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कैसी है उस बच्ची की जिंदगी जो 12 साल की उम्र में रेप के बाद मां बनी थी?

रेप के बाद पीड़िताओं की जिंदगी को समझने के लिए गाँव कनेक्शन ने एक विशेष सीरीज शुरू की है जिसका नाम है 'बलात्कार के बाद'...इस सीरीज में हम आपको बलात्कार पीड़िताओं की अनकही कहानियों से रूबरू करायेंगे। पढ़िए पहला भाग...

Neetu SinghNeetu Singh   1 Nov 2019 1:00 PM GMT

"मैं स्कूल जाना चाहती हूँ पढ़ना चाहती हूं सहेलियों के साथ खेलना चाहती हूँ। घर से बाहर निकलने का बहुत मन करता है। पर बाहर निकलने में डर लगता है सब लोग सवाल पूछेंगे। उस दिन क्या हुआ था? कहाँ गया तुम्हारा बच्चा?" ये बताते हुए 14 साल की नेहा (बदला हुआ नाम) का गला भर आया, आंसू छिपाने के लिए उसने अपना मुंह दुपट्टे में छिपा लिया।

तारीख थी 30 दिसंबर 2017, उस वक्त नेहा की उम्र महज 12 साल थी, उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इस बच्ची ने एक बेटे को जन्म दिया था। लखनऊ के ग्रामीण इलाके की रहने वाली नेहा जब एक दोपहर गांव में लगी पानी की टंकी से पानी भरने गई थी, उसी दौरान पड़ोस के एक लड़के ने शौचालय में ले जाकर उसका रेप किया था।


आरोपी ने धमकी दी थी कि किसी को बताना मत। डर की वजह से 4 महीने तक नेहा ने अपने साथ हुई दरिंदगी के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। तबियत बिगड़ने पर मां को पता चला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नेहा जिसकी हाथ में खिलौने होने चाहिए थे, वो खुद खिलौना बन कर रह गई। इस घटना के चार महीने बाद से नेहा ने अस्पताल, कोर्ट, थाने और सुधारग्रह के अलावा बाहर की दुनिया नहीं देखी। नेहा घटना के समय चौथी कक्षा में पढ़ती थी लेकिन अब उसकी पढ़ाई बंद हो गयी है।

नेहा का परिवार जिस घर में रहता है, गरीबी की भी आंखों में पानी होता तो शायद वो भी शर्मसार हो जाती। घर में ईंटों के सहारे लगे तख्त पर बैठी नेहा रुंधे गले से बोली, "घर में शौचालय नहीं बना है, उजाला होने से पहले सुबह और अंधेरा होने पर रात में खेतों में जाती हूं। जहाँ से भी निकलती हूँ लोग अभी भी मुझे अजीब नजरों से घूरते हैं जो मुझे अच्छा नहीं लगता है। लोग आपस में कानाफूसी करते हैं। हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि हम यहाँ से दूसरी जगह जाकर किराए पर रह सकें। इसलिए इसी घर में घुटघुट कर रहती हूँ।"

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अपने जर्जर घर में कपड़े ठीक करती नेहा

नेहा तीन भाईयों के बीच अकेली बहन है। जब वो बहुत छोटी थी तब उसके पापा की मौत हो गई थी। माँ 10-11 सालों से मजदूरी करके बच्चों का पेट भर रह थीं, लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने मजदूरी करनी छोड़ दी। अब उसके दो भाई बाहर कमाने गए हैं, उनके पैसों से गुजर होती है।

नेहा का घर उसके लिए अघोषित कैदखाना है। न कोई सहेली है, न कोई खेल, स्कूल कबका छूट चुका है। केस या फिर किसी जरुरी काम से घर से बाहर निकलना होता है तो मां साथ होती है। नेहा की आंखें झुकी रहती हैं, नेहा के मुताबिक उसे हमेशा डर रहता है कोई फिर कुछ न पूछने लगे। बाहर के लोग जख्म कुरेदते हैं, अपनों की उपेक्षा उसे और निराश करती है। अपने भाईयों की चहेती नेहा को इस बात का भी मलाल है कि उसके बड़े भाई ने उससे इस घटना के बाद से बात करना बंद कर दिया है।

बतौर रिपोर्टर मैं नेहा को इसी केस के दौरान से जान रही हूं, इस बच्ची से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ के लोहिया अस्पताल में महिला वार्ड में हुई थी। वो स्कूल की खाकी रंग की ड्रेस पहने थी। उसकी डिलीवरी होने तक मैं वहीं रूकी थी... लेबर रूप में उसकी चीखें रह-रहकर बाहर तक आ रही थीं...जो मुझसे बर्दास्त नहीं हो पा रही थीं। सिर्फ 12 साल की बच्ची...जिसके हाथ में खिलौने होने चाहिए थे, किताबें होनी चाहिए थी...वो 12 साल की बच्ची ख़ुद किसी के हाथ का खिलौना बनकर रह गई थी।

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माँ के साथ घर में बैठी नेहा

पुराने जर्जर पड़े मकान में नेहा का पूरा परिवार रहता है। दो छोटे कमरों के घर में गिनती के दो चार बर्तन हैं। एक कमरे में चूहों ने मिट्टी का ढेर लगा दिया है इसमें लगी एक डोरी में नेहा के कुछ कपड़े टंगे हैं। दो टूटे हुए तख्त (चौकी) हैं, जिनके भी पावे (पैर) नहीं है, ईंटों के सारे रखा गया है उसी पर नेहा उसकी माँ और छोटा भाई सोता है। दो बड़े भाई बाहर कमाने गये हैं, जिससे परिवार का खर्चा चलता है।

इनके पास न सरकारी आवास है न शौचालय और न ही विधवा मां को पेंशन मिलती है। रेप की घटना से पहले इनके घर में एक भी दरवाजा नहीं था। इस घटना के बाद नेहा की मां जहाँ काम करती थी उन्होंने एक पुराना लकड़ी का दरवाजा दे दिया जिसपर पहले से लिखा था जाना मना है।

नेहा उस दरवाजे की ओट में घंटों खड़ी बाहर इस उम्मीद से निहारती रहती है कि आखिर वो कौन सा दिन होगा जब वो फिर से बाहर निकल सकेगी? अपनी सहेलियों के साथ खेल सकेगी, स्कूल जा सकेगी खुलकर हंस सकेगी। नेहा की माँ ने अपनी गरीबी और जाति को कोसते हुए कहा, "छोटी जाति के हैं ऊपर से इतना बड़ा कलंक लग गया है। गरीबी ऐसी है कि घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकते। लड़का (आरोपी) बेल पर छूटकर आ गया है। उसको सजा कब मिलेगी मुझे पता नहीं और मुझे अब मतलब भी नहीं क्योंकि उसने मेरी बेटी की तो जिंदगी बर्बाद ही कर दी है।"

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चूल्हे पर खाना बनाती नेहा

वो खुद को कोसती हैं, "लोग कहते हैं एक बेटी को नहीं संभाल पाई। कौन करेगा एक बच्चे की माँ से शादी। मुझे पता है मेरी लड़की की कोई गलती नहीं है पर गाँव के लोग तो गरीब और छोटा समझकर हमें ही कोसते हैं।"

नेहा का घर में कैद बचपन, उसकी माँ की बेबसी और उसके घर की गरीबी मुझे तकलीफ दे रही है। आत्मग्लानि महसूस कर रही हूँ कि मैं उसकी इस काल कोठरी से निकलने में कोई मदद नहीं कर पा रही हूँ। न चाहते हुए भी मैंने नेहा से पूछ लिया क्या तुम्हें अपने बच्चे की याद नहीं आती?

मेरे इतना कहते ही वो फफक-फफककर रोने लगी। मुझे कुछ समझ नहीं आया बस उसे गले से लगा लिया। उसने मुझे कसकर पकड़ लिया और देर तक रोती रही। काफी देर बाद शांत हुई तब बताने लगी, "डिलीवरी के तीन दिन तक मेरा बच्चा मेरे साथ में रहा। जब मुझे तीसरे दिन बालिका गृह में रखा गया तब मुझसे मेरा बच्चा ले लिया गया। वहां की लड़कियों ने मुझसे कहा अपने बच्चे को आख़िरी बार और देख लो पर मैंने नहीं देखा। मैं कमरे में बैठकर बहुत देर तक रोती रही।"

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नेहा की माँ

बालिका गृह में बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती तीन महीने रहने के बाद नेहा अपने घर वापस आ गई थी। लेकिन बच्चा सरकारी आश्रय गृह में ही रखा गया था। नेहा के मुताबिक वो अपनी मां के साथ बच्चे को देखने सरकारी आश्रय गृह में गयी थी। मैं चाहती थी एक बार बच्चे को देख लूं, वहां के लोगों से कई बार कहा लेकिन उन्होंने मुझे नहीं दिखाया, मेरी मां को जरुर दिखाया था। मां ने भी समझाया तो मैं फिर कुछ नहीं बोली।"

नेहा के मुताबिक अगस्त में वो दोबारा बच्चे को देखने गई तो कहा गया कि तुम्हारा बच्चा किसी को दे दिया (गोद) गया है।" ये बताते बताते वो फिर सिसक पड़ी।

अपने आंसू पोछते नेहा कहती है, "उस बच्चे को मैं अपने साथ रखना चाहती थी। लेकिन इस घर में मेरा रहना ही मुश्किल है तो उसे कैसे रखती। अब मन करता है कहीं दूर चली जाऊं जहाँ मेरे बारे में किसी को कुछ पता न हो। एक ऐसी जगह जाना चाहती हूँ जहाँ मैं हंसकर रह सकूं, खेल सकूं, पढ़ सकूं और सहेलियाँ बना सकूं।"

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घर से बाहर झांकती नेहा

रेप का आरोपी अभी बेल पर छूटा हुआ है कोर्ट के फैसले का नेहा को इंतजार है। सरकार की तरफ से मिलने वाली तीन लाख रुपए की राशि नेहा के खाते में आ चुकी है, जिसे वह 18 साल की उम्र के बाद निकाल सकती है। लेकिन नेहा के लिए सब बेकार है।

वो कहती है, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बस सब लोग मुझसे बातें करने लगें। कोई मुझसे ये न पूछे उस दिन क्या हुआ था। उस लड़के को ऐसी सजा मिले जिससे वो किसी और के साथ गलत काम न कर पाए।"

नेहा की माँ में बेटी की शादी न होने की छटपटछाहट दिखाई देती है, "मैं जल्दी से जल्दी बेटी की शादी करना चाहती हूं, जिससे ये दूसरे के घर में जाकर खुश रह सके। पर पता नहीं अब इससे कौन शादी करेगा? गाँव में सब तो ऐसे ही कहते हैं एक बच्चे की मां से कौन करेगा शादी?"


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