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गन्ना किसानों का दर्द: "गन्ने की खेती छोड़कर हम क्या लगाएं, धान भी तो 1000 रुपए क्विंटल बेचा है"

तीन साल से यूपी में गन्ने का रेट नहीं बढ़ा है। साल-साल भर चीनी मिलों से पैसा नहीं मिल रहा। गन्ने पर सियासत भी तेज है, ऐसे में सवाल है कि किसान गन्ने की खेती छोड़ क्यों नहीं देते? इस पर किसानों का दर्द सुनिए

Arvind ShuklaArvind Shukla   16 Feb 2021 5:23 AM GMT

गन्ना किसानों का दर्द: गन्ने की खेती छोड़कर हम क्या लगाएं, धान भी तो 1000 रुपए क्विंटल बेचा हैउत्तर प्रदेश में लगातार तीसरे साल गन्ने का रेट नहीं बढ़ाया गया है। किसानों का कहना है बढ़ती लागत में उनकी जमा नहीं निकल रही। फोटो-अरविंद शुक्ला

लखनऊ/बिजनौर। उत्तर प्रदेश सरकार ने लगातार तीसरे साल गन्ने की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है। 15 फरवरी को गन्ना पेराई सत्र 2020-21 के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक में तीन साल पुराने राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) गन्ने के मूल्य पर मुहर लगी है। मौजूदा पेराई सीज़न में सामान्य गन्ने का रेट 315 रुपए क्विंटल जबकि गन्ने की अगैती फ़सल का रेट 325 रुपए ही रहेगा। गन्ने की अस्वीकृत फ़सल का रेट 310 रुपए प्रति क्विंटल भी पिछले वर्षों जितना ही है। पेराई सत्र 2017-18 में प्रदेश सरकार ने गन्ने के एसएपी में 10 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की थी।

गन्ने का एसएपी नहीं बढ़ाए जाने के संबंध में उत्तर प्रदेश के गन्ना विभाग ने जारी बयान में कहा कि भारत सरकार द्वारा चीनी का एक्स फैक्टी मूल्य 3100 रुपए निर्धारित होने के बावजूद एसएसपी के दर ये भुगतान होने पर चीनी की उत्पादन लागत 32.50 रुपए किलो आ रही है। महाराष्ट्र की चीनी मिलें कम उत्पादन लागत के चलते 28-29 रुपए किलो में बिक्री कर रही हैं, जिससे यूपी में कम रेट पर चीनी बेचने का दवाब है। वर्तमान पेराई सत्र में रिकवरी 11.30 से घटकर 10.60 प्रतिशत होने से चीनी उत्पादन की लागत भी 200 रुपए क्विंटल बढ़ गई है। कोरोना में कम मांग के करण 50 लाख टन का कैरी ओवर स्टॉक मिलों के गोदामों में था और इस पेराई सत्र का कैरी ओवर स्टॉक और वर्तमान पेराई सत्र के अनुमानित उत्पादन 105-110 लाख टन के चलते चीनी मिलों पर कम रेट पर चीनी बेचने का दवाब है। इसलिए चीनी के बाजार मूल्यों पर दबाव, कम रिकवरी के चलते उत्पादन लागत बढ़ोतरी, किसानों के भुगतान के लिए नगद तरसला की विषम परिस्थितियों को देखते हुए गन्ना मूल्य की दरों में बढ़ोतरी करना अनुकूल नहीं था।


बकाए के भुगतान पर यूपी के गन्ना विभाग ने आंकड़ा जारी करते हुए ये भी बताया है कि कैसे उनकी सरकार के पूर्व की सरकारों से ज्यादा भुगतान कराया है। आंकड़ों के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी के पांच साल के कार्यकाल में 52,131 करोड़, समाजवादी पार्टी के 5 साल में 95,215 करोड़ का भुगतान किया गया। जबकि बीजेपी के मौजूदा चार साल कार्यकाल में अब तक 122,251 करोड़ रुपए भुगतान हो चुका है।

पिछले साल गन्ने की जगह धान लगाया था लेकिन धान 1000 रुपए क्विंटल बेचना पड़ा। मुनाफा तो दूर मूलधन से पैसे कम हो गए। ऐसे में फिर थोड़ा गन्ना बो रहे हैं किसान के पास कोई रास्ता ही नहीं वो करे तो क्या- अजय तिवारी, किसान, सीतापुर

खेती की बढ़ती लागत, मिलों से पैसे मिलने की अनिश्चितता और रेट में बढ़ोतरी न होने से प्रदेश के गन्ना किसानों में मायूसी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की किसान महापंचायत से 25 किलोमीटर दूर तिसोत्रा गांव के किसान कुलवीर सिंह कहते हैं, " गन्ने की छिलाई 20 रुपए प्रति क्विंटल से 40 हो गई। डीजल 60 रुपए लीटर से 80 रुपए लीटर तक पहुंच गया है। डीएपी-यूरिया भी महंगी हो गईं लेकिन गन्ने का एक तो पैसा नहीं बढ़ा ऊपर से पेमेंट भी साल-साल भर बाद मिलता है। फिर ऐसी खेती लोग क्यों करें?"

कुलवीर सिंह आगे कहते हैं, "मैं तो मुख्यमंत्री की सलाह मानकर दूसरी फसलों की खेती करना चाहता हूं लेकिन धान-गेहूं के रेट भी तो कम हो गए। छोटा हो या बड़ा किसान खत्म हुआ जा रहा है। सब रकबा घटा रहा है।"

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कुलवीर सिंह अपने खेत का गन्ना ले जाते हुए (नीले ट्रैक्टर पर) फाइल फोटो

बिजनौर से करीब 350 किलोमीटर दूर सीतापुर जिले के महोली तहसील में अहला गांव के अजय तिवारी के पास करीब 15 एकड़ ज़मीन है, जिसमें वो गन्ना, धान, गेहूं आदि की खेती करते हैं। वो गन्ने की फसल घटाकर दूसरी फसलें ज्यादा उगाना चाहते हैं। लेकिन धान की फसल का उनका खट्टा अनुभव उन्हें रोकता है।

"पिछले साल करीब 70 क्विंटल धान था, जो मैंने 1,000 रुपए क्विंटल (सरकारी रेट 1,886-1,888) में बेचा था। अगर पूरी लागत देख लें तो कम से 10 हजार रुपए मूलधन से चले गए। ये अच्छा हुआ 5 हजार का पुलाव बेच लिया था। ऐसे में इस बार फिर थोड़ा गन्ना लगाएंगे, क्या करें किसान मजबूर है, कोई और रास्ता ही नहीं। लेकिन इस बार लागत कम लगाएंगे," अजय तिवारी ने बताया।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 में पश्चिमी यूपी में ही एक समारोह में किसानों से कहा था, "गन्ने के अलावा कुछ और फ़सलों को बोने की आदत हमें डालनी पड़ेगी। दिल्ली का बाजार आपके पास है।"

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद की वेबसाइट के मुताबिक प्रदेश में 42 लाख गन्ना किसान हैं। प्रदेश में करीब 23 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती और औसत उपज 79 टन है और रिकवरी 10.85 किलो (प्रति क्विंटल चीनी) है। हालांकि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि 2020-21 में यूपी में 2208.00 लाख हेक्टेयर (प्रथम अग्रिम अनुमान) गन्ने की खेती हुई है। प्रदेश में चीनी उद्योग करीब 40 हजार करोड़ रुपए का है। लेकिन किसानों के सामने चीनी मिलों से बकाया हासिल करना बड़ी समस्या है। संसद तक में आवाज़ उठी है।

लोकसभा में एक सवाल के जवाब में उपभोक्ता, मामले खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने बताया 31 जनवरी 2021 तक देशभर की चीनी मिलों पर किसानों का 16,883 करोड़ रुपए बकाया है। अकेले वर्तमान चालू सीज़न 2020-21 में किसानों के यूपी की चीनी मिलों पर 7,555.9 करोड़ रुपए, कर्नाटक की चीनी मिलों पर 3,585.18 करोड़ रुपए और महाराष्ट्र की चीनी मिलों पर 2,030.31 करोड़ रुपए बकाया हैं।

बिजनौर के चांदपुर में सोमवार को आयोजित किसान पंचायत में प्रियंका गांधी ने उठाया था किसानों के बकाए और रेट ना बढ़ाए जाने का मुद्दा। फोटो अरेंजमेंट

गन्ने के बकाए को लेकर यूपी में सियासत तेज़ हो गई है। कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी, पश्चिमी यूपी में लगातार किसान पंचायत कर रही हैं। 15 फरवरी को बिजनौर की किसान पंचायत में प्रियंका गांधी ने किसानों से सवाल पूछा था, "क्या आपको पता है यपी के किसानों के 10 हजार करोड़ बाकाया हैं और पूरे देश से किसानों के 15 हजार करोड़ रुपए (31 जनवरी 2021 तक बकाया 16,883 करोड़ रुपए) बकाया हैं? ये ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो आपके बकाए नहीं दिलावाये और अपने विदेश भ्रमण के लिए 16 हजार करोड़ रुपए के हवाई जहाज़ खरीदे हैं जबकि 15 हजार करोड़ में वो एक-एक किसान का बकाया दिला सकते थे।"

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं, "बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में 14 दिन में गन्ने का भुगतान कराने का वादा किया था, भुगतान नहीं होने पर ब्याज दिलवाने की बात थी लेकिन किसानों के करीब 10 हजार करोड़ रुपए आज भी बाकी है। डीज़ल, खाद लेबर सब महँगा हो गया है लेकिन सरकार ने एक रुपया रेट नहीं बढ़ाया। कांग्रेस, सड़क से लेकर सदन (विधानसभा) तक किसानों की आवाज़ उठाएगी।"

कांग्रेस पार्टी ने 22 फरवरी को यूपी में बजट के दिन विधानसभा में सरकार को घेरने का ऐलान किया है। अजय कुमार लल्लू गांव कनेक्शन को बताते हैं, "प्रियंका जी ने बिगुल बजा दिया है। कांग्रेस पार्टी 27 जिलों की 134 तहसीलों में किसान महापंचायत करेगी। पूर्वांचल और मध्य यूपी में ये काम ब्लॉक स्तर पर होगा।"

धान-गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की तरह केंद्र सरकार गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) तय करती है। लेकिन यूपी समेत कुछ प्रदेश सरकारें इसके ऊपर राज्य परामर्श मूल्य (SAP) तय करती हैं। एफआरपी वह न्यूनतम दाम होता है जो शुगर मिलों को किसान को देना ही पड़ता है। अगस्त 2020 में केंद्र सरकार ने एफआरपी में 10 रुपए क्विंटल की बढ़ोतरी की थी।

कृषि क़ानूनों को लेकर लड़ाई लड़ रही भारतीय किसान यूनियन ने भी गन्ना किसानों के मुद्दे पर सरकार से सवाल किया है। बीकेयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, "खाद-डीज़ल के दाम बढ रहे हैं, गैस सिलेंडर के दाम बढ रहे हैं, बच्चों की फीस बढ रही है, हर चीज पर महंगाई की मार है। पेस्टीसाइड महंगे हो रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में चार वर्षों से गन्ने के भाव में एक पाई नहीं बढाई गई, जबकि गन्ना संस्थान ने पिछले साल के मुताबिक गन्ने का लागत मूल्य 10 रूपए बढ़ जाने की बात की है।"

राकेश टिकैत ने अपने बयान में कहा, "एक ओर भारत सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का झूठा दावा कर रही है दूसरी ओर गन्ना किसानों को उनका लागत मूल्य तक नहीं मिल पा रहा। जबकि गन्ना संस्थान, शाहजहांपुर ने माना है कि गन्ने का लागत मूल्य 297 रुपए आ रहा है। ऐसे में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में दिए गए सी-2+50 के फार्मूले से गन्ने का रेट तय क्यों नहीं किया जाता? "



उत्तर प्रदेश में गन्ना शोध परिषद, शाहजहापुर के निदेशक डॉ. ज्योत्स्नेन्द्र सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, " गन्ने की खेती को भकारी बनाना है तो लागत घटानी होगी, एक साथ कई फसलें लेनी होंगी। छोटे यंत्रों और मशीनों के उपयोग से खेती की लागत घटी है। गन्ने को सितंबर-अक्टूबर में बोइए और फिर उसमें आलू लगाइ, आलू के बाद प्याज और दूसरी फसलें लीजिए। इस तरह नौ महीने में आपको लगातार कुछ न कुछ पैसे मिलते रहेंगे। हम लोग यूपी में गन्ने के साथ सोयाबीन की ट्राई करने वाले हैं।"

लगात कैसे कम हुई इस सवाल के जवाब में डॉ. ज्योत्स्नेन्द्र कहते हैं, "पहले किसानों को प्लांटिंग (बुवाई) में 6500-8000 रुपए लगते थे अब प्लांटर (मशीन) आ जाने ये काम 1200-1400 रुपए हेक्टेयर में हो जाता है। इसी तरह गुड़ाई में जो काम 2700 रुपए था वो अब 1200 में हो जाता है। इसी तरह हम लोग सिंचाई की लागत कम करने की कोशिश कर रहे हैं उसके लिए मॉस्चर मीटर (नमी बताने वाला यंत्र) बना रहे हैं।"

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लागत कम करने को लेकर वो अपने अपने संस्थान शाहजहांपुर (मुख्यालय) समेत सभी 9 गन्ना शोध संस्थानों की कृषि योग्य जमीन 375 एकड़ का उदाहरण देते हैं। संस्थानों की जमीन पर गन्ना समेत बाकी फसलों की लागत 2018-19 में करीब ढाई करोड़ थी, जबकि उससे होने वाली इनकम 4 करोड़ रही वहीं 2020-21 में हमारी लागत 2 करोड़ रुपए अनुमानित है और हमें 5 करोड़ से ज्यादा की आमदनी की उम्मीद है।"

गन्ना संस्थान ने कभी 304 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने की की लागत तय की थी, उसका पैरामीटर क्या थे। इस सवाल के जवाब में वो टेक्किल टीम से कंफर्म कर बताने की बात करते हैं। लेकिन इस संस्थान से जुड़े कई किसान लाइनों में हिसाब बताते हैं, अम्मार जैदी कहते हैं, " गन्ने की खेती में मौसम के हिसाब से 6 से नौ पानी लगते हैं। एक एकड़ में 5 घंटे लगते हैं। अब 80 रुपए के करीब डीजल है तो सिंचाई का खर्च लगाइए। फिर एक ट्राली गन्ना (70-80 क्विंटल) पहुंचाने में 1500-1800 रुपए (15 किलोमीटर मिल से दूरी) खर्च होते हैं। इस तरह खेत से मिल तक करीब 280 रुपए क्विंटल तक लागत आ जाती है। जबकि आम किसान का औसत उत्पादन 300-350 क्विंटल प्रति एकड है। फिर पैसे के आने का कोई तय समय नहीं।यही वजह है कि रकबा घट रहा।"

इनपुट -मोहित शुक्ला, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

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