‘तलाक के लिए अब नहीं करना होगा छह महीने इंतजार’  

‘तलाक के लिए अब नहीं करना होगा छह महीने इंतजार’  सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। तलाक का इंतजार कर रहे शादीशुदा जोड़ों को सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी है। मंगलवार (12 सितंबर) को तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि शादीशुदा जोड़े अगर आपसी रजामंदी से एक-दूसरे से अलग होना चाहते हैं, तो उनके लिए हिंदू मैरिज एक्ट के तहत छह महीनों का वेटिंग पीरियड अनिवार्य नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर दोनों पक्षों में समझौते की गुंजाइश नहीं बची हो और बच्चे की कस्टडी आदि का फैसला हो चुका हो तो कोर्ट छह महीने की 'कूलिंग ऑफ पीरियड' अवधि को खत्म कर सकता है।

जज आदर्श कुमार गोयल और यूयू ललित की पीठ ने इस बारे में कहा कि अंतिम आदेश के लिए 6 माह का वक्त लेना सिविल जज पर निर्भर होगा। अगर जज चाहे तो तुरंत तलाक का आदेश दे सकते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दिल्ली के एक जोड़े के तलाक के मामले में आया है। जो पिछले 8 साल से अलग रह रहा था. दोनों ने आपसी सहमति से तीस हजारी कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी।

हिंदू विवाह अधिनियम में 1976 में हुए संशोधन के जरिए आपसी सहमति से तलाक के मामले में छह महीने के 'कूलिंग ऑफ पीरियड' जोड़ा गया था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, छह महीने की अवधि एहतियात के तौर पर तय की गई थी, ताकि हड़बड़ाहट में कोई गलत फैसला ना हो जाए, लेकिन जब आपसी सहमति से तलाक हो रहा है तो एक साल भी काफी होता है।

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अभी ये है मौजूदा हिंदू मैरिज एक्ट

हिंदू मैरिज एक्ट 1955 में धारा13 (बी) में प्रावधान है कि तलाक के लिए पहला मोशन जब दाखिल किया जाता है तो दोनों पक्ष कोर्ट को बताता है कि दोनों में समझौते की गुंजाइश नहीं है और दोनों तलाक चाहते हैं।

याचिका में दोनों समझौते की तमाम शर्तों को लिखते हैं साथ ही बताते हैं कि कितना गुजारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी किसके पास है। जिसके बाद कोर्ट तमाम बातों को रिकॉर्ड पर लेती है और दोनों से बाद की डेट्स देती है। इस दौरान उन्हें इसलिए समय दिया जाता है कि वह समझौता कर सकें। अगर गुस्से में ये सब हुआ है तो गुस्सा शांत होने के बाद दोनों साथ रहने को तैयार हो जाएं, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो 6 महीने से लेकर 18 वें महीने के बीच दोनों सेकंड मोशन के लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल कर दोबारा से तलाक के लिए कहेंगे और कोर्ट को बताएंगे कि समझौता नहीं हुआ और वे तलाक चाहते हैं और तब कोर्ट तलाक का निर्णय कर देती है।

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