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शहद में मिलावट: दूसरे देश जाने वाले शहद का एनएमआर टेस्ट जरूरी, लेकिन देश में बिकने वाले शहद की ये जांच क्यों नहीं?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   3 Dec 2020 4:00 PM GMT

शहद में मिलावट: दूसरे देश जाने वाले शहद का एनएमआर टेस्ट जरूरी, लेकिन देश में बिकने वाले शहद की ये जांच क्यों नहीं?मिलावट के कारोबार से किसानों का भी नुकसान हो रहा है। (सभी फोटो गांव कनेक्शन। ग्राफिक्स CSE और डाउन टू अर्थ से साभार )

  • इस शहद में इतना शुगर सिरप है कि वह आपको बीमार कर सकता है, बहुत बीमार
  • जांच में 13 में सिर्फ 3 कंपनियों के शहद खरे उतरे
  • निर्यात होने वाले शहद का एनएमआर टेस्ट जरूरी, लेकिन देश में बिकने वाले शहद का नहीं

देश में शहद बनाने वाली ज्यादातर नामी कंपनियां शहद के नाम पर आपको को शुगर सिरप यानी चीनी का घोल खिला रही हैं। औषधि के रूप में प्रयोग किया जाने वाला मीठे शहद को जहर बना दिया गया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) ने शहद में मिलावट को लेकर चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पतंजलि, डाबर, वैद्यनाथ और झंडू जैसे मशहूर कंपनियों के शहद जांच में फेल हो गये हैं। 77 फीसदी नमूनों में शुगर सिरप की मिलावट पाई गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (NMR) परीक्षण में 13 में से सिर्फ 3 कंपनियों के ही शहद खरे उतरे हैं। शहद में मिलावट के लिए चीन की कंपनियां भारत में ऐसे शुगर सिरप बेच रही हैं जो भारत के जांच मानकों में पकड़ में नहीं आतीं। यही कारण नमूनों की जांच पहले भारत और फिर जर्मनी में कराई गई। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि देश से निर्यात होने वाले शहद का एनएमआर टेस्ट सरकार ने जरूरी कर दिया है, लेकिन देश में बिकने वाले शहद की ये जांच नहीं होती।

बुधवार (दो दिसंबर) को जारी एक प्रेस रिलीज में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरामेंट (Centre for Science and Environment) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा, "कोविड-19 संकट के समय यह खाद्य धोखाधड़ी (फूड फ्रॉड) जनता के सेहत के साथ खिलवाड़ है। भारतीय इस समय शहद का सेवन ज्यादा कर रहे हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि शहद गुणकारी है। इसके सेवन से प्रतिरक्षा (इम्यूनिटी) क्षमता बढ़ेगी। जबकि सच्चाई तो यह है कि अगर शहद मिलावटी है तो असल में हम चीनी खा रहे हैं जो मोटापा और वजन बढ़ाता है। इससे हमारे संक्रमित होने का खतरा और बढ़ जाता है। शहद को मदर ऑफ ऑल फूड भी कहा जाता है।"

इसी चौंकाने वाली रिपोर्ट के बारे में सुनीता नारायण आगे कहती हैं, "यह फूड फ्रॉड 2003 और 2006 में हमारे सॉफ्ट ड्रिंक में की गई मिलावट की खोजबीन से ज्यादा जटिल और खतरनाक है। ऐसे समय में जब हम कोविड-19 से खिलाफ जंग लड़ रहे हैं और इससे बचने का कोई रास्ता हमें सूझ नहीं रहा है तो ऐसे समय में चीनी का ज्यादा इस्तेमाल हालात और भयावह बना देता है।"

जांच में कौन फेल, कौन पास

सीएसई की जांच में दावा किया गया है कि 13 ब्रांडस में सिर्फ 3- सफोला, मार्कफेड सोहना और नेचर्स नेक्टर सभी परीक्षणा में पास पाये गये। इनके अलावा शहद बेचने वाली बड़ी कंपनियां- डाबर, पतंजलि, वैद्यनाथ, झंडु, हितकारी और एपिस हिमालय एनएमआर टेस्ट में फेल हो गये।

देश की इन बड़ी कंपनियों के शहद में मिलावट पाई गई है।

शहद में मिलावट को पकड़ने के लिए एनएमआर (Nuclear Magnetic Resonance) जांच को सबसे विश्ववसनीय माना जाता है। यह जांच शुगर सिरप की मिलावट का पता लगाने के लिए भी की जाती है। एनएमआर जांच का प्रयोग मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिन (एमआरआई) के रूप में भी किया जाता है, जिसका प्रयोग शरीर में गंभीर बीमारियों का पता लगाने के लिए किया जाता है।

एनएमआर के जरिये शहद के उत्पादन स्थल, उसमें किसी भी तरह की मिलावट, उसमें विभिन्न पोषक अवयवों की उपलब्धता आदि की गहन जांच की जाती है। एनएमआर तकनीक को एक जर्मन कंपनी ने बनाया है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारें शहद में मिलावट और सही स्त्रोत का पता लगाने के लिए इसका प्रयोग करती हैं।

इन कंपनियों के नमूने टेस्ट में पास हुए।

शहद में मिलावट पर संदेह सरकार को भी है। इसी को देखते हुए इसी साल जुलाई में राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड (एनबीबी) के सहयोग से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) द्वारा आणंद (गुजरात) में अत्याधुनिक शहद परीक्षण प्रयोगशाला का शुभारम्भ किया गया था। इसी मौके पर केंन्द्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा था, "शहद के उत्पादन में मिलावट एक बड़ी समस्या है और इसमें फ्रक्टोज की ज्यादा मात्रा वाले कॉर्न सीरप या चावल, टैपिओका, गन्ना और बीट सीरप मिलाए जा रहे हैं, जो सस्ते होते हैं और साथ ही इनके भौतिक-रासायनिक गुण समान होते हैं।"

सीएसई ने यह भी आरोप लगाया है कि भारत सरकार को शहद में हो रही मिलावट का अंदेशा था। उनका कहना है कि निर्यात किए जाने वाले शहद का एनएमआर परीक्षण 1 अगस्त, 2020 से अनिवार्य कर दिया गया है, जो यह बताता है कि भारत सरकार इस मिलावटी व्यापार के बारे में जानती थी।

नवभारत टाइम्स हिंदी की एक खबर के अनुसार 1 मार्च 2020 को वाणिज्य मंत्रालय की एजेंसी निर्यात निरीक्षण परिषद (ईआईसी) ने कहा कि अमेरिका को निर्यात होने वाले शहद के लिए एनएमआर जांच को एक अगस्त से अनिवार्य करने के लिए निर्यातकों को एजवाइजरी जारी कर दी गई है। उम्मीद है कि इस फैसले से देश के ईमानदार शहद उत्पादकों और मधुमक्खी पालन करने वाले किसानों को फायदा होगा।

हालांकि ऐसा ही आदेश नवंबर 2019 में भी दिया गया था लेकिन इसे गंभीरता से लिया ही नहीं गया। 25 नवंबर 2019 आउटलुक हिंदी में छपी एक खबर के अनुसार भारत सरकार ने ईआईसी से कहा है कि वह निर्यात किए जाने वाले शहद की एनएमआर जांच को अनिवार्य करे। सरकार ने ये फैसला निर्यातकों की बैठक के बाद लिया था।

कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन के अनुसार शहद क्या है?

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन के मानको की मानें तो शहद वह है जिसे मधुमक्खियां तैयार करती हैं और उसमें प्राकृतिक मिठास होनी चाहिए। शहद वह है जो पौधों के परागण से अथवा पौधों के जीवित अंगों को अलग करके अथवा जीवित पौधों को चूसने वाले कीटों से हासिल होता है। ऐसे में अगर इसमें शुगर यानी चीनी की मिला दिया जायेगा तो यह शहद रह ही नहीं जायेगा।

जांच में क्या मिला?

सीएसई के अनुसार शहद के नमूनों को सबसे पहले गुजरात के राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) में स्थित सेंटर फॉर एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टॉक एंड फूड (CALF) में जांचा गया। लगभग सभी शीर्ष ब्रांड (एपिस हिमालय को छोड़कर) शुद्धता के परीक्षण में पास हो गए, जबकि कुछ छोटे ब्रांड इस परीक्षण में फेल हुए, उनमें सी3 और सी4 शुगर पाया गया, यह शुगर चावल और गन्ने के हैं, लेकिन जब इन्हीं ब्रांड्स को एनएमआर परीक्षण पर परखा गया तो लगभग सभी ब्रांड के नमूने फेल पाए गए। 13 ब्रांड परीक्षणों में सिर्फ 3 ही एनएमआर परीक्षण में पास हो पाए। इन्हें जर्मनी की विशेष प्रयोगशाला में जांचा गया था।


यह भी पढ़ें- ऐसे करें असली और नकली शहद की पहचान

इस बारे में सीएसई के फूड सेफ्टी एंड टॉक्सिन टीम के कार्यक्रम निदेशक अमित खुराना ने प्रेस रिलीज के माध्यम से बताया, "हमने जो भी पाया वह चौंकाने वाला था। इससे यह पता चलता है कि मिलावट का व्यापार कितना आगे बढ़ गया है और ये भारत में होने परीक्षण में आसानी से बच जाते हैं। हमारी चिंता बस यह नहीं है कि जो शहद हम खा रहे हैं वह मिलावटी है, चिंता तो इस बात की भी है कि मिलावट को पकड़ पाने का काम बहुत कठिन है। हमने पाया कि शुगर सिरप इस तरह से बनाये जा रहे हैं कि उनके शुगर तत्वों को पहचाना ही न जा सके।"

मीठे जहर में चीन का खेल

सीएसई ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि अलीबाबा जैसे चाइनीज पोर्टल पर ऐसे सिरप की बिक्री हो रही है जो टेस्ट में पास हो जाते हैं। चीनी कंपनियां फ्रक्टोज के नाम पर ये सिरप भारत को एक्सपोर्ट करती हैं। शहद में इसी सिरप की मिलावट के प्रमाण मिले हैं और यह मिलावट सेहत के लिए बेहद खतरनाक है।

अमित खुराना इस बारे में बताते हैं, "यह भी साफ है कि खाद्य नियामक वास्तविकता में इस काले कारोबार के बारे में जानता है। एफएसएसएआई (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के निर्देश में जिन सिरप के बारे में कहा गया है, वे उन नामों से आयात नहीं किए जाते हैं या इनसे मिलावट की बात साबित नहीं होती। इसकी जगह पर चीन की कंपनियां फ्रुक्टोज के रूप में इस सिरप को भारत में भेजती हैं। एफएसएसएआई ने यह निर्देश क्यों दिया? हमें यह निश्चित तौर पर नहीं मालूम?"

अमित आगे बताते हैं कि हमने चीन की कंपनियों को ईमेल भेजकर ऐसे सिरप की मांग की थी जो यहां के परीक्षणों में पास हो जाएं। उनकी ओर से मिले जवाब में बताया गया कि उनके पास ऐसे सिरप हैं कि इसे शहद में 50 से 80 फीसदी तक भी मिलाया जायेगा तो ये परीक्षणों में पास हो जाएंगे।

मिलावट का चाइना कनेक्शन

सीएसई ने उत्तराखंड के जसपुर में भी एक ऐसी फैक्ट्री को खोजा है जो ऐसे सिरप बनाती है। कंपनी इसके लिए ऑल पास कोड वर्ड का इस्तेमाल करती है। सीएसई ने इसके लिए उनसे संपर्क किया और जांच के लिए सैंपल भी खरीदा। सीएसई ने इनके नमूने को शुद्ध शहद में मिलाया। परीक्षणों में पता चला कि 25 फीसदी और 50 फीसदी शुगर सिरप वाले मिलावटी नमूने पास हो गए।

सीएसई की माहानिदेशक सुनीता नारायण कहती हैं, "हमने सरकार से मांग की है कि इस सिरप और शहद का चीन से आयात बंद होना चाहिए, परीक्षण सशक्त किया जाने चाहिए, घरेलू बाजार में भी शहद के लिए एनएमआर टेस्ट अनिवार्य किए जाएं।

वे आगे कहती हैं कि हमें बतौर उपभोक्ता शहद को लेकर जागरूक होना पड़ेगा। हमें अक्सर लगता है कि यदि शहद क्रिस्टलीकृत होता है तो यह शहद नहीं है। यह सही नहीं है। हमें शहद के स्वाद, गंध और रंग को सीखना शुरू करना चाहिए जो कि प्राकृतिक है। शुगर की मिलावट वाला शहद खाकर हम अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हमें और अधिक चिंतित होना चाहिए क्योंकि मधुमक्खियों को खोकर हम अपनी खाद्य प्रणाली को खत्म कर देंगे। यह मधुमक्खियां परागण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, यदि शहद में मिलावट होगी तो हम सिर्फ अपनी सेहत नहीं खोएंगे, बल्की हमारी कृषि की उत्पादकता भी खो देंगे। मधुमक्खियां परागण का बड़ा जरिया हैं, जिससे कई तरह की फसलों, प्राजतियों में परागण होता है।

मिलावट के खेल में पिस रहे किसान

उत्तर प्रदेश के जिला बाराबंकी के मधुमक्खी पालन के साथ-साथ शहद का कारोबार करने वाले निमित गांव कनेक्शन से कहते हैं, "मिलावट का पूरा खेल बड़ी कंपनियां करती हैं क्योंकि किसानों को वैसे ही अब मधुमक्खी पालन में बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं होता, ऐसे में मिलावट करके वह लागत तो नहीं बढ़ा सकता। किसानों का शहद गुणवत्ता में खराब हो सकता है, लेकिन उसमें मिलावट नहीं होता।"

"और बड़ी कंपनियां जब किसानों से शहद खरीदती हैं तो मिलावट का डर दिखाकर भाव गिरा देती हैं। अब किसानों के पास ऐसी कोई व्यवस्था तो है नहीं जिससे वह यह सिद्ध पाये कि उसका शहद शुद्ध है। अगर लोकल स्तर पर जांच की सुविधा हो तो किसानों का मुनाफा बढ़ सकता है। आम आदमी को भी विश्वास हो जायेगा कि छोटे व्यापारी या किसान भी शुद्ध शहद बेचते हैं, जबकि यह विश्वास बस नामी कंपनियों पर है।" निमित आगे कहते हैं।

निमित शहद के कारोबार में वर्ष 2014 से जुड़े हुए हैं और उत्तर प्रदेश के तीन जिलों बाराबंकी, लखीमपुर और सीतापुर में मुधमक्खी पालन कराते हैं। 10 हजारा से ज्यादा बी बॉक्स के माध्यम 20 से 25 टन सालाना शहद उत्पादन करते हैं।

जैसे-जैसे मिलावट का कारोबार बढ़ा है, वैसे-वैसे शहद का भाव भी गिर रहा है। इसका सीधा असर मधुमक्खीपालकों पर पड़ रहा है। बड़ी कंपनियां सस्ते दर में शहद खरीदकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं।

इन्ही बक्सों में मुधमक्खियां पाली जाती हैं।

हिमाचल प्रदेश के जिला किन्नौर के मधुमक्खी पालक भीम सिंह पिछले 35 वर्षों से मधुमक्खीपालन का काम कर रहे हैं। वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "पिछले चार-पांच वर्षों में आय बहुत कम हुई है। मेरे पास 500 बक्से थे, अब 300 ही हैं। चार साल पहले शहद (सरसों शहद) की कीमत 150 रुपए प्रति किलो तक थी, लेकिन यही शहद अब 70 से 90 रुपए किलो में बिक रहा। हमारा मुनाफा घट रहा है लेकिन कंपनियों के शहद के दाम हर साल बढ़ जाते हैं।"

ऐसा नहीं है मिलावट से नुकसान बस किसानों को ही हो रहा है। इससे सरकार को भी नुकसान उठाना बढ़ रहा है। ऐसे में जब किसान मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम चला रही है, 500 करोड़ रुपए खर्च भी कर रही है, फिर भी इससे बहुत ज्यादा फायदा होता दिख नहीं रहा है। इधर के कुछ वर्षों में भारत से शहद निर्यात में या तो कमी आ रही है या स्थिरिता नहीं है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के अनुसार वर्ष 2019-20 भारत ने 633.79 करोड़ रुपए का 59,536.76 कुंतल शहद निर्यात किया था जबकि इसके पिछले वर्ष 2018-19 में 732.19 करोड़ रुपए का कुल 61,333.9 कुंतल शहद निर्यात हुआ था।

भारत में पैदा होने वाला शहद मुख्ययत: अमेरिका, सउदी अरब, कनाडा और कतर जैसे देशों में निर्यात होता है। वर्ष 2019-20 में भारत में लगभग 59,536.75 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन हुआ था।

पराग की संख्या को कम किया?

देश में मधुमक्खी पालकों का एक मात्र संगठन मधुमक्खी पालक किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मधुमक्खी पालन करने वाले उत्तर प्रदेश के बदायूं, चंदौसी के रहने वाले दुष्यंत सिंह गांव कनेक्शन से कहते हैं, "हमें तो बड़ी खुशी हुई कि किसी ने तो हिम्मत दिखाई जिसने बड़ी कंपनियों का नाम सबके सामने रख दिया। बड़ी कंपनियों का खेल अब सबके सामने है। हम तो 10 साल से बात कर रहे हैं कि देश में भी एनएमआर जांच को अनिवार्य किया जाये, लेकिन बड़ी कंपनियों के सामने एफएसएसएआई ने किसी की सुनी ही नहीं।

"सरकार बड़ी कंपनियों के प्रभाव में है। एक ग्राम शहद में 50,000 पोलन (पराग) काउंट होता था। फिर बड़ी कंपनियों से इसे घटवाकर 25,000 करावा और अब यह 5,000 पर आ गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि शहद में 80 फीसदी मिलावट की जा रही है। 20 फीसदी शुद्ध शहद से 5,000 पोलन का काउंट आ ही जाता है।" वे आगे कहते हैं।

एफएसएसएआई के वर्ष 2017 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में कुल शहद में पोलन संख्या 50,000 था। 2018 में इसे घटाकर 25,000 और 2020 में 5,000 कर दिया गया।

"चीन ही नहीं, अब तो भारत में भी मिलावट वाली सिरप बन रही है। उत्तराखंड के जसपुर में एक नहीं, कई कंपनियां हैं जो किसानों पांच रुपए ज्यादा शहद खरीदकर मिलावट का कारोबार कर रही हैं। एनएमआर टेस्ट लागू किया लेकिन बस निर्यात में, जबकि हमारी मांग तो यह है कि इसे आम उपभोक्ताओं के लिए भी जरूरी है। जो कंपनियां देश में शहद बेच रही हैं, उनकी भी जांच होनी चाहिए।" दुष्यंत कहते हैं।

सीएसई ने सरकार और उपभोक्ताओं से सावधान रहने की अपील की है।

आंध्र प्रदेश के हिंदपुर लोकसभा सीट से सांसद कुरुवा गोरान्तला माधव ने 7 फरवरी 2020 को लोगसभा में पोलन की संख्या कम करने पर सवाल पूछा था। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसका जवाब देते हुए बताया, "एफएसएसएआई ने सूचित किया है कि पोलन संख्या में बदलाव भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) और केंद्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीबीआरटीआई) के वैज्ञानिकों के सुझावों के आधार किया गया है। इससे भारतीय शहद में पोलन संख्या की सही तस्वीर पता चलती है।"

उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने पर काम कर रहे प्रोफेसर आरपी सिंह बताते हैं कि पोलन की संख्या शहद के अलग-अलग प्रकारों में अलग-अलग होती है। सरसों, लीची अथवा फूलों से प्राप्त शहद में यह संख्या अलग-अलग हो सकती है। इसमें अगर मिलावट की जा रही है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि शहद शहद की उत्पत्ति के स्रोत को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा हो।"

नेशनल बी बोर्ड (राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड) के सदस्य और शहद निर्यातक जयदेव सिंह भी दुष्यंत सिंह की बातों का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, "मिलावट के पूरे कारोबार से नुकसान किसानों का हो रहा है। उसे सही कीमत नहीं मिल रही है। पिछले दो सालों से निर्यात में एनएमआर टेस्ट कर रहे हैं। ऐसे में निर्यात में जो शहद जा रहा है वह ठीक है। ऐसा करना पड़ा क्योंकि दूसरे देशों में तो जांच होती ही है। वहां तो हम मिलावटी बेच ही नहीं सकते। भारत में बड़ी कंपनियों की वजह से जांच नहीं हो पा रही है। उपभोक्ता को सही चीज मिलनी चाहिए।"

"कोविड के समम लोगों को लग रहा था कि शहद से उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाएगी, ये तो जहर है। ऐसे में अब जरूरी है कि सरकार देश में बिकने वाली शहद को जांच के बाद ही बाजार में बिकने दे।" जयदेव आगे कहते हैं।

कंपनियों ने कहा- बदनाम करने की साजिश

डाबर और पतंजलि ने बुधवार को सीएसई के उन दावों का खंडन किया जिनमें उनके द्वारा बेची जा रहे शहद में शुगर सिरप (चीनी) से मिलावट होने की बात कही गई है। कंपनियों के मुताबिक एफएसएसएआई द्वारा शहद को टेस्ट करने के लिए तय गए नियमों और मापदंडों का पालन किया जाता है।

फाइनेंसियल एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक डाबर के प्रवक्ता ने कहा कि हाल की रिपोर्ट्स प्रेरित नजर आती हैं और इनका लक्ष्य हमारे ब्रांड की छवि को खराब करना है। वे अपने ग्राहकों को भरोसा दिलाते हैं कि डाबर का शहद 100 फीसदी शुद्ध और देसी है जिसे भारतीय स्रोतों से प्राकृतिक तरीके से इकट्ठा किया जाता है और बिना कोई शुगर या दूसरे मिलावटी तत्व को जोड़े पैक किया जाता है।

फोटो साभार- निमित, शहद कारोबारी

वहीं पतंजलि आयुर्वेद के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि यह भारतीय प्राकृतिक शहद उद्योग और उत्पादकों को बदनाम करने की साजिश लगती है, जिससे प्रोसेस्ड शहद का प्रचार किया जा सके। इमामी समूह जो झंडू ब्रांड का मालिक है, ने कहा है कि वही FSSAI के सभी मानकों का पालन करता है।

कंपनियों के इन आरोपों का सीएसई ने गुरुवार तीन दिसंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये जवाब दिया। सीएसई ने अपने जवाब में कहा, "हमने जिन नमूनों की जांच कराई है वे सही हैं और हम उसके साथ हैं। सब कुछ साफ-साफ रहे इसके लिए हमने जांच रिपोर्ट को भी साझा किया है। और यह जांच बड़ी कंपनियों जैसे डाबर या बस पतंजलि के लिए नहीं है। हम तो हैरान हैं कि छोटी कंपनियों भी मिलावट कर रही हैं। यह सब हमने उपभोक्ताओं की सेहत को ध्यान में रखकर किया।"

नोट- दी स्लो कैफे में कल यानी 4 दिसंबर को गांव कनेक्शन के संस्थापक और देश के सबसे चहेते स्टोरीटेलर नीलेश मिसरा के साथ सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण का इंटरव्यू देखना न भूलियेगा, शाम 8 बजे। इंटरव्यू का प्रसारण यहां होगा-

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