मेरा गाँव कनेक्शन (भाग- 8) : याद है हरी चटनी के साथ भुने आलू का मज़ा और गन्ने की मिठास

मेरा गाँव कनेक्शन (भाग- 8) : याद है हरी चटनी के साथ भुने आलू का मज़ा और गन्ने की मिठासमेरा गाँव कनेक्शन सीरीज़ का आठवां भाग। 

गाँव की हर एक बात हमें कुछ न कुछ ज़रूर सिखाती है। रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले लोगों का जागना , फिर खेतों पर जाकर अपने बड़ों को खेती करते हुए देखना। पशुओं को समय से चारा देना और समय पर गाँव की रसोई का चूल्हा जलना। सब बहुत सिस्टमेटिक हो जाता है। गाँवों की जीवनशैली जितनी सरल है, उतनी ही यादगार भी। आइये चलते हैं किसी गाँव में, हमारी विशेष सीरीज़ मेरा गाँव कनेक्शन के ज़रिए।

गाँव बायोडाटा -

गाँव- नवादा रुद्रपुर

ज़िला - शाहजहांपुर

राज्य - उत्तर प्रदेश

नज़दीकी शहर - शाहजहांपुर सिटी

गूगल अर्थ पर नवादा रुद्रपुर गाँव -

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नवादा रुद्रपुर गाँव-

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक छोटा सा गाँव है नवादा रुद्रपुर। यह गाँव शाहजहांपुर तहसील के अंतर्गत आता है, यहां पर मुख्यरूप से सरसों, आलू और गन्ने जैसी फसलों की खेती होती है। वर्ष जनगणना 2011 के अनुसार इस गाँव की अबादी 1,731 है। इस गाँव की साक्षरता दर 74.33 प्रतिशत है। साक्षरता के मामले में यह गाँव अभी भी बहुत पीछे है। गाँव की साक्षरता दर 67.39 है। गाँव की 52 फीसदी महिलाएं ही शिक्षित हैं।

गाँव की यादें -

सीरीज़ के आठवें हिस्से में अपने गाँव नवादा रुद्रपुर से जुड़ी यादों को ताज़ा कर रहीं हैं अनुषा मिश्रा

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कितना मज़ेदार होता है नानी और दादी का घर.. एक ही गाँव में होना

मेरा पूरा बचपन मेरे गाँव में ही बीता है, मेरे गाँव की यह अच्छी बात है कि मेरी नानी और दादी का घर एक ही गाँव में है और उससे भी अच्छी बात ये है कि दोनों के घर के बीच में एक बड़ी सी खिड़की है, जिसमें से इधर-उधर आसानी से जाया जा सकता है। इससे मुझे बहुत फायदा होता था, जब दादी के घर मेरा मनपसंद खाना बने तो, वहां चले जाओ और नानी के घर बने तो वहां चले आओ, दूसरा ये कि मुझे दादी और नानी के घर जाने के लिए कभी समय को अपनी छुट्टियों को बांटना नहीं पड़ा, जब तक स्कूल जाना शुरू नहीं किया था, तब तक गाँव ही मेरा ठिकाना था और जब स्कूल जाने लगी तब सारी छुट्टियां सिर्फ गाँव के लिए होती थी।

अब तो मुझे सर्दियां ही भाती हैं लेकिन बचपन में मैं गाँव में गर्मियों के आने का इंतज़ार करती थी और इसकी सिर्फ एक वजह थी, वही वजह जो शायद हर लड़की के लिए खास होती है। अरे, कच्चे आम जो मिलते हैं, गर्मियों में। मेरी मम्मी ने मेरे लिए एक छोटा सा झोला बनाया था। उस झोले में एक चाकू, एक छोटी प्लेट, एक शीशी में नमक और मिर्च रखी रहती थी। जैसे ही दोपहर होती थी, बस मैं अपना झोला उठाती थी और सिर पर पैर रखकर भागती थी, ऐसा इसलिए क्योंकि अगर मेरी नानी को पता चल जाता था कि मैं दोपहर में बाग में गई हूं, तो उनकी डांट शुरू हो जाती थी।

गाँव में दादी का घर।

लू लग जाएगी, तबियत ख़राब हो जाएगी, ज़्यादा आम खाने से दाने निकल आएंगे और न जाने क्या-क्या। उनकी डांट से बचते-बचाते मैं बाग में पहुंचती थी। बस फिर क्या था डंडा, पत्थर जो भी मिला उससे आम तोड़ना शुरू। जब डंडे की चोट से आम टूटकर नीचे गिरता था, तब जो खुशी मिलती थी वो तो क्लास में फर्स्ट आने पर भी नहीं मिलती थी। गाँव के दूसरे बच्चों की टोली भी मेरे साथ होती थी, जिस दिन आंधी आती थी उस दिन तो समझो लॉटरी निकल आई। आम तोड़ने की भी ज़हमत नहीं करनी पड़ती थी, वो खुद ही टूट कर गिरते थे और हमें बस उन्हें उठाकर अपने अपने झोलों में भरना होता था और फिर हो गया चार-पांच दिन का इंतज़ाम।

गाँव की तरफ मुड़ने वाले रास्ते पर लगी है हनुमान जी की मूर्ति।

शरारती तो मैं अब भी हूं लेकिन बचपन में कुछ ज्यादा ही थी। मेरी शरारतों के किस्से इतने मशहूर थे और मेरी काबिलियत पर मेरे घर वालों को इतना भरोसा था कि अगर पूरे गाँव में किसी घर में कोई टूट-फूट हुई, या ऐसा सुनने को मिला कि बच्चों में लड़ाई हुई या किसी एक बच्चे ने दूसरे को मारा, तो मेरे नाना के दिमाग में सबसे पहला नाम मेरा ही आता था। उनके मुंह से बस यही निकलता था- अनुषा ने किया होगा।

नवादा रुद्रपुर में बना नानी का घर।

गाँव में तो हर दिन जैसे जन्नत होता था। गर्मियों में अगर कच्चे आम मिलते थे तो सर्दियों में गन्ना, भुने आलू और मटर। कई बार तो गन्ना बीच से चीरते वक्त मैंने हंसिए से अपनी उंगली भी काट ली, लेकिन गन्ना चूसना नहीं छोड़ा। गाँव में नहर के किनारे बैठकर गुनगुनी धूप में गन्ना चूसने का जो मज़ा है वो और कहीं नहीं मिल सकता। न जाने कितनी यादें हैं गाँव से जुड़ी हुई या यूं कह लें कि गाँव में बिताया हर दिन एक याद है। अब व्यस्तता इतनी हो गई है कि जब चाहो तब गाँव जाना मुनासिब नहीं होता, लेकिन हर साल होली में हम अभी भी गाँव जाते हैं और अगर बीच में कभी मौका मिल जाए तो भी नहीं छोड़ते।

अनुषा मिश्रा गाँव कनेक्शन में सीनियर कॉपी एडिटर हैं।

अनुषा मिश्रा की तरह अगर आपके मन में भी अपने गाँव से जुड़ी यादें हैं, तो उन्हें हमारे साथ साझा करें- kanchan@gaonconnection.com पर। आख़िर यही तो है हम सबका गाँव कनेक्शन ।

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