"पिछली योजनाओं से मिले सबक दिलाएंगे आयुष्मान भारत को कामयाबी"

राज्य स्तर पर चलने वाली यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज योजनाओं के ढेरों ऐसे सबक हैं जिनका लाभ आयुष्मान भारत योजना में उठाया जा सकता है। सितंबर में आयुष्मान भारत योजना की शुरूआत होने वाली है। करुणा ट्रस्ट और विवेकानंद गिरिजन कल्याण केंद्र के संस्थापक पदमश्री डॉ. एच. सुदर्शन से एक बातचीत।

पिछली योजनाओं से मिले सबक दिलाएंगे आयुष्मान भारत को कामयाबी

करुणा ट्रस्ट और विवेकानंद गिरिजन कल्याण केंद्र के संस्थापक पदमश्री डॉ. एच. सुदर्शन ने कर्नाटक के स्वास्थ्य तंत्र को सुधारने में अहम भूमिका निभाई है। उनके जीवन का शुरूआती समय आदिवासी समुदायों के साथ काम करने में बीता, इसके बाद डॉ सुदर्शन ने पूरे भारत में कई राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका के क्षेत्र में काम किया है। सुवर्ण आरोग्य स्वास्थ्य ट्रस्ट (एसएएसटी) के संस्थापक-ट्रस्टी के रूप में उनके पास कर्नाटक के लोगों को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का स्वरूप निर्धारित करने और उसके क्रियान्वयन का कई वर्षों का अनुभव है। डॉ. सुदर्शन से इंडिया डेवेलपमेंट रिव्यू की डायरेक्टर रचिता वोरा और सीईओ स्मरिणिता शेट्टी ने आयुष्मान भारत पर बातचीत की।


आप हेल्थ इंश्योरेंस की जगह हेल्थ एश्योरेंस के बड़े समर्थक रहे हैं। क्या आप इस पर कुछ और प्रकाश डालेंगे?

भारत जैसे देश में जहां हमारी जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है, हमें हेल्थ एश्योरेंस की जरूरत है न कि हेल्थ इंश्योरेंस की। हेल्थ एश्योरेंस का मतलब है कि एक सरकारी या अर्द्ध-सरकारी निकाय हेल्थ कवरेज की प्रक्रिया (इसके तहत फंड की व्यवस्था करना, डॉक्टरों को सूचीबद्ध करना और दावों का निपटारा करना शामिल है) की देखरेख करे ताकि इस योजना के तहत सभी नागरिक आ जाएं।

हेल्थ एश्योरेंस का यह मॉडल यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज कहलाता है, इसी को हम कर्नाटक में इस्तेमाल कर चुके हैं। वाजपेयी आरोग्यश्री योजना के रूप में हमने इसकी शुरूआत की थी और आज राज्य के लगभग 6.5 करोड़ नागरिकों को इसके जरिए सुरक्षा मिली हुई है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए चलाई गई थी। इसी के क्रियान्वयन के लिए सुवर्ण आरोग्य सुरक्षा ट्रस्ट या एसएएसटी की स्थापना की गई।

एसएएसटी की स्थापना के समय हमने राजीव आरोग्यश्री योजना की नाकामी से मिले अनुभवों को ध्यान में रखा था। राजीव आरोग्यश्री योजना 2008 में आंध्र प्रदेश में लागू की गई थी। आरोग्यश्री में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को इतना सक्षम बनाया गया था ताकि वे सरकारी और निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज करवा सकें। मुझे लगता है कि कर्नाटक में हमारे अनुभवों का लाभ आयुष्मान भारत को लागू करते समय उठाया जा सकता है।

एसएएसटी के आपके अनुभव के आधार पर वे कौन सी बातें हैं जिन पर आयुष्मान भारत के क्रियान्वयन के समय राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए?


1. महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को ही प्राथमिकता दें

शुरूआती दिनों में आरोग्यश्री योजना में 1200 से ज्यादा प्रक्रियाओं को कवर किया गया था। इसमें कॉक्लियर इयर ट्रांसप्लांट जैसा महंगा इलाज भी शामिल था जिसकी कीमत प्रति ऑपरेशन 6 से 8 लाख रुपए तक पड़ती है।

प्रक्रियाओं की संख्या भी ज्यादा थी और इनकी कीमत भी, इसलिए यह आंध्र प्रदेश सरकार के लिए घाटे की योजना साबित होने लगी। इस योजना के लिए सालाना बजट 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का था जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार को ही वहन करना था।

इससे सीख लेते हुए हमने कर्नाटक में सिर्फ 450 सबसे जरूरी प्रक्रियाओं को ही शामिल किया। हमने 200 करोड़ रुपयों के बजट से शुरूआत की। राज्य इतना वित्तीय बोझ उठा सकता था। कुछ समय बाद यह बजट बढ़कर 600 करोड़ रुपए हो गया। इस साल हमारा कुल सालाना बजट 1,000 करोड़ रूपए का है। अगर आयुष्मान भारत चलाया जाएगा तो केंद्र सरकार की ओर से ज्यादा भागीदारी होगी।

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2. धोखाधड़ी को लेकर सतर्क रहें और जरूरी नियंत्रण बनाए रखें

अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों, दोनों जगह धोखे की आशंका है। 2002 से 2005 तक मैं कर्नाटक लोकायुक्त के दफ्तर में सतर्ककता निदेशक था। उस समय मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव मिल चुका है। इनमें से कुछ फर्जी दावे थे, दावों के निपटारों के दौरान रिश्वत की लेनदेन के भी मामले थे और इंश्योरेंस प्लान होते हुए हॉस्पिटलों द्वारा मरीजों से पैसे वसूलने के उदाहरण भी।

अस्पताल के स्तर पर फर्जीवाड़ा रोकने के लिए एसएएसटी में सभी दावों का निपटारा पैसों के इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के जरिए किया गया। ऐसे में कमिशन और रिश्वत का तो सवाल ही नहीं उठता।

एसएएसटी और अब आयुषमान भारत को पूरी तरह से नकद रहित योजनाएं माना जाता है- मतलब इसमें कवर किए गए मरीजों को कुछ भी नगद भुगतान करने की आवश्यकता नहीं होती है। हालांकि कुछ अस्पताल अभी भी कुछ रोगियों से पैसे ले लेते हैं, जबकि उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं है।

जिन राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना कार्यक्रम इंश्योरेंस कंपनियों के जरिए चलाए जा रहे हैं वहां प्रीमियम राज्य सरकारें भरती हैं। एक टेंडर के जरिए इंश्योरेंस कंपनी का चुनाव होता है। ये कंपनियों कितनी ही ताकतवर क्यों न हों, चुनाव के दौरान या फिर क्रियान्वयन के दौरान भ्रष्टाचार या फर्जीवाड़े की आशंका बनी रहती है।


3. यह सुनिश्चित किया जाए कि दावों का निपटारा समय से हो

हमने देखा था कि कुछ निजी अस्पताल और कई सरकारी अस्पताल योजना के अंदर आने वाले मरीजों के क्लेम का भुगतान समय पर नहीं कर रहे थे। एसएएसटी में हमने ऐसे अस्पतालों पर पेनल्टी लगाई और उनसे जुर्माना वसूला। इससे लोगों में यह संदेश गया कि हमारे लिए दावों का समय पर निपटारा कितना अहम है। इससे अस्पतालों और मरीजों दोनों को सुविधा हुई। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अधिक से अधिक लोग इस सुविधा का लाभ उठा सकें।

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4. गैर जरूरी कागजी कार्यवाही खत्म की जाए

जब एसएएसटी ने गरीबी रेखा से नीचे रह रहे गरीबों को इस योजना में शामिल करने के लिए प्रोग्राम चलाया तो हमने यह सुनिश्चित किया कि इंश्योरेंस के लिए एक और कार्ड बनाने की जगह वे केवल अपना बीपीएल कार्ड का ही इस्तेमाल करें।

इसके नतीजे अच्छे रहे क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति जैसे समाज के दबेकुचले वर्ग के लोगों को इस सुविधा का लाभ मिल पाया। समय के साथ इन लोगों की संख्या भी बढ़ी। कर्नाटक में 60 फीसदी जनता गरीबी रेखा से नीचे रहती है।

5. इंश्योरेंस कंपनियों के साथ साझेदारी नहीं करनी चाहिए

केंद्र सरकार का कहना है कि चूंकि अधिकांश राज्यों के पास एसएएसटी जैसी ट्रस्ट चलाने की आवश्यक जानकारी नहीं है ऐसे में उन्हें इंश्योरेंस कंपनियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। लेकिन मैं यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज योजना में इंश्योरेंस कंपनियों को शामिल करने के पक्ष में नहीं हूं।

अधिकांश राज्य सरकारों के पास इतने अधिकार नहीं है कि वे बीमा कंपनियों के साथ अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकें। असल में बीमा कंपनियों का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि राज्य सरकारें उनसे सस्ती प्रीमियम दरों और दावों के जल्द निपटारे जैसे मुद्दों पर मनमुताबिक समझौते नहीं करवा सकतीं।

मुझे पूरी तरह से भरोसा है कि केवल राजस्व और मुनाफे की परवाह करने वाली बीमा कंपनियों की तुलना में अर्ध सरकारी निकायों के साथ काम करना ज्यादा बेहतर है। इसलिए मैं राज्य सरकारों से अपील करूंगा कि वे आयुष्मान भारत योजना के कार्यान्वयन के लिए बीमा कंपनियों को अपना पैसा देने की जगह एसएएसटी जैसे स्वतंत्र ट्रस्ट विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करें, जिनका मकसद सभी को बीमा कवरेज मुहैया कराना हो। भले ही इस वजह से योजना लॉन्च करने में छह महीने या साल भर की देरी हो जाए।

अगर इस तरह के ट्रस्ट की स्थापना संभव नहीं है तो राज्य सरकार के अधिकारियों को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाए कि वे समझ सकें कि बीमा कंपनियों किस तरह काम करती हैं और उनसे अपनी शर्तों पर किस तरह से समझौता किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित हो पाएगा कि बीमा कंपनियां सरकार का पैसा नहीं ऐंठ सकें।

बीमा कंपनियों के साथ एक और समस्या है कि वे हेल्थकेयर मुहैया कराने वाले अस्पतालों के दावों का निपटारा करने में आनाकानी करती हैं। असल में क्लेम कम होने पर उनका मुनाफा बढ़ता है, इसलिए यह देखना अहम है कि ये कंपनियां इस तरह कितना पैसा बचाती हैं। यदि वे बहुत अधिक पैसा बचा रही हैं तो सरकारों को अधिकार होना चाहिए कि वे प्रीमियम दरें कम कर सकें।

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यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के संदर्भ में कर्नाटक की क्या स्थिति है?

मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि एसएएसटी लगभग यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के स्तर तक पहुंच चुका है। कर्नाटक की पूरी जनता (लगभग 6.5 करोड़ लोग) एसएएसटी योजना के तहत आ जाएगी। संभवतः उन पेशेवरों को छोड़कर जिनका उनके नियोक्ताओं ने निजी बीमा करा रखा है।

14 बरस पहले करुणा ट्रस्ट ने सामुदायिक स्वास्थ्य बीमा के रूप में एक छोटी सी पहल की थी जो आज राज्य सरकार के लिए एसएएसटी योजना के रूप में विकसित होकर सामने आई है। हालांकि हमने तब सोचा नहीं था लेकिन आज यह एक अखिल भारतीय परियोजना को लागू करने के लिए मानक बनी है।

(यह बातचीत India Development Review में प्रकाशित हो चुकी है।)

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