यूनियन को एशिया की सबसे बड़ी यूनियन कहा जाता है।

लॉकडाउन की शुरुवात में इन मजदूरों के लिए यूनियन की ओर से राशन-पानी की खरीदारी के लिए 1500 रुपए के स्मार्ट कार्ड के साथ 3,000 रुपए मजदूरों के बैंक अकाउंट में भी देकर आर्थिक मदद पहुंचाई गयी। मगर लॉकडाउन के बढ़ने के साथ इन मजदूरों के लिए यह मदद नाकाफी साबित हुई।

मुंबई में जुहू के पास कोलीवाड़ा क्षेत्र में रहने वाले आशीष सागवेकर पिछले 10 सालों से फ़िल्मी दुनिया से जुड़े हैं। आशीष बताते हैं, "यूनियन से हमें भी कार्ड और पैसे मिले थे, मगर कितने दिन चलते। मेरे साथ कमरे में चार और साथी रहते थे, वो भी लॉकडाउन में अपने घर चले गए। अकेला मैं यहाँ बचा हूँ। इतने समय से कमरे का भाड़ा भी नहीं दिया है।"

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लॉकडाउन के दौरान अपने गाँव नहीं लौट पाए आशीष सागवेकर, मुंबई में अभी भी काम न मिलने से मुश्किल में हैं आशीष। फाइल फोटो

मूल रूप से महाराष्ट्र के संगमेश्वर तहसील में रत्नागिरी गाँव के आशीष कहते हैं, "जो कभी नहीं खाया जीवन में, वो खाकर गुजारा चलाया। यहाँ हर दिन एक गाड़ी आती है खाना देने के लिए, अगर एक दिन भी वो गाड़ी नहीं आई तो भूखे पेट भी सोना पड़ा है, पहले जो कमाता था तो गाँव भी 20-25 हजार भेज दिया करता था, मगर अब सब उधारी हो गयी है, सिर्फ 670 रुपए पड़े हैं जेब में, 50,000 रुपए का कर्जा भी है तो गाँव कैसे जाता, अगर काम नहीं मिला तो कैसे क्या करूँगा।"

सिर्फ आशीष ही नहीं, उनके जैसे कई मजदूर हैं जिन पर लॉकडाउन में काम बंद होने से तीन महीनों बाद अब बड़ा कर्जा उन पर है। जो मजबूरी में अपने गाँव या घर नहीं लौट सके और लॉकडाउन के समय मुंबई में रहने को मजबूर हुए।

कर्नाटक की सीमा से जुड़ा महाराष्ट्र का अंतिम गाँव सोलापुर के रहने वाले राहुल खडतरे भी मुंबई में रहकर छह सालों में बॉलीवुड में सेटिंग बॉय के तौर पर काम कर रहे हैं। लॉकडाउन के समय में वह भी अपने गाँव नहीं जा सके और मुंबई में ही अपनी पत्नी के साथ रहने को मजबूर हुए।

राहुल बताते हैं, "जो सेविंग (बचत) की थी, सब खत्म हो गया, कमरे का भाड़ा और राशन की दुकान से सब मिलाकर 25,000 रुपए से ज्यादा उधार हो चुका है। मकान मालिक किराया न देने पर बाद में किराये के साथ ब्याज भी मांगता है, क्या करता मजबूरी थी, गाँव में माता-पिता से किसी तरह पांच टके (प्रतिशत) कर्जे पर 25,000 रुपया मंगाया।"

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फिल्म एक्टर सुशांत सिंह के साथ स्पॉट बॉय राहुल खड़तारे। फाइल फोटो

"बहुत लोग बोले कि मदद करेंगे, राशन की किट देंगे, मगर हमें तो फिल्म इंडस्ट्री से भी कोई मदद नहीं मिली, कोई नहीं आया, हमको तो सिर्फ दो वक़्त के राशन की जरूरत है, ऐसा नहीं है कि मदद के नाम पर हमें पैसा चाहिए, ऐसा कुछ भी नहीं है," राहुल कहते हैं।

जो लॉकडाउन में ही अपने गाँव, अपने घर लौटकर आ गए, उनके सामने भी मुंबई वापस जाने और वहां दोबारा काम शुरू करने की चुनौती है। ऐसे मजदूरों पर भी तीन महीनों से कोई काम न होने से अब कर्जे का भार है।

फिल्म इंडस्ट्री में स्पॉट बॉय के तौर पर वर्ष 2003 से काम कर रहे रमाकांत सहाय भी लॉकडाउन की शुरुवात में ओडिशा के बालेश्वर जिले में अपने गाँव डिगीमौर वापस अपने माँ-बाप और बीवी-बच्चों के पास लौट आये थे।

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रमाकांत सहाय भी लॉकडाउन में ओडिशा के बालेश्वर जिले में अपने गाँव लौट आये, स्पॉट बॉय के तौर पर टीवी सीरियल में करते थे काम।

रमाकांत फ़ोन पर बताते हैं, "गाँव में मेरी दो बेटियां भी हैं, लॉकडाउन बढ़ने लगा तो गाँव आ गया, मेरा गाँव पहाड़ी क्षेत्र में है तो अपना एक छोटा सा खेत भी है जहाँ सब्जी वगैरह उगा लेते हैं, गाँव में काम तो कोई मिला नहीं, बस खेत में ही थोड़ा काम किया। कम से कम यहाँ आकर सरकारी राशन तो मिला।"

"पिछली साल बारिश में घर को काफी नुकसान हो गया था, कर्जा लेकर दोबारा घर बनवाया था, अभी भी पांच-छह हजार बाकी है, मुंबई में अँधेरी में रहता था तो वहां का भी तीन महीनों का भाड़ा देना है, कुल मिलाकर 20,000 रुपए से ऊपर उधारी पर हूँ, फिर बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, सब देखना है, उम्मीद है कि जल्द शूटिंग शुरू हो तो वापस काम मिले," रमाकांत बताते हैं।

फिलहाल फ़िल्मी दुनिया से जुड़े ये मजदूर लॉकडाउन में तीन महीनों बाद भी काम न मिलने से बुरी तरह परेशान हैं। इन मजदूरों को आस है कि जल्द ही फिल्मों और टीवी सीरियल की शूटिंग आम दिनों की तरह पटरी पर लौट सकेगी और उन्हें काम मिलेगा।

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