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इनसे एक बार का लिया कर्ज़ पुश्तें चुकाती हैं

"सोचते हैं ऐसे जीवन से कब छुटकारा मिलेगा? जहां न सही से खा सकते हैं, न नहा सकते हैं, न सो सकते हैं, कपड़े धुलने का भी समय नहीं मिलता है। बस भूत की तरह काम में लगे रहते हैं।" फेंकू, बंधुआ मजदूर.

Neetu SinghNeetu Singh   19 Feb 2020 7:45 AM GMT

चौबेपुर (कानपुर)। आप सभी से एक सवाल है, अगर आपने कभी किसी से 5,000-10,000 रुपए का कर्ज लिया है तो उसे चुकाने में आपको कितना वक़्त लगता है?

इस सवाल का जबाब आपकी आमदनी के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। लेकिन बिहार के गया जिले के फेंकू के लिए इस कर्ज का दर्द 30 साल का है।

फेंकू माझी (46 वर्ष) को ठीक से याद नहीं है कि उनके परिवार ने ठेकेदार से 30 साल पहले कितने रुपए का कर्ज लिया था। पर फेंकू को लगता है कि जब वह 15-16 साल के होंगे तब उनके परिवार ने ठेकेदार से लगभग 5,000-10,000 रुपए का ही कर्ज लिया होगा। तबसे फेंकू इस कर्ज की गिरफ्त में है। इस कर्ज को फेंकू ने काम करते हुए चुका दिया था लेकिन जरूरत पड़ने पर ठेकेदार से दोबारा कर्ज ले लिया। तभी से फेंकू की जिंदगी की कहानी इस कर्ज में उलझ गयी है। इस कर्ज का मकड़मजाल ही कुछ ऐसा है जो एक बार इसमें फंस गया उसके लिए बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है।

ये हैं फेंकू जो 30 साल से कर्ज में जी रहे हैं.

मौजूदा वक्त में कानपुर में 240 भट्टे हैं। एक भट्टे पर 50-100 परिवार काम करते हैं। इस हिसाब से एक भट्टे पर लगभग 200-250 लोग रहते हैं। ये मजदूर अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, यूपी-एमपी (बुन्देलखण्ड) से हैं। इनमें से 90 फीसदी मजदूर बिहार के मुसहर समुदाय से होते हैं।

"तीस साल से बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं। अगर हमने गलती से भी ठेकेदार से एक बार कर्ज ले लिया तो उस कर्ज से बाहर निकलना हमारे लिए आसान नहीं है। चाहते हैं कि कर्ज जल्दी खत्म करें, तभी 12-15 साल के अपने बच्चों को भी काम पर ले आते हैं।" यह बताते हुए फेंकू (46 वर्ष) के चेहरे पर उदासी और मजबूरी साफ़ दिख रही थी, "हमारे बच्चों का बचपन इन्हीं चिमनियों के धुएं में खत्म हो जाता है। कई बार मजबूरी में इन बच्चों पर भी 10,000-12,000 रुपए का कर्ज ले लेते हैं।"

चौबेपुर के दो तीन ईंट भट्टों पर जब हमने कई परिवारों से बात की तो हमें पता चला कि ठेकेदार एक परिवार को 30,000-40,000 रुपए का कर्ज दे देते हैं। ये कर्ज की राशि ये परिवार उस समय लेते हैं जब जून से अक्टूबर तक बिहार में होते हैं। भूमिहीन होने की वजह से खेतों में भी कोई काम नहीं होता। रोजगार मिलता नहीं है। इस दौरान खर्चा कैसे चले इसलिए ठेकेदार से यह कर्ज मजबूरी में ले लेते हैं। इसी बीच अगर कोई बीमार पड़ गया या लड़की की शादी करनी है तो भी इन्हें ठेकेदार से कर्ज लेना पड़ता है।

पढ़ने लिखने की उम्र में ये बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते.

कानपुर मंडल के अपर श्रमायुक्त एस पी शुक्ल गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "अगर हमें ऐसी कोई शिकायत मिलती हैं तो हम तुरंत कार्रवाई करते हैं। मजदूरों को रिलीज करवाते हैं, उन्हें तुरंत 20,000 रुपए देते हैं। उनके पुनर्वास के लिए लगभग एक लाख रुपए की राशि देते हैं।"

जब हमने उनसे पूछा क्या यह बंधुआ मजदूरी वाला मामला आपके संज्ञान में है इस पर एस पी शुक्ल बोले, "यह मामला हमारे संज्ञान में नहीं है। आप मजदूरों से कहिए वो हमें लिखित शिकायत दें हम 100 प्रतिशत उस पर कार्रवाई करेंगे।"

ये मजदूर श्रम विभाग में लिखित रूप से शिकायत क्यों नहीं करते जब हमने यह जानने के लिए लक्ष्मीकांत शुक्ल से बात की जो 20 वर्षों से इन मजदूरों के साथ काम कर रहे हैं इस पर वह बोले, "ये ठेकेदार अपने क्षेत्र के रंगदार (दबंग) होते हैं। अगर किसी मजदूर ने इनके खिलाफ लिखित शिकायत दे दी तो यह इनकी वहां क्या दुर्दशा करेंगे यह बात मजदूर अच्छे से जानते हैं। यह उनके साथ मारपीट करेंगे, उन्हें 10-10 दिन घर में बंद रखेंगे। इसी वजह से ये वर्षों से खामोश हैं।"

ये हैं लक्ष्मीकांत जो भट्टा मजदूरों के साथ पिछले 20 सालों से काम कर रहे हैं.

जब हमने फेंकू से उनके 30 वर्षों के कर्ज की कहानी जाननी चाही तो फेंकू ने पिछले साल का अनुभव साझा किया, "पिछले साल हमने ठेकेदार से 40,000 रुपए का कर्ज लिया था। हमने मेहनत करके पूरा कर्जा पिछले साल ही चुका दिया था लेकिन ठेकेदार इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं है। ठेकेदार के मुताबिक़ अभी हमारे पास 27,000 रुपए बकाया है, इसलिए इस बार हमें मजबूरी में आना पड़ा।"

"अगर नहीं आते तो ठेकेदार मारता-पीटता, गाली-गलौज करता इसलिए मजबूरी में आना पड़ा। ठेकेदार के पास पिछले साल का मेरे काम का कोई हिसाब-किताब नहीं है।" फेंकू ने बताया। यही इस पूरे कर्ज की कहानी है कभी ये मजदूर एक साल में कर्ज चुका देते हैं तो कभी नहीं, कभी कर्ज लेते कभी चुकाते इनकी यह प्रक्रिया सालोंसाल खत्म नहीं होती है।

कर्ज के चंगुल में जो एक बार फंस गया उसके लिए निकलना बहुत मुश्किल है.

आखिर यह ठेकेदार मजदूरों के बीच में कौन सी वह कड़ी है जिससे यह मजदूर सदियों से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, यह समझने के लिए हमने नवादा जिले के ठेकेदार मिटठू यादव से फोन पर बात की। मिटठू बताते हैं, "भट्टा मालिक मजदूरों पर भरोसा ही नहीं करते इसलिए इन्हें सीधे नहीं रखते। भट्टा मालिक हमें जानता है इसलिए हमारे माध्यम से वो मजदूर रखते हैं। मैं पांच छह साल से यह काम कर रहा हूं।"

आपको इस काम से क्या फायदा है? इस पर मिटठू बोले, "यह कोई बताने की बात नहीं है, यह हमारा धंधा है मजदूरों की संख्या के हिसाब से हमें फायदा होता है।" कितने सालों से भट्टा मालिक आपके द्वारा ही मजदूरों को रखते हैं इस पर मिटठू बताने लगे, "जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था तबसे ऐसा ही होता आया है। इसकी कहानी तो मुझे भी नहीं पता। बिहार में काम नहीं है इसलिए वहां की एक तिहाई आबादी काम की तलाश में हमेशा बाहर ही रहती है।"

बच्चा एक महीनें का ही होता है तबसे ये ईंटे पाथना शुरू कर देती हैं.

क्या मजदूर आपसे कर्ज लेते हैं इस पर वह बोले, "कर्ज कौन नहीं लेता। जरूरत पड़ने पर आप भी लेते होंगे, हम भी लेते हैं, अगर वो भी लेते हैं तो कौन सी बड़ी बात है।"

आपकी मर्जी से यह मजदूर कहीं और काम करने जा सकते हैं क्या? मिटठू ने कहा, "बिलकुल जा सकते हैं, लेकिन हम इन्हें बहुत सहयोग करते हैं, अच्छे से बात करते हैं। अगर किसी को जरूरत पड़ी तो बीच में घर जाने देते हैं जबकि दूसरे ठेकेदार ऐसा नहीं करते हैं।"

इन मजदूरों को क्या-क्या मुश्किलें हैं? मिटठू ने कहा, "बिंदास जिंदगी है इनकी. ये अंबानी की तरह बड़े व्यक्ति नहीं बनना चाहते इसलिए इनकी जिंदगी सुख चैन की है। अब मजदूर बुरबक नहीं है, सब बहुत समझदार हो गये हैं।"

फेंकू गया जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर दरियापुर गांव के रहने वाले हैं। फेंकू की तरह कानपुर के चौबेपुर के विभु भट्टे पर अभी 30 परिवार रहते हैं जो मुसहर समुदाय से हैं। ये सभी बिहार से ठेकेदार से कर्ज लेकर आये हैं जिसकी वजह से कई वर्षों से यह बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर हैं।

ईंट भट्टे पर पीने के शुद्ध पानी का नहीं होता है इंतजाम.

मकर संक्रांति पर्व के दिन जब हम कानपुर के चौबेपुर के एक ईंट-भट्टे पर पहुंचे तो 30 परिवारों की ये बस्ती अपने-अपने कामों में व्यस्त थी। इनको देखकर इनकी मुश्किलों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। आज यहां चिमनियों से धुंआ नहीं निकल रहा था, ईंट पाथने का काम भी बंद था। इनसे बात करके पता चला कि बारिश होने की वजह से पिछले एक महीने से काम ठप्प पड़ा है।

"इस बार पानी बरसने की वजह से पूरे महीने काम बंद रहा है। आज खिचड़ी का पर्व है समझ नहीं आ रहा है बच्चों के लिए दही-चूड़ा कैसे लाऊं?' फेंकू माझी मिट्टी में खेल रहे अपने बच्चों की ओर निहारते हुए बोले।

ये दृश्य भारत के सबसे बड़े शहरों में एक कानपुर के एक ईंट भट्टे का था। वो शहर जहां अभी भी लोग रोजगार की उम्मीद से आते हैं। इसी शहर में एक पिता मौसम की मार और हालात से इतना मजबूर था कि वह अपने बच्चों के लिए दही-चूड़ा के इंतजाम के लिए मजबूर था। फेंकू के तीन लड़के और एक लड़की है। ये अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ईंट पाथने का काम करते हैं।


देश के आठवें राष्ट्रपति आर वेंकटरमण की बेटी विजया रामचंद्रन (73 वर्ष) पिछले 30 वर्षों से ज्यादा इन भट्टा मजदूरों के साथ काम कर रही हैं। वह गांव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं, "ये पढ़े-लिखे नहीं होते हैं, इन्हें अपने हक और अधिकार नहीं पता है तभी वर्षों से ठेकेदार के गुलाम हैं। पूरे साल में भट्टे पर केवल सात आठ महीने ही काम होता है बाकी समय में ये अपने गाँव वापस चले जाते हैं। ये भूमिहीन होते हैं, चार पांच महीने का खर्च चलाने के लिए जब इन्हें काम नहीं मिलता तब ये मजबूरी में ठेकेदार से कर्ज लेकर काम चलाते हैं।"

फेंकू अपनी बस्ती के कुछ लोगों के साथ हमें उस जगह को दिखाने ले गये जहां पर ईंट पाथी जाती है। गीली मिट्टी की तरफ इशारा करते हुए फेंकू बोले, "कड़ाके की सर्दी में इस मिट्टी को छूने का मन नहीं करता पर मजबूरी जो न कराये। रोजाना पूरा परिवार 10-12 घंटे काम करता है तब हजार ईंट पाथ पाते हैं। हजार ईंट पर 550 रुपए मिलते हैं। जबकि ठेकेदार को भट्टा मालिक एक हजार ईंट पर 700-800 रुपए देता है।"

विजया रामचंद्रन कहती हैं, "इनके पीने के लिए भट्टों पर न तो शुद्ध पानी का इंतजाम है न ही शौचालय का। देशभर में खुले में शौचमुक्त भारत को लेकर चर्चा होती है पर किसी भी भट्टे पर आपको एक भी शौचालय देखने को नहीं मिलेगा।"

गिनती के कुछ बर्तन और खाने-पीने का बहुत सामान, ऐसी होती हैं इनकी गृहस्थी.

इन मजदूरों को लेकर लोगों में तमाम तरह की धारणाएं बनी हुई हैं कोई कहता है ये नशा बहुत करते हैं तो कोई कहता है ये जब चार पांच महीने ये अपने गाँव में रहते हैं तब काम नहीं करते। इन सभी सवालों के जबाब के लिए जब हमने महेश कुमार से बात जो आरटीआई कार्यकर्ता हैं और इन मजदूरों के गांव में जाकर भी बहुत वक़्त बिताया है।

इन मजदूरों के साथ अपना 15 साल का अनुभव साझा करते हुए महेश बताते हैं, "ये भूमिहीन मजदूर हैं। एक समय ऐसा था जब यह चूहे खाकर अपना जीवन यापन करते थे। घर मकान होता नहीं है इसलिए ज्यादातर परिवार ठेकेदारों की जगह में ही झुग्गी-झोपड़ी बनाकर रहते हैं। ये जब चार पांच महीने गाँव में रहते हैं तो इनके ही खेतों में काम करते रहते हैं।"

महेश बिहार में अपने सामने की एक घटना का जिक्र करते हैं, "एक बार इस बस्ती में किसी की मौत हो गयी थी तो कुछ लोग ठेकेदार के यहां काम पर नहीं जा पाए थे। मेरे सामने ठेकेदार ने आकर खूब गाली-गलौज और मारपीट की। सिर्फ इस वजह से कि वो काम पर क्यों नहीं आये।"

महेश के मुताबिक़ ठेकेदार की बिना मर्जी के मुसहर समुदाय के लोग कहीं भी काम नहीं कर सकते। कोई कर्ज लेकर भाग भी नहीं सकता। ठेकेदार की पूरी कोशिश रहती है अगर किसी ने एक बार गलती से भी कर्ज ले लिया तो फिर वह कभी अपने चंगुल से बाहर नहीं निकलने देता है।

चौबेपुर भट्टे पर काम कर रहे नवादा जिले के अजीत माझी की पीड़ा फेंकू माझी से मिलती जुलती है। अजीत अपने झोपड़ी की तरफ इशारा करते हुए बोले, "आप अन्दर जाकर देख लीजिये, इतनी सर्दी में भी दो पतले-पतले कंबल से काम चलाना पड़ता है। कई बार तो रात में उठकर लकड़ी जलाकर पूरी रात काटनी पड़ती है।"

सर्दी में ओढ़ने और बिछाने के इनके पास नहीं होते हैं पर्याप्त कपड़े.

इनकी झोपड़ियों के अंदर ओढ़ने-बिछाने के लेकर दो चार कपड़े होते हैं, कुछ बर्तन होते हैं, झोले में थोड़े से चावल, एक कोने में आलू का छोटा सा ढेर, हरी मिर्च, बोतल में थोड़ा सा सरसों का तेल कुछ ऐसी ही होती हैं इनकी गृहस्थी।

अजीत ने बताया, "जब मौसम खराब होता तब ईंट पथाई का काम बंद रहता है। ऐसे में हमें हफ्ते में खाने के लिए 150 रुपए और 150 हमारी पत्नी को मिलते हैं। जब ईंट पाथते हैं तब हफ्ते है 600 और जब नहीं पाथते तब 300 पति पत्नी का मिलता है।" परिवार के पांच छह लोगों का खाना खर्चा एक सप्ताह का इतने पैसे से मुश्किल से हो पाता है।

एक झोपड़ी में एक मजदूर ओढ़कर लेटा हुआ था उनकी पत्नी धूप में बैठकर अपने बच्चों को खिला रही थीं। सुगी देवी (35 वर्ष) ने बताया, "हमारे पति को कई महीने से टीबी है। दवा नहीं करा पा रहे हैं। हम अकेले ही ईंट पाथते हैं, बहुत मुश्किल है बच्चों का पेट भरना।"

कारी देवी के चेहरे की उदासी उनकी तकलीफ बताने के लिए काफी है.

वहीं कुछ दूरी पर खड़ी कारी देवी (40 वर्ष) कहने लगीं, "हम छोटी मोटी तकलीफ में कभी अस्पताल नहीं जाते हैं। हमारे बच्चे महीने भर के होते हैं तभी उन्हें लेकर ईंट पाथना शुरू कर देते हैं। यहां करेंगे नहीं तो खायेंगे क्या?"

15 साल की एक लड़की कंघे से अपने बाल संभाल रही थी जब मैंने उससे पूछा कितने में पढ़ती हो तो वह बोली, "हम पढ़ते नहीं हैं ईंट पाथते हैं, अपने छोटे भाई-बहनों को देखते हैं। स्कूल जाने का मन तो बहुत करता है पर जा नहीं सकते हैं।"

वहां खड़ी एक महिला रुकमनी देवी (30 वर्ष) बोली, "आपको पढ़ाई करने की पड़ी है हम लोगों को पेटभर खाना मिल जाए यही हमारे लिए बड़ी बात है। रोज आलू भात खाते हैं, कभी आसपास के खेत से साग ले आते हैं। सालों हो गये हैं दाल नहीं देखी है, हरी सब्जी भी मुश्किल से महीने में एक दो दिन नसीब हो जाये बड़ी बात है।"

इन बंधुआ मजदूरों के ऐसे अनगिनत किस्सों को लेकर हम वापस आ गये जिसके हमारे पास जबाब नहीं थे।


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