मजदूर दिवस पर कहानी उन मजदूरों की जो लॉकडाउन में घर पहुंचना चाहते थे, लेकिन रास्ते में ही सांसें थम गईं

सैकड़ों मजदूर सड़कों पर फंसे हुए हैं। पैदल ही घर की ओर निकले कई मजदूर दम तोड़ चुके हैं। इस खबर में आज कुछ ऐसे ही मजदूरों की बात जो अपने घर के लिए निकले जरूर, लेकिन पहुंच नहीं पाएं।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   1 May 2020 11:45 AM GMT

मजदूर दिवस पर कहानी उन मजदूरों की जो लॉकडाउन में घर पहुंचना चाहते थे, लेकिन रास्ते में ही सांसें थम गईंबायें से, पहला शव मध्य प्रदेश के रणवीर का है। फिर बीच में हरि प्रसाद और आखिरी में रामजी महतो का शव।

वर्ष 1886, तारीख थी 1 मई। अमेरिका के शिकागो के हेमोर्केट बाजार में मजदूर आंदोलन कर रहे थे। मामला बिगड़ गया। पुलिस ने फायरिग कर दी, जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई, लेकिन विरोध थमा नहीं। तब से हर साल एक मई को मजदूरों की याद में मजदूर दिवस मनाया जाने लगा।

वर्ष 2020, तारीख फिर वही 1 मई। इस बार देश है भारत, हालात 1886 वाले तो नहीं हैं, लेकिन लॉकडाउन की वजह से मजदूर संकट में हैं। सैकड़ों मजदूर सड़कों पर फंसे हुए हैं। पैदल ही घर की ओर निकले कई मजदूर दम तोड़ चुके हैं। इस खबर में आज कुछ ऐसे ही मजदूरों की बात जो अपने घर के लिए निकले जरूर, लेकिन पहुंच नहीं पाएं।

121 किलोमीटर पैदल चलने के बाद घर की दहलीज पर तोड़ा दम

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से 26 साल के हरि प्रसाद अपने घर आंध्र प्रदेश के चित्तूर के लिए पैदल निकले थे। लगभग 121 किलोमीटर की दूरी तय करके वे गांव की दहलीज पर ही पहुंचे थे कि होश खो बैठे। इलाज के लिए ले जाया गया लेकिन बचाया नहीं जा सका। बदकिस्मती का आलम यह रहा कि इस युवा का शव लगभग डेढ़ दिन गांव के बाहर बगीचे में रखा रहा। एक मजदूर के हिस्से में यही आया।

छब्बीस साल के हरि प्रसाद बेंगलुरू में किराये की टैक्सी चलाते थे। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हुआ तो खाने की दिक्कत होने लगी। गाड़ियां बंद थी तो घर वाले वापस बुलाने लगे। हरि पसाद पैदल ही घर निकले गये। उनका घर आंध्र प्रदेश के रामासम्रुदम मंडल के जिला चित्तूर, ग्राम पंचायत नाडीपल्ली के गांव मीटापल्ले में है। माता-पिता खेतिहर मजदूर हैं।

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हरि प्रसाद के छोटे भाई मल्लिकार्जुन (23) ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "वह सोमवार 27 अप्रैल को बेंगलुरू से निकले थे। हम लोगों ने कहा कि जब वहां दिक्कत है तो अपने घर आ जाओ। वह तीन दिन लगातार चलते रहे और 121 किमी की यात्रा करके बुधवार 29 अप्रैल की सुबह वह गांव में पहुंचे ही थे कि वह गिर पड़े। हमने एंबुलेंस बुलाया और अस्पताल ले जाने लगे लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।"

ये हरि प्रसाद की पुरानी तस्वीर है जो हमें उनके भाई ने भेजी है।

"हम उन्हें वापस लेकर आने लगे तो गांव वालों ने रोक दिया। फिर शव को गांव के बाहर ही रखना पड़ा। टेस्ट के बाद पता चला कि उसके कोरोना नहीं है। तब गुरुवार 30 अप्रैल को हमने उसका दाह संस्कार किया।"

रामासुंदरम मंडल की पंचायत अध्यक्ष जरीना बेगम ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "युवक की मौत बुधवार को अस्पताल ले जाते समय हो गई थी। उसी दिन वह अपने गांव के बाहर गिरकर बेहोश हो गया था। बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी मौत हो गई। मामला तब प्रकाश में आया जब गांव वालों ने उसका अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। बाद में डॉक्टर्स की टीम ने शव का सैंपल लिया और रिपोर्ट निगेटिव आई। लगभग डेढ़ दिन शव गांव के बाहर ही रखा रहा। युवक के परिवार के ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं।"


हरि प्रसाद की मौत के बारे में जिले के सूचना अधिकारी बीके सुधाकर ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "जब गांव वालों ने शव का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया तब मौके पर डॉक्टर्स और पुलिस की गई थी। उनकी निगरानी में जांच हुई बाद में रिपोर्ट निगेटिव आई उसके बाद शुक्रवार को शव घर वालों को सौंप दिया गया, जिसके बाद दाह-संस्कार किया किया। मौत की वजह डिहाईड्रेशन बताई जा रही।"

300 किलोमीटर का सफर था, घर से 100 किलोमीटर पहले हुई मौत

मध्य प्रदेश के जिला मुरैना, के ग्राम पंचायत बारेह के गांव बाड़फरा के 39 वर्षीय रणवीर सिंह देश की राजधानी नई में दिल्ली में एक होटल में टिपिन डिलीवरी का काम करता थे। लॉकडाउन के बाद होटल बंद हो गया, कमाई भी बंद हो गई। ऐसे में रणवीर ने 27 मार्च को घर जाना ही उचित समझा। नई दिल्ली से उनका घर यही कोई 300 किलोमीटर था, लेकिन वे 200 किमी का ही सफर तय कर पाये और 28 मार्च को आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र में उनकी मौत हो गई।

यह तस्वीर उस दिन की है जब रणवीर के परिजन को उनकी मौत की खबर मिली। फ़ोटो उनके चचेरे भाई ने भेजी।

रणवीर ने आखिरी बार अपनी बहन पिंकी से बात की थी। पिंकी ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "भैया ने 27 मार्च को फोन किया था तब उन्होंने बताया था कि वे आज घर के निकलेगा। उसने बताया कि कोई गाड़ी नहीं है इसलिए पैदल हा आउंगा। फिर उसने 29 को दोपहर में फोन किया और बताया कि उसके सीने में दर्द हो रहा है, यह कहकर उसने फोन काट दिया। फिर शाम लगभग सात बजे फोन आया कि मेरा भाई नहीं रहा।"

घटना के बारे में सिकंदरा थाना के एसएचओ अरविंद कुमार बताते हैं, " हमने पीड़ित को एक जगह लिटा दिया और उसे चाय-बिस्किट दिया। उसने बताया कि उसके सीने में दर्द में हो रहा है। इसी समय उसने अपने किसी रिश्तेदार को भी फोन किया था। शाम के 6:30 बजे रणवीर की मौत हो गई।"

"रणवीर अपने घर के लिए पैदल ही जा रहा था और लगभग 200 किमी पैदल चल चुका था। इसी कारण उसके सीने में दर्द उठा। पूरे एनएच-2 पर पुलिस खाना और पानी लेकर मौजूद थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ये पता चला कि दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई।" अरविंद आगे कहते हैं।

रणवीर के परिवार में वृद्ध मां और पत्नी ममता के अलावा तीन बच्चे हैं। परिवार के भरण पोषण के लिए रणवीर तीन साल पहले दिल्ली नौकरी करने गये थे।

बहन पिंकी का आरोप है कि उसका भाई भूखा-प्यासा था। 200 किमी के सफर में उसने रास्ते में कुछ नहीं खाया था।

850 किमी की यात्रा की फिर भी घर दूर रह गया, परिजन अंतिम बार देख भी नहीं पाये

बिहार के बेगूसराय के रामजी महतो तीन अप्रैल को दिल्ली से पैदल अपने घर के लिए निकले थे, लेकिन 16 अप्रैल को वाराणसी में चलते-चलते उनकी मौत हो गई। बदनसीबी का आलम यह था कि जिन घर वालों तक पहुंचने के लिए रामजी पैदल निकल पड़े थे, उनके पास शव लेने और दाह संस्कार करने तक के पैसे नहीं थे। वाराणसी पुलिस ने दाह संस्कार किया।

मामला उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के रोहनिया थाना क्षेत्र का है। उस समय रोहनिया थाने में तैनात चौकी इंचार्ज गौरव पांडेय ही वे व्यक्ति थे जो रामजी महतो (45) से आखिरी बार मिले थे। वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "16 अप्रैल को सुबह छह बजे मुझे पता चला कि एक मजदूर सड़क पर गिरा है। जब उसके पास पहुंचा तो उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं। मैंने तुरंत एंबुलेंस बुलाया, लेकिन एंबुलेंस वाला देखते ही डर गया। उसे लगा कि कहीं ये इसे कोरोना तो नहीं है। मैंने रिक्वेस्ट करके किसी तरह सावधानी से उन्हें एंबुलेंस में लिटाया ही था कि उनकी सांसे थम गईं।


वे आगे बताते हैं, "इसके बाद मैंने उनके परिजन के घर फोन किया था तो उन्होंने कहा कि हम यहां अकेले हैं और हमारे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वहां तक आ पाएंगे। हमने रामजी महतो का कोरोना टेस्ट भी कराया जो कि निगेटिव निकला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी आई नहीं है। रिपोर्ट के बाद ही पता चला पायेगा कि मौत की मुख्य वजह क्या है।"

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गूगल मैप की मानें तो दिल्ली से बेगूसराय की दूरी 1,100 किमी से ज्यादा है। कोई आदमी अगर पैदल जाता है तो वह लगभग 215 घंटे में दिल्ली से बेगूसराय पहुंचेगा। रामजी महतो 850 किमी से ज्यादा का सफर तय कर चुके थे। लगभग 375 किमी का सफर बाकी था। हम आप अधिकतम कितना किलोमीटर पैदल चले होंगे, अपने आप से यह सवाल पूछ सकते हैं।

सैकड़ों मजदूर अभी भी सड़कों पर फंसे हुए हैं।

रामजी महतो ने दिल्ली से निकलने से पहले अपनी बहन नीला देवी से बात की थी। उन्होंने फोन पर क्या कहा था, और महतो दिल्ली में क्या करते थे, उन्होंने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया।

नीला कहती हैं, "जब मेरे भाई ने फोन किया था तब उसकी तबियत कुछ खराब लग रही थी। उसने कहा कि उसे भूख नहीं लग रही और बेचैन है। वह वहां पानी सप्लाई करने वाली गाड़ी चलाता था और मजदूरी का भी काम करता था। गाड़ी का काम हमेशा नहीं मिलता था। 13 अप्रैल को उसने फोन किया था। उसके बाद मरने से पहले 15 तारीख को फोन पर बात हुई थी तब बोला कि बनारस में हूं, तुम्हारे पास आना है लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैंने उसे बोला था कि चारों ओर बंदी है तो घर मत आओ, लेकिन वह नहीं माना। वह तीन तारीख को घर के लिए निकला था। उसके पास पैसे नहीं थे।"

रामजी की बहन अपने ससुराल बेगूसराय के कुम्हरा सो गांव में रहती हैं और माता-पिता कोठियरा, बखरी में रहते हैं। रामजी पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे और लगभग 10 सालों से दिल्ली में रह रहे थे, घर वालों को भी इतना ही पता है। उनके

पिता राम चंदर महतो गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "इन 10 सालों में बस एक बार ही घर आया था। बहन के पास ही जाता था। वाराणसी से बहन को फोन करके पैसे मांग रहा था लेकिन पैसा जाता कैसे। एक बेटा पंजाब में मजदूरी करता है, वह वहां फंसा हुआ। एक बेटा बीमार रहता है जो हमारे पास ही है। पुलिस वाले बनारस बुला रहे थे, बोले कि व्यवस्था हो जायेगी यहां तक आने के लिए लेकिन मैं जाता भी कैसे। हम तो खाने को मोहताज हैं, दाह संस्कार कैसे जलाते।

केंद्र सरकार ने 29 अप्रैल को कहा कि राज्य अपने प्रदेश के के मजदूरों को बुला सकते हैं। इसके लिए नई गाइडलाइंस भी जारी की गईं। कुछ प्रदेशों में मजदूरों के लिए ट्रेन की शुरुआत हो गई है लेकिन अभी भी सैकड़ों मजदूर सड़कों पर फंसे हुए हैं। रास्तों में फंसे हुए हैं। कई मीडिया रिपोर्टस में यह बताया जा रहा है कि देश में अब तक घर के लिए निकले 40 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो चुकी है।

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