महाराष्ट्र: दो साल बाद भी बस रेंग रही है स्टैंड अप इंडिया योजना

स्टैंड अप इंडिया शुरू हुए दो वर्ष से ज्यादा समय बीत चुका है, यह योजना महाराष्ट्र में नाकाम साबित हुई है। महाराष्ट्र की स्टेट लेवल बैंकर कमिटी (एसएलबीसी) की ताजा रिपोर्ट में पाया गया है कि 5 अप्रैल 2016 को इस योजना के शुरू होने के बाद से लक्ष्य का केवल 14 प्रतिशत तक ही हासिल हो पाया है।

महाराष्ट्र: दो साल बाद भी बस रेंग रही है स्टैंड अप इंडिया योजना

पार्थ एम. एन.,

अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टैंड अप इंडिया नाम की एक योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद था महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों को बैंक लोन मुहैया कराना। योजना के तहत हर बैंक शाखा को कम से कम एक महिला, एक अनुसूचित जाति के सदस्य और एक अनुसूचित जन जाति के सदस्य को किसी नई परियोजना की स्थापना के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपए तक का लोन देना था।

स्टैंड अप इंडिया शुरू हुए दो वर्ष से ज्यादा समय बीत चुका है, यह योजना महाराष्ट्र में नाकाम साबित हुई है। महाराष्ट्र की स्टेट लेवल बैंकर कमिटी (एसएलबीसी) की ताजा रिपोर्ट में पाया गया है कि 5 अप्रैल 2016 को इस योजना के शुरू होने के बाद से लक्ष्य का केवल 14 प्रतिशत तक ही हासिल हो पाया है। योजना का लक्ष्य था 20 अप्रैल 2018 तक 22890 लोगों को ऋण बांटना, लेकिन केवल 3203 लाभार्थियों को लोन बांटा जा सका। कुल वितरित राशि 54,215 लाख रुपये या 16.9 2 लाख प्रति व्यक्ति है।

औरंगाबाद की रहने वाली पल्लवी बंदगार ने जब इस योजना के बारे सुना तो उन्हें लगा कि यह घर पर बने अपने मसालों के व्यवसाय का विस्तार करने का अच्छा मौका है। पल्लवी कहती हैं, "मैंने मार्च 2017 में आवेदन किया था और फरवरी 2018 में मुझे लोन मिल पाया। इसके लिए मुझे बहुत भागदौड़ करनी पड़ी। करीब 20 तरह के फॉर्म भरे, इनकम टैक्स रिटर्न्स, कस्टमर लिस्ट और जरूरी मशीनरी के विवरण समेत ढेरों आवश्यक दस्तावेज जमा किए।"

पल्लवी के पति अशोक ने बताया कि सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बावजूद बैंक ऑफ महाराष्ट्र गोलमोल जवाब देता रहा। उन्होंने कहा, "मुझे बैंक अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस समय बैंक के पास बजट नहीं है।"

आखिरकार जब लोन को मंजूरी मिली तो पल्लवी ने पाया कि जितना उन्होंने मांगा था यह तो उससे काफी कम था। पल्लवी का कहना था, "मैंने 50 लाख रुपयों के लोन के लिए आवेदन किया था लेकिन मुझे सिर्फ 25 लाख रुपए मिले साथ ही 7 लाख रुपयों का कैश क्रेडिट मिला। मैं बैंक से कैश क्रेडिट बढ़ाकर 10 लाख रुपए करने का अनुरोध कर रही हूं पर बैंक का कहना है कि यह तभी मुमकिन है जब मेरा टर्नओवर 40 लाख हो। अगर मेरा व्यवसाय 40 लाख का होता तो मुझे मदद की जरूरत ही क्यों पड़ती?"

जब राज्य के अधिकारियों से योजना के बारे में सवाल पूछे गए और इसकी नाकामी की खबरों के बारे में जानने की कोशिश की गई तो उनसे कोई जवाब नहीं मिला। विकास आयुक्त, उद्योग हर्षदीप कांबले का कहना था, इस बारे सही जानकारी महाराष्ट्र स्टेट इनोवेशन सोसायटी के सीईओ ई. रविंद्रन दे पाएंगे। लेकिन रविंद्रन ने लेखक को अतिरिक्त मुख्य सचिव, उद्योग सतीश गवई से संपर्क करने को कहा। गवई का कहना था कि इस मामले में बात करने के लिए सही व्यक्ति कांबले हैं क्योंकि, "उनकी इस मुद्दे पर अच्छी पकड़ है।" कांबले ने कहा, "मैं जरूरी जानकारी जुटाकर आपसे संपर्क करूंगा।" लेकिन इसके बाद से कांबले फोन का जवाब नहीं दे रहे हैं।

महाराष्ट्र में अनुसूची जनजाति की आबादी 14 प्रतिशत से अधिक है। मध्य प्रदेश और उड़ीसा के बाद इस मामले में महाराष्ट्र का तीसरा स्थान है। महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजातियों में से 60 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं- जो राष्ट्रीय औसत 45 प्रतिशत से काफी ज्यादा है।

आदिवासी बहुल गढ़चिरौली जिले का लक्ष्य था कि स्टैंड अप इंडिया योजना के तहत 130 लाभार्थियों को लोन मुहैया कराया जाए। लेकिन यहां केवल 8 लोगों को लोन मिल पाया है। दूसरे आदिवासी जिलों नंदुरबार, नासिक और पालघर में यह लक्ष्य क्रमश: 154, 478 और 776 था। लेकिन यहां क्रमश: 4,9 और 70 लाभार्थियों को ही लोन मिल सका।

महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में दलित भी हैं- राज्य की 12 प्रतिशत आबादी दलित है। अकोला, लातूर, वाशिम और नांदेड़ जैसे अनुसूचित जाति की आबादी के उच्चतम अनुपात वाले जिलों में क्रमशः 2 9 8, 344, 152 और 390 के लक्ष्य थे। लेकिन यहां क्रमश: 32, 37, 9, और 27 लाभार्थियों को ऋण वितरित किए गए।

योजना की शुरूआत के समय मोदी ने कहा था कि इससे दलितों और आदिवासियों की जिंदगी बदल जाएगी। उनके शब्दों में, इस योजना का लक्ष्य है, "रोजगार की तलाश करने वालों को रोजगार देने वाला बनाया जाए।" इस योजना का मकसद था बढ़ती बेरोजगारी के दबाव को कम करना।

अनुसूचित जनजाति और दलित जनसंख्या बहुल जिलों में बहुत खराब प्रदर्शन रहा। सबसे अच्छा प्रदर्शन उन दो इलाकों का रहा जो सबसे अधिक विकसित हैं: मुंबई शहर और पुणे। यहां क्रमश: 764 और 499 लाभार्थियों को लोन देकर लक्ष्य पूरा कर लिया गया।

एसएलबीसी ने अपनी सूची में उन बैंकों का उल्लेख किया है जिन्होंने स्टैंड अप इंडिया के तहत ऋण वितरित किया, ये सभी राष्ट्रीयकृत बैंक हैं। लातूर जिले के जिला सहकारी बैंक के एमडी जाधव का कहना था, "महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में इस योजना के खराब प्रदर्शन की वजह यह है कि जिला सहकारी बैंकों और ग्रामीण बैंकों को नाबार्ड की ओर से इस योजना को लागू करने के निर्देश नहीं मिले हैं, जबकि पारंपरिक रूप से लोग इन्हीं बैंकों में अपने खाते खुलवाते आ रहे हैं।"

यह भी देखें: जानिए क्या है स्टैंड अप इंडिया योजना, लोन के लिए ऐसे करें अप्लाई

उस्मानाबाद जिला सहकारी बैंक के डिप्टी जनरल मैनेजर, वी.बी. चांडक का कहना है, "इन बैंकों के पास लोन बांटने लायक पूंजी ही नहीं है। दो चीनी मिलों पर हमारे 450 करोड़ रुपए उधार हैं। जब तक हम उसे वसूल नहीं लेते तब तक हम कुछ खास कर नहीं पाएंगे। हमारे एनपीए (गैर निष्पादित संपत्ति) पिछले साल के 35 प्रतिशत बढ़कर 54 प्रतिशत तक हो गए हैं। महाराष्ट्र में लगभग सभी जिला सहकारी बैंक संघर्ष कर रहे हैं।"

अखिल भारतीय कर्मचारी बैंक एसोसिएशन के संयुक्त सचिव देवदास तुलजापुरकर स्टैंड अप इंडिया योजना की विफलता से जरा भी हैरान नहीं हैं। वह कहते हैं, "आप देखेंगे तो पाएंगे कि सरकार की हर योजना के कार्यान्वयन के केंद्र में बैंक हैं। चाहे वह विमुद्रीकरण हो, जीएसटी, स्टैंड अप इंडिया, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना या कोई और। ये सभी प्रभावी निष्पादन के लिए ठोस बैंकिंग आधारभूत संरचना पर निर्भर हैं। लेकिन साथ ही, बैंकों का विस्तार नहीं हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में बहुत कम बैँक हैं और दूर-दूर स्थित हैं। जो काम कर रहे हैं उनमें स्टाफ और बुनियादी ढांचे की कमी है। एक तरफ सरकार बैंकों पर काम का बोझ लादती जा रही है वहीं दूसरी तरफ उनके बुनियादी ढांचे के विकास की उपेक्षा कर रही है।"

2010 में, तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वित्तीय समावेशन की अपनी योजना का जिक्र किया था। इसमें उन्होंने 2000 और उससे अधिक की आबादी वाले प्रत्येक गांव में बैंक शाखा खोलने का अपना इरादा जताया था।

लेकिन एसएलबीसी की रिपोर्ट, जिसमें महाराष्ट्र में बैंकों की शाखाओं के नेटवर्क के आंकड़े हैं काफी निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि राज्य के कुछ पिछड़े इलाकों में बैंकिंग सुविधाओं की पहुंच तक नहीं है इसलिए जो शाखाएं हैं उनमें बहुत भीड़ है। उदाहरण के लिए, नंदुरबार में बैंक की प्रत्येक शाखा में औसतन 21406 लोगों के खाते हैं। नांदेड़, पालघर, वाशिम में यह संख्या क्रमश: 11394, 11913 और 15752 है।

हालात इसलिए और खराब हैं क्योंकि, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में खुली 6028 बैंक शाखाओं में 2772 जिला सहकारी बैंक और 471 ग्रामीण बैंक हैं। तुलजापुरकर कहते हैं, "दोनों ही कई कारणों से वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं। वे दूसरों को खड़े होने में क्या मदद करेंगे जब वे खुद अपने पैरों पर खड़े रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं? इसलिए इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी ग्रामीण इलाकों में बचीखुची 2500 शाखाओं पर आ जाती है।"

(पार्थ एम.एन. लॉस एंजिल्स टाइम्स के विशेष संवाददाता हैं। उनके लेख प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित होते रहते हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)


Share it
Share it
Share it
Top