सुप्रीम कोर्ट ने भैंस दौड़ पर रोक से किया इनकार, जानिए कंबाला दौड़ से जुड़ी पांच रोचक बातें 

सुप्रीम कोर्ट ने भैंस दौड़ पर रोक  से किया इनकार, जानिए कंबाला दौड़ से जुड़ी पांच रोचक बातें दलदली धान के खेत पर होती है कंबाला दौड़।

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में हर साल होने वाली भैंस दौड़ (कंबाला) पर अंतरिम स्थगन लगाने से किया इनकार कर दिया है। इससे पहले तमिलनाडु में जल्लीकट्टू आंदोलन के लोकप्रिय होने के बाद अब कर्नाटक सरकार ने मशहूर भैंस दौड़ पर प्रतिबंध लगाने के मना कर दिया है।

कर्नाटक में हर साल तटीय इलाकों में होने वाली कंबाला दौड़ एक पारंपरिक भैंस दौड़ है। इस दौड़ को देखने के लिए कई स्कूल, कॉलेजों के छात्र, कलाकार और नेता शामिल होते हैं। यह दौड़ करीब 800 साल पुरानी मानी जाती है। दौड़ में भैंसों को प्रताड़ित किए जाने पर नवंबर 2016 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंबाला पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक अंतरिम आदेश जारी किया था ,जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने इंकार कर दिया है।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि पशु अधिकार इकाई पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स्ण (पेटा) की याचिका पर 12 मार्च को अंतिम सुनवाई की जाएगी।

कर्नाटक में तटीय क्षेत्रों में खेला जाने वाला सबसे बड़ा वार्षिक खेल है कंबाला।

कंबाला दौड़ से जुड़ी पांच रोचक बातें -

- कंबाला भैंस दौड़ कर्नाटक से तटीय क्षेत्रों में खेला जाने वाला सबसे बड़ा वार्षिक खेल आयोजन है।

- यह खेल प्रतियोगिता खासतौर पर दलदली धान के खेतो में नवंबर से लेकर मार्च महीने तक खेला जाता है।

- इस प्रतियोगिता में दो भैंसों के दो जोड़ों को दलदली धान के खेत में कोडे मार कर दौड़ाता है।

- कंबाला दौड़ के पीछे एक धार्मिक बात भी जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक खेतों पर भैंसों को दौड़ा कर किसान अपने कुल देवता को खुश करते हैं और अगली फसल की अच्छी पैदावार की कामना करते हैं।

- कंबाला भैंस दौड़ एक गैर - प्रतिस्पर्धी दौड़ प्रतियोगिता होती है।

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