छुट्टा पशु समस्या: 'यूरिया की तरह गाय के गोबर खाद पर मिले सब्सिडी, गोमूत्र का हो कलेक्शन'

Arvind ShuklaArvind Shukla   14 Feb 2019 12:13 PM GMT

छुट्टा पशु समस्या: यूरिया की तरह गाय के गोबर खाद पर मिले सब्सिडी, गोमूत्र का हो कलेक्शन

अरविंद शुक्ला/दिति बाजपेई

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। "एक देसी गाय (छुट्टा जैसी गाय या गोवंश) एक दिन में 2 से 3 लीटर दूध, 7-10 लीटर गोमूत्र और 10 किलो गोबर देती है। जबकि उसे खाने के लिए सिर्फ 5-6 किलो भूसा चाहिए। अगर गोबर और गोमूत्र इस्तेमाल अच्छे से होने लगे। या फिर सरकार पंचायत स्तर पर किसानों से गोमूत्र खरीदना शुरू कर दे। डीएपी-यूरिया की तरह गोबर की खाद बनाने पर सब्सिडी मिलने लगे तो सब समस्या दूर सकती है।" आईवीआरआई के न्यूट्रिशियन विभाग के डॉ. पुतान सिंह बताते हैं।

"लेकिन किसानों को सही खाद कैसे बनाई जाए, किसानों को इसकी समझ नहीं है। जो तरीका अभी किसान अपना रहे उसमें पूरा उपयोग नहीं हो पाता। लेकिन अधिकारियों की तरफ से इसके अच्छे से प्रयोग के लिए किसानों को भी सही ट्रेनिंग भी नहीं दी गई।" डॉ. पुतान आगे जोड़ते हैं।

भारत में किसान छुट्टा गाय और गोवंश से परेशान हैं। दिन रात खेतों की रखवाली कर रहे हैं। कई जगह किसानों ने हंगामा किया है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किसानों की समस्या और छुट्टा गायों के संरक्षण के लिए गौशाला बनाने के निर्देश दिए हैं। मीडिया यूपी के पशुधन मंत्री ने किसानों को भी आफर दिए हैं। जिसनें अपनी गोशाला में छुट्टा गाय रखने पर निश्चित रकम देने की बात है। किसानों की समस्या को देखते हुए गांव कनेक्शन 1 जनवरी की रात किसानों के साथ बिताई और उनकी समस्याएं जानने की कोशिश की। खेतों में जागते किसान सरकार ने नाराज दिखे, साथ उन से भी उन्हें शिकायत थी, जो दुहने के बाद अपनी गाय छुट्टा छोड़ देते हैं।


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भारत में गायों को राजनीति गर्माई है, वहीं पाकिस्तान ने इस समस्या से निरात के लिए गोवंश के गोबर (मिथेन) से बसें चलाने क योजना तैयार की है।

क्या भारत में भी छुट्टा गाय, सांड और बछड़ों का किसी तरह इस्तेमाल हो सकता है, क्या वो किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते ? ये जानने के लिए गांव कनेक्शन ने कई पशु वैज्ञानिक और जानकारों से बात की। जिनके मुताबिक अगर सरकार कुछ मदद करे और किसान सार्थक पहल करें तो गोवंश के गोबर से खाद जैसे दूसरे उत्पाद बनाकर कमाई बढ़ाई जा सकती है, जो इस समस्या को सुलझाने में मदद कर सकता है।


"गाय और बछड़ों से किसान परेशान इसलिए है क्योंकि उसे लगता है, ये उसके लिए उपयोगी नहीं है। किसान गायों की उपयोगिता सिर्फ दूध से देख रहा है। एक गाय दूध कुछ समय तक ही देती है, लेकिन गोबर और गोमूत्र अंतिम सांस तक देती है। इससे कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट, बॉयो इनहेंसर बनाए जाएं, जिससे अतिरिक्त कमाई, उत्पादन ज्यादा और खेती की लागत कम होगी,"डॉ. राम कृपाल पाठक 'गाँव कनेक्शन' से फोन पर बताते हैं।

डॉ. पाठक के मुताबिक, उन्होंने 1997 में ही ऐसी गायों को उपयोगी बनाने पर काम शुरू किया था, लेकिन उस दौरान सरकार से उसे ज्यादा तवज्जो नहीं मिला।

बाद में साल 2000 में डॉ. पाठक केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (रहमान खेड़ा, लखनऊ) के निदेशक बने और बॉयो डॉयनिक (कॉस्मिक फार्मिंग) पर रिसर्च शुरू कराई। बॉयो डायनिक खेती में ब्रह्मांडीय ऊर्जा, गृह नक्षत्र की चाल और गाय काकाफी महत्व होता है।

"गोवंश के गोबर और गोमूत्र से बॉयो इनहेंसर (जीवामृत, पंचगव्य, बॉयोपेस्टीसाइड जैसे एक दर्जन उत्पादन) बनाए जा सकते हैं, जो खेती में डीएपी-यूरिया की खपत कम करते है। साल 2003 में बैंकाक में हुई एक कॉन्फ्रेंस में गाय पर आधारितमेरे रिसर्च पेपर को दुनिया का सबसे अच्छा रिसर्च पेपर माना गया था," डॉ. राम कृपाल पाठक बताते हैं। उनके मुताबिक आंध्र प्रदेश के कुछ किसानों ने वैसे ही काम शुरू कर दिया था जैसे पिछले कुछ वर्षों से सुभाष पालेकर कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा समेत देश के कई राज्यों में किसान छुट्टा पशुओं से परेशान हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में पशुपालन विभाग के मुताबिक 11 लाख छुट्टा गोवंश हैं। ये वो गाय और बछड़े हैं, जो उपयोगी न होने के चलते किसानों ने छोड़ दिए हैं। उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध के बाद ये समस्या विकराल हो गई है।

गाय और गोवंश की उपयोगिता पर भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), बरेली के पशु अनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह कहते हैं, "जो गाय एक भी रुपए का दूध न दो रही हो। उससे भी जैविक खाद(वर्मी कंपोस्ट आदि) बनाकर 20 हजार रुपए तक कमाए जा सकते हैं। डीएपी, यूरिया, रासायनिक कीटनाशकों से हमारी जमीन का स्वास्थ्य खराब हो गया है और इसे ठीक करने के लिए गाय, केचुएं और सूक्ष्मजीवी से अच्छा कुछ नहीं हो सकता।"


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गाय या गोवंश की उपयोगिता समझने के लिए ये समझना जरूरी है कि वो किसान से लेती क्या है और बदले में उसे मिलता क्या है?

क्या भारत के कृषि विभाग के अधिकारी और सरकार किसानों को ये समझाने में नाकाम रहे हैं। इसका जवाब उत्तर प्रदेश कृषि विविधिकरण परियोजना (डॉस्प) में पूर्व निदेशक हर्टीकल्चर रहे डॉ. एसके पाठक की बातों से समझा जा सकता है।

"अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी बाधा उनकी पढ़ाई है। पहले वो खेती के लिए जो पढ़ते हैं फिर 30-40 तक नौकरी में वही करते हैं। हमें पढ़ाया ही रासायनिक तरीकों के हिसाब से गया है। प्रसार को लेकर अधिकारियों में फील्ड नॉलेज (जमीनीजानकारी) की कमी बड़ी बाधा बनती है। फिर वो किसानों को क्या समझाएंगे?"

अपने दावे के समर्थन में वो कहते हैं, "भारत में आज भी 20 फीसदी यूरिया विदेशों से आती है। जबकि पोटाश और फास्फोरस के लिए हम पूरी तरह विदेशों पर निर्भर हैं। एक हेक्टेयर खेत के ऊपर 78 फीसदी नाइट्रोजन हवा में उड़ती रहती है और हमबाजार से मंगा-मंगा कर यूरिया के रूप में उसे झोंकते रहते हैँ। अगर गोबर-गोमूत्र का प्रयोग करें तो इस नाइट्रोजन से काम हो जाएगा, यूरिया की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।"

गाय भले पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय मुद्दा हो, गाय के नाम पर हत्याएं और हंगामे हो रहे हों, लेकिन आजाद भारत में इनकी दशा सुधारने की बात होगी तो सभी सरकारें कठघरे में खड़ी नजर आएंगी।

आईवीआरआई, बरेली के पशु अनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह कहते हैं, "जो भी गाय छुट्टा हैं वो किसी खास नहीं, बल्कि मिक्स ब्रीड की हैं। जो अच्छी नस्लें (साहीवाल, थारपारकर, गिर आदि) की हैं, लेकिन भारतीय गोवंशके सुधार के लिए आनुवांशिक सुधार के लिए जो संतिति परीक्षण योजना लागू होनी थी, वो ठीक से लागू नहीं हुई। अगर शुरुआत से ही ध्यान दिया जाता तो आज ये गायें 10 लीटर दूध दे रही होतीं, फिर इन्हें भी भैंसों की तरह कौन छुट्टा छोड़ता।"

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आनुवांशिक संतिति परीक्षण वो प्रक्रिया होती है, जिसमें एक सांड से कम से कम 100 गायों को (कृत्रिम) गर्भाधान कराया जाता है। उनसे पैदा होना होने वाले बछिया जो ज्यादा दूध देती है, उसे क्रमवार आगे बढ़ाया जाता है। उसके बेहतर जीननिकालकर दूसरे में डाले जाते हैं, इस तरह एक अच्छे नस्ल की गाय या भैंस तैयार होती है।

बेसहारा गाय और गोवंश कैसे किसानों के लिए उपयोगी हों, इसे लेकर उत्तर प्रदेश में मथुरा के पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा महाविद्यालय एवं गो अनुसंधान संस्थान में किसानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। महाविद्यालय केकुलपति प्रो. केएमएल पाठक कहते हैं, "देश में हरित क्रांति के साथ व्हाइट रेव्यूलेशन (दुग्ध क्रांति) शुरू हो गई थी, लेकिन इस दौरान एक गलती हो गई। देसी गायों को संवर्धन की जगह विदेशी नस्लों (जर्सी, एचएफ) से क्रॉस ब्रीडिंग कराई गई। येगायें हमारी जलवायु में उपयोगी नहीं साबित हुईं और देसी नस्ल बिगड़ती चली गईं।"

प्रो. केएमएल पाठक आगे कहते हैं, "लेकिन वो गुजरी बात हैं, हमें अभी पर ध्यान देना है। गाय को लेकर सबसे बड़ा फेर समझ का है। हमें गाय के उत्पाद के वैल्यू एडिशन की बात करनी होगी। गोबर की खाद बनें, दूध का पनीर और घी बनाया जाए।मेरे कई जानने वाले किसान हैं जो देसी गाय का घी 4000 रुपए किलो तक बेचते हैं।"

अपनी बात को खत्म करते हुए प्रो. पाठक हंसते हुए कहते हैं, "वैल्यू एडिशन (मूल्यवर्धन) का पाठ पढ़ाने वाले सबसे पहले व्यक्ति भगवान कृष्ण थे, उन्होंने गोकुल वासियों से कहा कि दूध न बेचकर मथुरा में जाकर मक्खन और छांछ बेंचे। हमें उसीराह पर चलना चाहिए।"

भारत में गाय की उपयोगिता के सवाल आईवीआरआई-केवीके (बरेली) के संयुक्त निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. महेश चंद्र कहते हैं, "गाय का दूध, गोमूत्र गोबर सब उपयोगी है। विदेशों में लो फैट (कम वसा) वाले दूध की मांग है। हार्ट पेशेंट के लिए यहीदूध उपयोगी होता है। ये अच्छी बात है कि अब भारत में भी जागरूक लोग लो लैट और उपयोगिता के आधार पर गाय के दूध और उसके उत्पादों को महंगे कीमतों पर खरीद रहे हैं।


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भारत में ज्यादातर दूध कॉपरेटिव डेयरियों को जाता है। उन्हीं की राह पर निजी डेयरी वाले भी चलते हैं और फैट के आधार पर दूध खरीदते हैं। ज्यादा फैट होने पर भैंस के दूध की कीमत ज्यादा मिलती हैं, क्योंकि यही दूध मिठाई, मावा आदि बनानेमें इस्तेमाल किया जाता है। गाय का दूध पतला (फैट कम) होने पर कम कीमत में बिकता है।

गाय और बछड़ों को छुट्टा छोड़ने के पीछे एक और बड़ी वजह है, जिसको भारत में लगातार नजर अंदाज किया गया। जानकारों के मुताबिक ये छुट्टा पशु एक भयंकर बीमारी से ग्रसित हैं जिससे इनकी उत्पादकता कम हो गई।

केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा में पशु स्वास्थ्य विभाग के पूर्व वैज्ञानिक और वर्तमान में गलगोटिया यूनिवर्सिटी में बॉयो टेक्नॉलोजी डिपार्टमेंट के मुखिया डॉ. शूरवीर सिंह के मुताबिक छुट्टा घूम रहे ज्यादातर पशु आंत की टीबी (जॉनीजटीबी) से ग्रसित हैं।

वो बताते हैं, "कम से कम 36 फीसदी छुट्टा गोवंश आंत की टीवी से ग्रसित है। इस बीमारी से पशुओं में दूध देनी की क्षमता कम हो जाती है। धीरे-धीरे वो उनमें बच्चे पैदा करने की भी क्षमता नहीं रहती। इसलिए ये सिर्फ 2-3 बच्चे ही देती हैं। इसकेबाद किसान इन्हें छुट्टा छोड़ देता है।"

डॉ. शूरवीर आगे बताते हैं, "वर्ष 2014 में इस बीमारी को निंयत्रित करने के लिए मैंने एक टीका विकसित किया था, जिसको भारत सरकार ने स्वीकार तो किया तो लेकिन बड़े पैमाने पर इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया। महज 15-20 रुपए का ये टीकाछुट्टा गायों को उपयोगी बना सकता है।"

गोवंश के बीमार होने से सिर्फ ये गैरउपयोगी ही साबित नहीं हो रही हैं, बल्कि ये आम लोगों के लिए भी नुकसानदायक है। डॉ. शूरवीर बताते हैं, "ये वायरस मिल्क पाउडर, आइसक्रीम आदि के जरिए मनुष्यों में आता है, फिर मधुमेह, कोलाइटिस, आर्थरटिस जैसी 20-21 बीमारियों की वजह बनता है। इस बीमारी को ठीक किया जाना मनुष्यों के लिए भी बहुत जरूरी है।"


डॉ. शूरवीर कहते हैं, "मैंने अंग्रेजी अखबार में पढ़ा कि यूपी में गाय की समस्या से निपटने के लिए 11 हजार करोड़ का खर्च आ सकता है। अगर मेरे प्रोजेक्ट पर एक हजार करोड़ भी खर्च किए जाएं तो पूरे देश के छुट्टा जानवरों की समस्या खत्म होसकती है।"

गाय की उपयोगिता पर डॉ. महेश चंद्र कहते हैं, "देखिए वक्त करवट ले रहा है। लोग अपनी सेहत के प्रति जागरूक हुए हैं। पहले साहीवाल और गिर जैसी नस्लों की भी कोई पूछ नहीं थी, लेकिन अब उनके फार्म हाउस बन रहे हैं। गुजरात में गिर औरपंजाब में साहीवाल नस्ल की गाय काफी बेची जा रही हैं। लेकिन ये वही गाय हैं जो अच्छी नस्ल की हैं बाकी की नस्ल सुधार और उनसे बाई प्रोडक्ट पर काम करना होगा।"

पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे गाय को लेकर हंगामा मचा है तो इन्हीं दिनों में गाय की उपयोगिता पर भी चर्चा तेज हुई है। राष्ट्रीय गोकुश मिशन और चिकित्सा के क्षेत्र में आयुश मिशन की बात हुई। आयुर्वेदिक दवाओं के प्रति लोगों में जागरुकताबढ़ी है।

दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले सुशील अवस्थी आदित्य पिछले कुछ वर्षों से गाय के दूध और उसके उत्पादों की बिक्री करते हैं। वो बताते हैं, "मुझे समझ नहीं आता भारत में गाय की इतनी अनदेखी क्यों है। दुनिया में गौमूत्र के 7 पेटेंट हुए हैं, जिनमें 4 अमेरिका और तीन भारत के नाम हैं। अमेरिका गौमूत्र से कैंसर की दवा बना रहा है, हम लोग गाय को सड़कों पर दौड़ा रहे। अगर दूध न भी तो भी वो उपयोगी है।"


ऐसा कैसे के सवाल पर वो राजस्थान और हरियाणा की कुछ गोशाला का उदारहण देते हैं, जहां गोमूत्र कम से कम 10 लीटर बिकता है, नंदी का गोमूत्र 15 रुपए लीटर, जबकि अर्क 150 रुपए लीटर है।

हाल में अमेरिका में एक ऐसा शोध हुआ जो सिद्ध करता है कि गाय हमारी सोच से कहीं ज्यादा उपयोगी है। अमेरिका के रिसर्चर्स का मानना है कि एचआईवी से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने में गाय मददगार हो सकती है। उनका मानना है कि येमवेशी लगातार ऐसे एंटीबॉडीज प्रोड्यूस करते हैं, जिनके जरिए एचआईवी का न सिर्फ इलाज किया जा सकता, बल्कि उसे जड़ से खत्म भी कर सकता है। उनका मत है कि कॉप्लेक्स और बैक्टीरिया युक्त पाचन तंत्र की वजह से गायों में प्रतिरक्षा कीक्षमता ज्यादा अच्छी और प्रभावशाली होती है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ ने इस जानकारी को बहुत ही कारगार माना है।

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