संवाद: गन्ने का रेट बढ़ाकर किसानों को फायदा पहुंचाए सरकार

संवाद:  गन्ने का रेट बढ़ाकर किसानों को फायदा पहुंचाए सरकार

पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनी-भंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल बदल सकती है। इस साल कम चीनी उत्पादन होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो राहत मिलेगी परन्तु क्या गन्ना किसानों की स्थिति भी सुधरेगी?

2018-19 में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष 2019-20 में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। हमारी सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई प्रोत्साहन दिए थे। परन्तु पहले सूखे और बाद में अत्यधिक बेमौसम बारिश के कारण देश में गन्ने की फसल को काफी नुकसान हुआ। इससे महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन पिछले साल के 107 लाख टन से घटकर 55 लाख टन और कर्नाटक में 44 लाख टन से घटकर 33 लाख टन रहने की संभावना है।


इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले 21 प्रतिशत घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है जो घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। 2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने का अनुमान है। इस कारण इस वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी जिसकी आपूर्ति हम कर सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनी-भंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों और चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादा लाभ होगा। पिछले साल की तरह प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा जहां इस वर्ष 120 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश के किसानों ने लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु इसमें से आज भी किसानों का लगभग 3500 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है।

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पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और भरे हुए भंडारों का हवाला देकर एक तरफ चीनी मिल किसानों का भुगतान टालती रही हैं, तो दूसरी तरफ सरकार ने भी गन्ने के दाम नहीं बढ़ाये। केन्द्र सरकार ने जुलाई में वर्ष 2019-20 के लिए गन्ने का एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) 10 प्रतिशत की आधार रिकवरी के लिए 275 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया था।

वर्ष 2018-19 में भी केन्द्र सरकार का एफआरपी इतना ही था परन्तु आधार रिकवरी दर 9.5 प्रतिशत थी। इस वर्ष आधार रिकवरी दर बढ़ाने और महंगाई दर के प्रभाव से गन्ने का वास्तविक मूल्य घट गया है। यही हाल उत्तर प्रदेश में भी रहा जहां एसएपी (राज्य परामर्शित मूल्य) पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। परन्तु अब गन्ना और चीनी दोनों के उत्पादन की स्थिति देश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदल गई है जिसके कारण गन्ना मूल्य बढ़ाया जाना चाहिए।


पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने 2019-20 के गन्ना मूल्य निर्धारण के लिए सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने फिर एक बार अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी। गन्ने की उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल है। किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं। सरकार के लागत के डेढ़ गुना के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं।

इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह मिलें बैंकों के ब्याज की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को अनेक प्रोत्साहन पैकेज भी दिए हैं इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया।

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हर साल होने वाली गन्ना भुगतना की समस्या से निपटने के लिए हमें चीनी उद्योग के विषय में एक अलग नीति बनाने पर भी विचार करना होगा। देश में चीनी का 75 प्रतिशत उपयोग व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा किया जाता है जिसमें चॉकलेट, पेय पदार्थ, च्यवनप्राश, जूस, मिठाई, आइस-क्रीम, बिस्किट आदि निर्माता शामिल हैं। इन पेय-खाद्य पदार्थों में 60 प्रतिशत तक चीनी होती है जिसे अत्यधिक मंहगे दामों पर उपभोक्ताओं को बेचा जाता है। जिस प्रकार व्यावसायिक उपयोग वाले गैस सिलिंडर का रेट घरेलू इस्तेमाल वाले सिलिंडर से ज्यादा होता है उसी प्रकार व्यावसायिक इस्तेमाल होने वाली चीनी का रेट घरेलू से ज्यादा तय कर दिया जाए तो चीनी मिलों और गन्ना किसानों दोनों की समस्या का हल हो सकता है।


दूसरे, ब्राज़ील की तरह हमें भी गन्ने का प्रयोग बाज़ार की मांग के अनुसार चीनी, एथनॉल या अन्य उत्पादों को बनाने में नियंत्रित रूप से करना चाहिए। इससे एक तो अत्यधिक चीनी उत्पादन से बचा जा सकता है और दूसरा एथनॉल का प्रयोग पेट्रोल में मिलाकर पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को भी कुछ बचाया जा सकता है। इससे वायु प्रदूषण भी कुछ कम होगा। ये दोनों कदम देश, सरकार, किसान और चीनी उद्योग के हित में हैं। अधिक उत्पादन को देखते हुए पिछले दो सालों से गन्ने के दाम वास्तव में घटा दिए गए हैं। अब बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार किसानों को अच्छा गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करे।

(यह लेखक के अपने विचार है। लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

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